इस पुस्तक का एक अंश :

‘देखो, अगर एक-एक आदमी ने चार-चार नहीं मारे तो मान लेना कि दूध नहीं पेशाब पिलाया था तुम्हारी मां ने. और पेशाब बह जाने के लिए ही होता है. कही हुई बात पूरे कक्ष को अवाक कर गई. बात ने वहीं चोट की थी जहां ध्येय कर यह बात कही गई थी. कमरे का माहौल उबाल पर था. कमरे के भीतर घुसे लोग उन्मादियों में तब्दील हो चुके थे. उन्हें अब अंतिम आदेश की प्रतीक्षा थी. अंतिम आदेश आया -

‘जो सरदार मिले, जहां मिले मारो. निकाल कर मारो. दौड़ा के मारो. घसीट के मारो. किसी से डरने की ज़रूरत नहीं है. फ़ैसला कर दो. कोई बीच में नहीं आएगा. पेट्रोल पंपों से, मिट्टी तेल के डिपो से, जो चाहिए, जितना चाहिए ले लो. बगल की मेज़ से मुहल्ले के गद्दारों की लिस्ट उठाओ और साफ़ कर दो इस शहर को. फिर कह रहा हूं जो चाहिए लो, मगर काम पूरा करो.’ वह दहाड़ा.


उपन्यास : चौरासी

उपन्यासकार : सत्य व्यास

प्रकाशक : हिन्द युग्म प्रकाशन

कीमत : 125 रुपए


कुछ तारीखें और साल संख्या से याद रहने के बजाय घटनाओं या सीधे-सीधे कहें तो हादसों के नाम हो जाते हैं. फिर उस साल का जिक्र करते ही वह घटना विशेष दिमाग में कौंधती है. हादसों में संख्या का प्रयोग सिर्फ लाशों और घायलों की गिनती करने के लिए होता है. लेकिन दुनिया के बड़े से बड़े कारोबार का हिसाब उंगलियों के पोरों पर रखने वाली संख्याएं; हादसों, दंगों, युद्धों, मानव निर्मित या प्राकृतिक आपदाओं में हुए नुकसान का आकलन करने में असमर्थ हैं! यह बात न सिर्फ चौरासी के दंगों और अपने देश के सभी हादसों पर लागू होती है, बल्कि दुनियाभर की अनियोजित और पूर्वनियोजित दुर्घटनाओं का सत्य यही है. यह उपन्यास सन 1984 के सिख विरोधी दंगों की बेहद सजीव झलक देते हुए हमें शर्म और अपराध-बोध से ज़ार-ज़ार भरता है, और भीतर से खाली करता है.

चौरासी के दंगे रहे हों या फिर 2002 के, इनसे यह इशारा तो मिलता ही है कि दंगों के माहौल में प्रशासन ज्यादातर मौकों पर तटस्थ नहीं रह पाता. वैसे तो एक हिंसा का बदला लेने के लिए हो रही दूसरी हिंसा को अक्सर ही स्वतःस्फूर्त हिंसा बताया जाता है. लेकिन अपने यहां हुए दंगों में यह बात खासतौर से सामने आती रही है कि सरकार, पुलिस और प्रशासन की तिकड़ी, अपना कर्तव्य छोड़कर पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों के हिसाब से काम करती है. सत्य व्यास दंगों में पुलिस और प्रशासन की भूमिका की तरफ इशारा हुए एक जगह लिखते हैं –

‘दंगे की रात का अपना ही सन्नाटा होता है. बाक़ी सारी ख़मोशी से अलहदा. बिल्कुल अलग. यह आपको डाराता नहीं. मरने से पहले की ख़ामोशी सुनाता है. सब कुछ सामान्य रहते हुए भी कितना असामान्य!...

‘लेकिन पुलिस?’ ऋषि ने अपना डर जाहिर किया.

‘पुलिस! वो देखो पीली पतलून में. जीप पर पानी डाल रहा है सब. तुम प्रशासन की चिंता मत करो. ये बताओ रॉड लोगे कि रामपुरी?’ पहले ने हाथ में छुरा चमकाते हुए पूछा.’

लोकतंत्र में भीड़ होती है और भीड़ का अपना एक अलग लोकतंत्र होता है. भीड़ अक्सर बहुमत का प्रतिनिधित्व करती हुई मानी जाती है, फिर चाहे बहुमत भीड़ के व्यवहार से सहमत हो या नहीं. भीड़ की अपनी अलग भाषा, अलग अभिव्यक्ति, अलग चाह होती है. दंगों के मौकों पर सभी जगहों और जाति-धर्म की भीड़ का चरित्र एक सा होता है. लेखक सिख विरोधी दंगों की भीड़ को जितना सादगी से दर्ज करता है, वह उतनी मारक लगती है. वे लिखते हैं -

‘घृणा हुजूम का सबसे मारक हथियार है. महज़ दो मुहल्ले बदल लेने से आप बशीर, रौनक़, जितेन्द्र या ऋषि न होकर भीड़ होते हैं. भीड़ जिसके सिर पर खून सवार है. भीड़ जो भेड़ियों का समूह है. भीड़ जो उन्मादी है. भीड़ जिसे बदला लेना है. भीड़ जिसे तुम्हें तुम्हारी औक़ात दिखानी है. भीड़ जिसे अपट्रान की टीवी चाहिए. भीड़ जिसे कुकर चाहिए, भीड़ जिसे ख़ून चाहिए. सरदारों का ख़ून और ख़ून तो गुरनाम के साथ ही मुंह से लग गया था.’

‘चौरासी’ उपन्यास दंगों की टीस से पहले प्रेम की पीर से पाठकों का परिचय कराता है. पूरे उपन्यास में प्रेम की सौंधी-सौंधी खुशबू बसी है. वह सौंधापन उस वक्त भी जेहन में कौंधता रहता है, जब दंगे के दौरान इंसानों और जले टायरों की चिरांध एक साथ नथुनों में जाती है! सत्य व्यास की एक बड़ी खासियत यह है कि वे व्यक्तिगत प्रेम में जितनी गहराई से उतरते हैं, समाज के प्रति भी प्रेम की उसी गहराई को महसूस करते, कराते हैं. उपन्यास के नायक ऋषि और नायिका मनु के प्रेम को अभिव्यक्त करता एक टुकड़ा –

‘कमरे ने देखा कि निकलते वक़्त मनु की उंगलियां ऋषि के हाथों की उंगलियों के अंतिम सिरे को छूते हुए बाहर निकलीं...मनु पिछले दो दिनों से बुख़ार में गिरी पड़ी है...ऋषि लौट आया. उसके पास मनु की तरह चोरी-छुपे ही सही, पास बैठ पाने की सलाहियत नहीं थी. वह नहीं जान पाया कि उसके हाथों में भी कोई मसीहाई है या नहीं.

हां, मगर ऋषि ने इतना ज़रूर जाना कि प्रेम में शरीर को जोग ही नहीं, रोग भी लग जाते हैं. प्रेम बेख़ुदी ही नहीं, बीमारियां भी साझा कर जाता है. अदला-बदली पत्रों की ही नहीं, पीड़ाओं की भी होती है.’

यह उपन्यास दिल धड़काने और सांसें थामने का काम एक साथ करता है. हवाओं में उड़ता प्रेम का लाल अबीर कब चौराहों पर जमे लहू में थक्कों में बदल जाता है पता ही नहीं चलता! सत्य व्यास ने प्रेम और हिंसा यानी दो ध्रुवों को जिस गजब के संतुलन से साधा है वह अभिभूत करता है. यह उपन्यास एक तरफ प्रेमी/प्रेमिका के पहले स्पर्श की सी सिहरन से सराबोर करता है, तो ठीक अगले ही पल दंगों में सामने खड़ी मौत को देख छूटने वाली कंपकपी से भी पाठकों को रूबरू कराता है. दोनों ही तरह की कंपन में लेखक ने हद दर्जे की तीव्रता भरी है, जो पाठकों को अपने पाश में बांध लेती है.

चौरासी के सिख विरोधी दंगों पर हिन्दी में संभवतः यह पहला ही उपन्यास है जो बहुत कम शब्दों में उस हिंसा के पिशाच का लगभग आंखों-देखा हाल सुनाने में सफल होता है. उपन्यास का नायक ऋषि दंगों के दौरान जिस तरह से अपनी प्रेमिका और उसके परिवार को बचाने के लिए हिंसा में लिप्त होने का अभिनय करता है... और फिर उस हिंसा के दौरान, क्रूरता की आड़ में अपने भीतर के इंसान और इंसानियत को बचाने की जो जद्दोजहद करता है वह अदभुत है. प्रेम में चिर विरह की टीस और साथ ही दंगों में मिले गहरे जख्म सी कसक एक साथ पाठकों को अपनी गिरफ्त में लेती है. सत्य व्यास का बेहतरीन अचूक वार...पाठक जिसका निशाना बनकर तृप्त होंगे!