‘जो कमाते हैं, उससे अपना-पेट भात चलता है और बाकी जो बजता है, वह बेटे दारू पीने के लिए ले जाते हैं. बहुत समझाते हैं, लेकिन कोई बात नहीं सुनता है. बुरी संगत में पड़ गया है. इस शराब की वजह से काफी परेशानी हो रही है.’ करीब 60 साल की चंपा देवी जब ये सारी बातें कहती हैं तो उनका चेहरा उनके शब्द से अधिक बोलते दिखता है. रायपुर शहर के एक होटल में काम करने वाली चंपा सूबे की उन लाखों महिलाओं में शामिल हैं, जिनका परिवार शराब के घूंटों की वजह से लगातार कमजोर होता जा रहा है. उनकी यह तकलीफ अकेले परिवार की जिम्मेदारी संभालने की वजह से और बढ़ जाती है.

करीब 25 साल पहले पति के गुजरने के बाद से वे ही परिवार की रीढ़ रही हैं. ‘उनके नहीं रहने पर सभी मेरा बोझ हो गए. उन्हें (बेटों को) काम मिलता है तो करता है, नहीं मिलता है तो घर में बैठ कर खाता है’ यह पूछने पर कि शराब के लिए लड़कों को कितना रुपया देना पड़ता है, चंपा बताती हैं, ‘कोई तय नहीं, कभी 50 भी देना पड़ता है और कभी 100 भी. और नहीं देने पर झगड़ा करते हैं. गाली भी देते हैं लेकिन, नहीं मानते हैं. थक-हार कर देना पड़ता है.’ इस बारे में अपने बेटों से निराश होने के साथ वे सरकार से भी कुछ उम्मीद नहीं रखतीं. उनका कहना है कि अब तक कुछ नहीं हुआ तो अब क्या हो जाएगा! चंपा की इस बात पर वहां मौजूद होटल के मालिक भी सहमति में अपना सिर हिलाते हैं.

पिछले 20 से अधिक वर्षों से रायपुर में रहने वाले होटल मालिक नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘रमन सिंह (मुख्यमंत्री) ने लेडीज से कहा था कि शराब बंद कर देंगे. लेकिन, अब ज्यादा ही कर दिया है. शाम छह बजे से नौ बजे के बीच शराब के लिए दुकान के आगे धक्का-मुक्की की स्थिति बन जाती है. शहर के हरेक मोहल्ले में शराब की दुकान खुल गई है. और हर दुकान के आगे ऐसी ही भीड़ होती है.’ सत्याग्रह द्वारा शराब की दुकानों के मुआयने से उनकी इस बात की पुष्टि होती है. वहीं, शराब की वजह से परेशान महिलाओं की स्थिति के बारे में होटल मालिक कहते हैं, ‘लेडीज लोग कमाती हैं और अपने आदमी को पिलाती हैं. ऐसा न करने पर उनके मर्द मार-पीट करते हैं. वे गांव में होती हैं तो खेती-बाड़ी का काम करती हैं. शहर में होती हैं तो घरों और होटलों में काम करती हैं.

होटल मालिक की इस बात को ऑटोरिक्शा चलाने वाले अनुराग आगे बढ़ाते हैं, ‘मैंने बहुत जगह की महिलाओं को देखा-जाना है लेकिन, छत्तीसगढ़ की महिलाएं देवी हैं, देवी! उनको पूजने का मन होता है. लेकिन शराब की वजह से सभी का जिंदगी नरक हो गया है.’

रायपुर स्थित एक विदेशी शराब की दुकान के सामने लगी ग्राहकों की कतार | फोटो: हेमंत कुमार पांडेय
रायपुर स्थित एक विदेशी शराब की दुकान के सामने लगी ग्राहकों की कतार | फोटो: हेमंत कुमार पांडेय

शराब की वजह से सूबे के लोगों की जिंदगी बर्बाद हो रही है, इस बात से खुद मुख्यमंत्री रमन सिंह भी अनजान नहीं दिखते हैं. बीते साल ही उन्होंने महिलाओं से वादा किया था कि शराब पर धीरे-धीरे प्रतिबंध लगा दिया जाएगा. माना जा रहा था कि वे चुनावों में महिलाओं का समर्थन हासिल करने के लिए इसका ऐलान कर सकते हैं. लेकिन, ऐसा नहीं हुआ. इसके उलट रमन सिंह की सरकार ने चुनावी साल में शराब की बिक्री से होने वाली कमाई का लक्ष्य और बढ़ा दिया. चालू वित्तीय वर्ष (2018-19) में सरकार ने इसके लिए 3700 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा है. इससे पहले - 2017-18 में - शराब की बिक्री से सरकार की झोली में 3200 करोड़ रुपये गिरे थे. 2.6 करोड़ की आबादी वाले छत्तीसगढ़ के लिए यह आंकड़ा कितना बड़ा है, इसे बिहार के उदाहरण से समझा जा सकता है.

बिहार की नीतीश कुमार सरकार ने जब अप्रैल, 2016 में शराबबंदी लागू की थी तो उस वक्त इसकी बिक्री से सरकारी खजाने में करीब 4,000 करोड़ रुपये जाते थे. बिहार की आबादी छत्तीसगढ़ की तुलना में करीब चार गुना है. इसके बावजूद राजस्व का यह आंकड़ा छत्तीसगढ़ के इस साल के लक्ष्य से जरा सा ही अधिक है. रमन सिंह सरकार के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा शराब की बिक्री से आता है. इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि बीते साल इस सरकार ने इसकी बिक्री की जिम्मेदारी सीधे अपने हाथों में ले ली. अब एक सरकारी निगम छत्तीसगढ़ में शराब बेचने का काम करता है. सरकारी की इस नीति पर रायपुर में शराब की एक दुकान से कुछ दूर खड़े एक छत्तीसगढ़ निवासी कहते हैं, ‘जिन्हें करना था वंदे मातरम बुलंद, वे बंदे केवल रम पिए और पिलाए जा रहे हैं.’

दूसरी ओर, भाजपा के समर्थक इसे मुद्दा मानने से ही इनकार कर देते हैं. ‘इस चुनाव में शराब कोई मुद्दा नहीं है. आदिवासी घरों में तो मर्द के साथ महिलाएं भी शराब पीती हैं. वहीं, शहर में भी देखिए तो अब परिवार में लोगों के एक साथ बैठकर शराब पीने का चलन बढ़ रहा है’ रायपुर के एक भाजपा समर्थक कारोबारी दिलीप सर्राफ कहते हैं, ‘और शराबबंदी करना इतना आसान भी नहीं है, बिहार में देखें, नीतीश कुमार को कानून ढीला करना पड़ा. फिर इससे जो नुकसान होगा. उसकी भरपाई कौन करेगा?’

हालांकि ऐसा नहीं है कि इस मसले पर रमन सिंह ने कुछ नहीं किया है. उदाहरण के तौर पर उन्होंने लोगों को शराब के बारे में जागरूक करने के लिए अभियान चलाया है. उन्होंने यह भी नियम बनाया है कि एक बार में लोग एक तय मात्रा से ज्यादा शराब नहीं खरीद सकते हैं. लेकिन इस सबका कुछ असर चंपा देवी जैसी महिलाओं को जमीन पर नहीं महसूस हो रहा है. उनके जैसी सूबे की कई महिलाओं की मांग है कि शराब की बिक्री पर पूरी तरह से रोक लगाई जानी चाहिए. इसके लिए बीते कुछ वर्षों में कई विरोध प्रदर्शन भी किये गये हैं.

मौका देखकर छत्तीसगढ़ की महिलाओं के साथ विपक्ष भी इस मांग को जोर-शोर से उठाता रहा है. बीते शुक्रवार को कांग्रेस ने अपने जन घोषणा पत्र में भी कहा है कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आएगी तो सूबे में शराबबंदी लागू करेगी. माना जा रहा है कि इस वादे के जरिए पार्टी आधी आबादी को अपनी ओर खींचना चाहती है. वहीं, इस रिपोर्ट की शुरुआत में सत्याग्रह ने जिन होटल मालिक से बात की थी, उनकी मानें तो रमन सिंह ने काम तो अच्छा किया है लेकिन, शराब की वजह से उन्हें नुकसान हो सकता है.