अमेरिका में इन दिनों एक नये युवा निर्देशक की काफी चर्चा है. पिछले कुछ वर्षों से इनका हर काम खासी सराहना पा रहा है और कुछ समीक्षक इन्हें ओटर तक की पदवी दे रहे हैं - वह निर्देशक जिसकी फिल्मों के हर विभाग पर उसकी मुख्तलिफ छाप नजर आती है और वह फिल्म का ‘ऑथर’ कहलाता है. जैसे क्रिस्टोफर नोलन, वुडी एलन, टेरंटिनो.

41 वर्षीय कैरी जोजी फुकनागा पहली बार एचबीओ की सीरीज ‘ट्रू डिटेक्टिव’ के ब्रिलियंट पहले सीजन (2014) का निर्देशन करने की वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर हुए थे. कुछ वक्त बाद इन्होंने नेटफ्लिक्स के लिए ‘बीस्ट्स ऑफ नो नेशन’ (2015) नामक द्रवित करने वाली वॉर-ड्रामा फिल्म बनाकर समीक्षकों और दर्शकों का दिल जीता. इन दिनों नेटफ्लिक्स के लिए ही निर्देशित की गई इनकी वेब-सीरीज ‘मेनिऐक’ प्रबुद्ध दर्शकों की पसंद बनी हुई है और हाल ही में जेम्स बॉन्ड जैसी मुख्यधारा की प्रचंड कमर्शियल फ्रेंचाइजी की आने वाली पच्चीसवीं फिल्म को निर्देशित करने का मौका भी इन्हें दिया गया है.

कैरी जोजी फुकनागा की इन बड़ी-बड़ी व सेलिब्रेटिड फिल्मों व वेब/टीवी-सीरीज के बीच सिनेमा के सुधी दर्शकों को उनके पहले काम की सुध शायद ही होगी. 2009 में अमेरिकी फुकनागा ने एक कम बजट की कम चर्चित हुई स्पेनिश इंडी फिल्म से डेब्यू किया था जो कि आज की विभाजित दुनिया में दोबारा देखी जानी चाहिए. स्पेनिश भाषा में अवैध इमिग्रेशन की थीम पर बनी इस फिल्म का नाम ‘सिन नॉम्ब्रे’ (Sin Nombre) था जिसका कि अर्थ होता है ‘बिना नाम वाला’. इसलिए इस स्पेनिश-अमेरिकी फिल्म को अंग्रेजी में ‘नेमलैस’ नाम से भी जाना जाता है.

हम हिंदुस्तानियों के आस-पास विस्थापन व पलायन की अनेक हृदय-विदारक कहानियां मौजूद हैं. विभाजन के बाद पाकिस्तान से आकर हिंदुस्तान में बसे हिंदू-मुसलमानों की हृदय सहमा देने वाली दास्तानें हैं तो कश्मीर से विस्थापित होने वाले कश्मीरी हिंदुओं के विवरण कई किताबों में दर्ज हैं जिनके कि पन्ने हम पलट-पलटकर उदास होते रहे हैं. लेकिन जो मुल्क हमारे लिए अजनबी हैं, जिनके रहवासियों से हम हिंदुस्तानियों का सीधा राब्ता नहीं है, जहां की पॉलिटिक्स हम खबरों में तो पढ़ते हैं लेकिन जमीनी सच्चाई जानते कम हैं, उन जगहों के विस्थापन व इमिग्रेशन को सिनेमा के परदे पर देखना हमेशा दिल दहला देने वाला अलहदा अनुभव होता है.

‘सिन नॉम्ब्रे’ मौजूदा दौर के ऐसे ही एक पलायन को फिल्म की शक्ल देती है. हालांकि अमेरिकी फिल्में लैटिन अमेरिका से यूएसए की तरफ होने वाले पलायन तथा इमिग्रेशन को दशकों से अपनी फिल्मों में दिखाती आ रही हैं लेकिन ‘सिन नॉम्ब्रे’ की खास बात है कि वो विस्थापन के बाद की वैध या अवैध प्रवासी जिंदगी को परदे पर नहीं रचती, बल्कि अपने घर से चलकर एक अजनबी विकसित देश पहुंचने के दौरान की गैरकानूनी पलायन यात्रा को बेहद मार्मिक व यथार्थवादी अंदाज में पेश करती है.

मीरा नायर की ‘नेमसेक’ (2006) से लेकर ‘मॉस्को ऑन द हडसन’ (1984), ‘डांसर इन द डार्क’ (2000) और हाल के सालों में आई ‘द इमिग्रेंट’ (2013) और ऑस्कर नामित ‘ब्रुकलिन’ (2015) जैसी फिल्मों ने हमें दिखाया है कि ‘सपनों के देश’ अमेरिका पहुंचने के बाद शरणार्थियों और प्रवासियों को कैसी दोयम दर्जे की कठिन जिंदगी जीने को मजबूर होना पड़ता है. लेकिन ‘सिन नॉम्ब्रे’ यह न दिखाकर, ऐसे स्वप्निल देश तक पहुंचने की दुश्कर ‘यात्रा’ दिखाती है, और इस दौरान होने वाली मुश्किलों के इर्द-गिर्द एक लड़की के सपने और एक लड़के के अपने हिंसक गैंग से दूर जाने की कोशिशों को बुनती है. शायद इसी वजह से, यह मौजूदा दौर की प्रवासियों पर बनी फिल्मों के बीच एक दुर्लभ कृति होने का दर्जा रखती है.

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‘सिन नॉम्ब्रे’, या फिर ‘नेमलैस’, मुख्यत: दो अजनबी किरदारों की कभी समानांतर कभी साथ उलझकर चलने वाली कहानी कहती है. लैटिन अमेरिकी देश ऑनदूरस (Honduras) में रहने वाली सायरा और मैक्सिको में रहने वाला कैस्पर अपनी-अपनी दुनिया की कड़वी सच्चाईयों से जूझते-जूझते अमेरिका के करीब पहुंचाने वाली एक ट्रेन की छत पर साथ आकर बैठते हैं और ट्रेन के इस लंबे सफर में एक-दूसरे को अपने-अपने लिए खोजते हैं. फिल्म हिंसक गैंगवॉर और प्रेम-कहानी के बीच बिना प्रवचन दिए विस्थापित होने की पीड़ा को बेहद जहीन अंदाज में परदे पर रचती है और इमिग्रेंट्स से पटी पड़ी ट्रेन के इर्द-गिर्द रचे गए मार्मिक दृश्यों को देखकर रह-रहकर असमानता की मुखालफत करने वाली लैटिन अमेरिकी पृष्ठभूमि पर ही बनी महान फिल्म ‘द मोटरसाइकिल डायरीज’ याद आती है.

धीमी गति की इस फिल्म का शुरुआती लंबा हिस्सा ट्रेन-यात्रा के शुरू होने से पहले अपने किरदारों को मजबूती से स्थापित करता है. सायरा (मैक्सिकन अभिनेत्री पॉलिना गाइतान, जिन्होंने इस फिल्म के बरसों बाद ‘नार्कोस’ में पाब्लो एस्कोबार की पत्नी की भूमिका निभाई) अपने लैटिन अमेरिकी देश को छोड़कर ‘नार्थ’ - यानी अमेरिका - जाने को मजबूर है क्योंकि उसकी नानी और पिता यही चाहते हैं. नायक कैस्पर मैक्सिको देश के एक कस्बे में रहता है जो कि ग्वाटेमाला देश की सीमा से लगता है, और उस वास्तविक एमएस-13 गैंग का हिस्सा है जिसकी उत्पत्ति खुद अमेरिका में हुई थी. नायक का जोड़ीदार एक छोटी उम्र का बच्चा स्माइली है जिसे खुद नायक ने इस गैंग में शामिल करवाया है और उसका पूरा गैंग मिलकर रेलवे ट्रैक के आस-पास इकट्ठे हुए विस्थापितों से लूटपाट करता है.

इस मासूम पात्र स्माइली के बहाने आप फिल्म में देखेंगे कि किस तरह गरीबी और गैंगवॉर से पटे पड़े मुल्कों में छोटे-छोटे बच्चों का ब्रेनवॉश किया जाता है और उनके बाल मन पर हिंसा किस तरह असर डालती है. स्माइली अंत तक आपका दिल दहलाएगा और उसका मासूम होना आपको एक दूसरी विचलित करने वाली महान क्राइम-ड्रामा फिल्म ‘सिटी ऑफ गॉड’ (2002) की याद भी दिलाएगा.

‘सिन नॉम्ब्रे’ देखने में आसान फिल्म नहीं है. न सिर्फ उसकी हिंसा और टैटुओं से भरे पड़े गैंग के सदस्यों के शरीर भय पैदा करते हैं, बल्कि इमिग्रेंट्स जिन ट्रेनों में गैरकानूनी तौर पर चढ़कर अमेरिका की सीमा तक पहुंचते हैं उसके दृश्य भी दिल दहला देते हैं. चूंकि हम हिंदुस्तानियों के मानस पर विभाजन के दौरान की हिंसा में इंसानों और लाशों से पटी पड़ी ट्रेनों के दृश्य हमेशा के लिए अंकित हैं, इसलिए भी इस फिल्म में ट्रेन वाले दृश्य हम पर ज्यादा असर डालते हैं.

फिल्म में रेल की कई पटरियों वाली लंबी-चौड़ी एक जगह है जिसके दोनों तरफ मकान खड़े हैं और इस जगह से लैटिन अमेरिका के अलग-अलग मुल्कों से विस्थापित आकर वो ट्रेनें गैरकानूनी तौर पर पकड़ते हैं जो कि अमेरिका से लगने वाली सीमा तक जाती हैं. ट्रेनें कभी-कभी ही आती हैं, इसलिए बाकी वक्त स्थानीय शहरी यहां विस्थापितों को खाना-पानी बेचते हैं और गैंग के हिंसक सदस्य इनसे लूटपाट करते हैं. विस्थापित कई-कई दिन इन्हीं रेल पटरियों पर जागते, आधे सोते बिता देते हैं और ट्रेन की छत पर चढ़ने से पहले की भी इनकी नरक जैसी यह जिदंगी दर्शकों के लिए देखना आसान नहीं होता है.

अमेरिकी निर्देशक कैरी जोजी फुकनागा पर कभी इस तरह के इमिग्रेशन की मार नहीं पड़ी थी. उनकी पैदाइश अमेरिका की है और जापानी-अमेरिकी पिता व स्वीडिश-अमेरिकी माता की वे संतान हैं. बचपन में उनके माता-पिता का तलाक हुआ और पिता ने अर्जेंटीनी महिला से तो मां ने मैक्सिकन-अमेरिकी आदमी से शादी की. भिन्न-भिन्न संस्कृतियों का यह आदान-प्रदान हमेशा उनके जीवन का हिस्सा रहा और वे कभी एक साल जापान में रहे तो गर्मी की छुट्टियां मां और सौतेले पिता के साथ मैक्सिको में बिताईं. फ्रांस की एक यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में पढ़ाई की और इसलिए स्पेनिश के अलावा फ्रेंच भाषा में भी सिद्धहस्त हो गए. लेकिन फिर भी,स्पेनी भाषी ‘सिन नॉम्ब्रे’ देखते वक्त उसका बेमिसाल रियलिज्म आपको यह मुगालता आखिर तक देगा कि यह सब इस फिल्म के लेखक-निर्देशक का भोगा हुआ या देखा हुआ यथार्थ ही होगा, जो एक अमेरिकी फिल्मकार के एक अंजान देश की पृष्ठभूमि को इस कदर यथार्थवादी बनाने के काम आया है.

जाहिर तौर पर ऐसा है नहीं, और यह इस फिल्म से मिला यह सबक भी है कि अगर देखने का हुनर हो तो आप दूसरों के भोगे यथार्थ को भी परदे पर सुघड़ता और सच्चाई से रच सकते हैं. यही तो, विलक्षण फिल्ममेकिंग कहलाती है!

आजकल की दुनिया विस्थापितों और शरणार्थियों के दर्द से कुछ कम वाबस्ता होने लगी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अवैध प्रवासियों के प्रति नफरत फैलाने का कोई मौका नहीं छोड़ते और मैक्सिको जैसे मध्य अमेरिकी देशों से अमेरिका आने की चाह रखने वालों के प्रति उनका रवैया अफसोसजनक रूप से क्रूर है.

हिंदुस्तान में भी रोहिंग्या मुसलमान शरणार्थियों को लेकर कई लोगों की राय कुछ इतनी ही नकारात्मक है और यूरोप के भी कई देश दूसरे मुल्कों से आए अवैध शरणार्थियों को आए दिन अपनी सरहद से वापस लौटाते रहते हैं. ऐसे भयावह वक्त में ‘सिन नॉम्ब्रे’ जैसी डार्क इमिग्रेशन-ड्रामा की प्रासंगिकता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, क्योंकि इसे देखकर हम बेहतर समझ पाते हैं कि शरणार्थी और विस्थापित जिस लंबी यात्रा के बाद हमारे दरवाजे तक बड़ी उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, वो आखिर कितनी घोर पीड़ादायक यात्रा होती है.

इस फिल्म को ढूंढ़िए और जरूर देखिए. इसमें दिखाई गई ट्रेन-यात्रा के दौरान की मुश्किलों का थोड़ा भी विवरण इस लेख में हमने इसलिए नहीं दिया ताकि आप खुद उन्हें देखें और सिहरें. और फिर समझें. तभी इस फिल्म के बनने का मकसद पूरा होगा.

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