केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री और राजस्थान में भाजपा की तरफ से चुनाव प्रभारी बनकर आए प्रकाश जावड़ेकर ने बीते दिनों पत्रकारों से हुई बातचीत में कहा था, ‘चुनाव में चेहरा वसुंधरा राजे होंगी. लेकिन टिकट हम बांटेंगे’. विश्लेषकों ने उनके कहे ‘हम’ के अलग-अलग मायने निकाले. खुद जावड़ेकर ने भी बाद में इस शब्द को लेकर सफाई दी कि इससे उनका आशय राजस्थान में टिकट तय करने वाली 15 सदस्यीय कोर कमेटी से था. लेकिन भाजपा द्वारा तरफ से प्रदेश में रविवार देर रात ज़ारी की गई उम्मीदवारों की पहली सूची से साफ हो गया है कि जावड़ेकर या कोई अन्य केंद्रीय नेता इस ‘हम’ से चाहे जो मतलब निकालता रहे, लेकिन राजस्थान में भाजपा के लिए इस शब्द का सिर्फ एक ही पर्याय है और वह है मुख्यमंत्री ‘वसुंधरा राजे सिंधिया’. इसी बात को यदि दूसरी तरह से कहें तो राजस्थान में ‘वसुंधरा ही भाजपा’ है.

वसुंधरा राजे के भाजपा शीर्ष नेतृत्व से बनते-बिगड़ते रिश्तों के मद्देनज़र कई बार कयास लगे कि इस बार विधानसभा चुनाव में राजे को कमजोर करने के लिए उनके करीबी और अधिकतर मौजूदा विधायकों का पत्ता काट दिया जाएगा. यहां तक कि बीती 31 अक्टूबर को भी उम्मीदवारों की सूची को लेकर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और वसुंधरा राजे के बीच खासी गहमागहमी की ख़बरें आई थीं. सूत्रों के मुताबिक जहां राजे अपनी तरफ से 90 सीटों पर सिंगल नाम का पैनल तैयार कर ले गई थीं. वहीं अमित शाह अपने निजी सर्वे के आधार पर इनमें से अधिकतर चेहरों को बदलना चाहते थे.

लेकिन वे शायद भूल गए कि यदि उन्हें पत्थर की लकीरें खींचने की आदत है तो राजे का राजनैतिक इतिहास ऐसी ही लकीरों को सिरे से मिटाने के किस्सों से भरा पड़ा है. आखिरकार शह-मात की इस सीधी लड़ाई में पार्टी प्रदेशाध्यक्ष के चयन के बाद एक बार फिर राजे ही शाह पर हावी पड़ीं. हालांकि राजस्थान सरकार के प्रमुख मंत्रियों युनूस खान (डीडवाना), कालीचरण सर्राफ (मालवीय नगर-जयपुर), राजकुमार रिणवां (रतनगढ़) और राजपाल सिंह शेखावत (झोटवाड़ा-जयपुर) के नाम अटकाकर, सुरेंद्र गोयल (जैतारण) का टिकट काटकर और राजे को कम पसंद आने वाले वरिष्ठ विधायक नरपत सिंह राजवी (विद्याधर नगर) को फिर मौका देकर अमित शाह ने भी अपनी नाक ऊपर रखने की पूरी कोशिश की है.

लेकिन इन कुछ नामों को छोड़ दिया जाए तो अमित शाह की तमाम कवायदों और राजनैतिक कयासों से उलट कुल 200 में से भाजपा की तरफ से आई 131 प्रत्याशियों की इस सूची में 85 नाम मौजूदा विधायकों के ही हैं. लेकिन यह आंकड़ा यहीं तक सीमित नहीं है. इस लिस्ट में सात प्रत्याशियों- सुमित गोदारा (लूणकरणसर), शंभूसिंह खेतासर (सरदारपुरा), सतीश पूनियां (आमेर), हरीश चंद्र कुमावत (दातारामगढ़), बाबूलाल खराड़ी (झाड़ोल), खेमराज (बागीदौरा) और जसवंत गुर्जर (बाड़ी)- को भी मौका मिला है जो पिछले विधानसभा चुनाव (2013) में जबरदस्त सकारात्मक माहौल होने के बावजूद अपने क्षेत्र में कमल के फूल को नहीं खिला पाए थे. जानकारों का कहना है कि इन सातों पर वसुंधरा राजे अपनी मुहर पिछली बार ही लगा चुकी थीं तो इस बात में संशय ही नहीं कि ये उनके पसंद के नेता हैं.

इसके अलावा इस सूची में 11 उम्मीदवार- कैलाश मेघवाल (पिलानी), हेमंत मीणा (प्रतापगढ़), अतुल भंसाली (जोधपुर), गुरवीर सिंह (सादुल शहर), रामस्वरूप लांबा (नसीराबाद), मंजीत चौधरी (मुंडावर), शैलेश सिंह (डीग-कुम्हेर), पूनम कंवर (कोलायत), गोविंद रानीपुरिया (मनोहर थाना), रामविलास (लालसोट), राजेंद्र मीणा (बामनवास)- ऐसे हैं जो मौजूदा विधायकों या फिर पूर्व नेताओं के करीबी रिश्तेदार हैं. इनमें से भी अधिकतर राजे के विश्वसनीय बताए जाते हैं. साथ ही लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए कर्नल सोनाराम (बाड़मेर) और गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया के मुखर विरोधी लेकिन मुख्यमंत्री राजे के उतने ही प्रबल समर्थक धर्मनारायण जोशी (मावली) जैसे नाम भी इस सूची में शामिल हैं.

राजनीतिकारों की मानें तो टिकट वितरण में चले वसुधंरा राजे के एकतरफा सिक्के ने कार्यकर्ताओं के बीच चुनावी नेतृत्व को लेकर बार-बार पैदा हो रही भ्रम कि स्थिति को काफी हद तक दूर करने का काम किया है. उनके मुताबिक यह निश्चित तौर पर चुनाव में संगठन के लिए फायदे का सौदा साबित होगा. लेकिन कुछ जानकार इससे अलग राय भी रखते हैं. वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ कहते हैं, ‘इस सूची से भाजपा की स्थिति जरूर स्पष्ट हुई है. लेकिन अब देर चुकी है. लंबे समय से पार्टी हाईकमान द्वारा राजे को पद से हटाने का इशारा दिए जाने के साथ उनके नेतृत्व कौशल पर भी संदेह खड़ा किया जाता रहा है. विपक्ष ने भाजपा की इस अंदरूनी कलह को बड़े मुद्दे के तौर पर इस्तेमाल किया है और वह चुनावों तक इसे बार-बार भुनाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देगा.’

वरिष्ठ पत्रकार अवधेश आकोदिया इससे जुड़े कुछ और पहलुओं की तरफ भी ध्यान खींचते हैं. वे कहते हैं, ‘राजे को सूबे में संगठन का सर्वेसर्वा घोषित करती इस लिस्ट का एक इशारा यह भी है कि भाजपा शीर्ष नेतृत्व को राजस्थान से कुछ खास उम्मीदें नहीं हैं. यह दांव चलकर हाईकमान ने विधानसभा चुनाव में किसी भी ऊंच-नीच का ठीकरा फोड़ने के लिए राजे के सिर को तैयार कर लिया है.’ अन्य वरिष्ठ पत्रकार राजेश असनानी भी कुछ-कुछ ऐसी ही बात दोहराते हैं. उनके शब्दों में ‘साल की शुरुआत में हुए लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों में भाजपा सभी संबंधित 17 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल करने में नाकाम रही. उसके बाद एक भी सर्वे संगठन के पक्ष में नहीं आया. मोदी और शाह जानते हैं कि राजस्थान में लोगों के मन में राजे के लिए खासी नाराजगी है जिसके विधानसभा चुनावों में उतरने की पूरी संभावना है.’

भाजपा से जुड़े सूत्रों के अनुसार पार्टी हाईकमान का मानना है कि विधानसभा चुनाव में वसुंधरा राजे पर उतरने के बाद जनता का आक्रोश छह महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनावों तक शांत हो जाएगा. भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की इस सोच के पीछे राजस्थान में पिछले कुछ महीनों से जोर-शोर से लग रहे ‘मोदी से बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं’ जैसे नारों को भी प्रमुख कारण बताया जा रहा है. इसके अलावा वसुंधरा राजे को पूरी तरजीह देकर भाजपा आलाकमान राजस्थान में किसी तरह की मुखालफत या भितरघात के डर से भी पूरी तरह मुक्त हो गया है. वहीं दूसरी तरफ अपनी पसंद के नेताओं का टिकट तय होने के बाद वसुंधरा राजे में जबरदस्त आत्मविश्वास देखा जा सकता है. उनके करीबियों की मानें तो अपने संबोधनों में वसुंधरा राजे जताती रही हैं कि चुनाव में हराना और जिताना जनता के हाथ है. इसलिए वे अच्छे या बुरे, हर तरह के नतीजे के लिए तैयार हैं. लेकिन वे इस बात से संतुष्ट हैं कि तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने पार्टी के भीतर सामने वाले को घुटने टेकने पर मजबूर किया है. फिर चाहे वह कोई भी हो.