बात सितंबर 2013 के दूसरे हफ्ते की है. तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पार्टी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने वाले थे. लेकिन उनके इस फैसले से पार्टी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी और उनके कुछ सहयोगियों के और नाराज हो जाने का खतरा था. डर था कि आडवाणी कहीं नाराज होकर एक बार फिर इस्तीफे की पेशकश न कर दें. इससे तीन महीने पहले जब नरेंद्र मोदी को भाजपा के प्रचार अभियान का प्रमुख बनाया गया था, तब वे ऐसा कर चुके थे.
लिहाज़ा राजनाथ सिंह को अब एक ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो आडवाणी और उनके समर्थकों में भी अच्छी पकड़ रखता हो. साथ ही वह नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी के पक्ष में भी हो. राजनाथ जानते थे कि ऐसा व्यक्ति ही नाराज होने वालों को मना सकता है. जल्द ही उनकी तलाश पार्टी महासचिव अनंत कुमार पर जाकर खत्म हुई. उन्होंने मोदी की उम्मीदवारी की घोषणा से एक हफ्ते पहले अनंत कुमार को रूठने वाले लोगों को मनाने के काम पर लगा दिया. इस दौरान कुमार ने कई बैठकें कर पहले सुषमा स्वराज और आडवाणी समर्थक अन्य नेताओं को मनाया. इसके बाद पहले खुद और फिर सुषमा स्वराज को साथ लेकर आडवाणी के साथ कई बैठकें की. आखिरकार वे पार्टी के पितामाह (आडवाणी) को मनाने में सफल रहे.
इस मामले में अनंत कुमार का नाम कभी सामने नहीं आया लेकिन भाजपा के कई नेता जानते हैं कि उन्होंने परदे के पीछे किस तरह एक बड़े काम को पूरा किया था. इसी घटना के बाद पार्टी नेताओं के बीच उनकी पहचान एक ‘संकमोचक’ (क्राइसिस मैनेजर) की बन गई. फिर 2016 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल का दूसरा विस्तार किया तो इसमें अनंत कुमार को संसदीय कार्य मंत्रालय की अतिरिक्त ज़िम्मेदारी सौंप दी. उर्वरक मंत्रालय वे पहले से ही संभाल रहे थे. यहां से पूरी तरह साफ हो गया कि प्रधानमंत्री फिर अनंत कुमार को ‘संकटमोचक’ की भूमिका में ही देखना चाहते हैं.
प्रधानमंत्री मोदी ने बेहद महत्वपूर्ण समझे जाने वाले संसदीय कार्य मंत्रालय का काम अनंत कुमार को वैंकैया नायडू से लेकर दिया था. सतही तौर पर यह एक साधारण सा फेरबदल नजर आ रहा था, लेकिन इसके पीछे की कहानी कुछ और ही थी. दरअसल, सत्ता में आने के बाद से ही मोदी सरकार संसद में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) विधेयक पास करवाने की कोशिश में लगी थी. लेकिन, अपने कार्यकाल के शुरूआती डेढ़ साल में एड़ी-चोटी का जोर लगाने के बाद भी वह इस विधेयक को राज्य सभा से पारित नहीं करवा पाई थी. इसके अलावा भी संसद में कई अहम विधेयक लंबे समय से अटके हुए थे.
जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तब तक समझ चुके थे कि यदि उन्हें ये बिल पास कराने हैं तो विपक्ष के साथ बेहतर तालमेल बिठाना ही पड़ेगा. साथ ही वे यह भी जाना गए थे कि जीएसटी जैसे विधेयक को केवल संसद से ही पारित करा लेने मात्र से काम नहीं चलेगा, इसे देश के आधे राज्यों की विधानसभाओं से भी पारित कराना जरूरी था क्योंकि यह संविधान संशोधन विधेयक था. इसके लिए सरकार को छोटे से छोटे दलों के साथ भी बेहतर सामंजस्य बनाना था.
जबकि मोदी सरकार के शुरूआती डेढ़ साल के कार्यकाल में संसद के कामकाज को देखते हुए यह धारणा बन रही थी कि वेंकैया नायडू संसदीय कार्य मंत्रालय का काम उस तरीके से नहीं कर पा रहे हैं जिसकी उनसे दरकार थी. यह भी लगा कि वे सभी दलों से मिल-जुलकर चलने के बजाय कई बार ऐसी बात बोल देते हैं जिससे विपक्षी सदस्य भड़क जाते हैं. इस वजह से प्रधानमंत्री मोदी को संसदीय कार्य मंत्रालय में एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो संसद के फ्लोर प्रबंधन से लेकर विपक्ष के साथ भी बेहतर सामंजस्य बना सके.
यहां राजनाथ की तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तलाश भी अनंत कुमार पर जाकर ख़त्म हुई. अनंत कुमार की सौम्य छवि ने नरेंद्र मोदी का ध्यान खींचा. इसके अलावा इस तथ्य ने भी कि कुमार एक ऐसे नेता हैं जिनके दोस्त विपक्षी दलों में भी बराबर से हैं. और अनंत कुमार ने संसदीय कार्य मंत्रालय की ज़िम्मेदारी मिलते ही इन तमाम बातों को सही भी साबित किया. वे तुरंत अपने काम में लग गए. अगले संसद सत्र से पहले ही उन्होंने जीएसटी को लेकर कांग्रेस नेताओं के साथ कई बैठकें कीं. मायावती, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव और प्रकाश करात जैसे विपक्षी नेताओं से भी बात की. बताया जाता है कि शरद पवार से मिलने वे खुद उनके घर गए थे.
इस मामले को करीब से देखने वाले लोग बताते हैं कि उस समय अनंत कुमार ने जीएसटी और संसद में लंबित पड़े अन्य विधेयकों को पारित कराने के लिए इतनी मेहनत की थी कि कई महीने वे अपने पहले वाले - रसायन और उर्वरक मंत्रालय - को तक समय नहीं दे पाए. उनकी इस मेहनत का ही प्रतिफल था कि जब संसद में जीएसटी और अन्य अहम विधेयक पारित हुए तो प्रधानमंत्री ने खुद इसके लिए अनंत कुमार की सराहना की. साथ ही प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की नजर में उनकी उपयोगिता पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गई.

अनंत कुमार की व्यवहार कुशलता और परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बना लेने की खूबी को इस बात से समझा जा सकता है कि वे एक समय लालकृष्ण आडवाणी के सबसे ज्यादा करीबी नेताओं में शुमार होते थे. लेकिन जल्द ही नरेंद्र मोदी के करीबियों में शामिल हो गए. वे आडवाणी समर्थकों में ऐसे पहले नेता थे जिन्होंने प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी का खुलकर समर्थन किया था. यही नहीं 2014 के लोक सभा चुनावों के दौरान उन्हें मोदी के लिए प्रचार करने वाले नवरत्नों में भी गिना जाता था.
लालकृष्ण आडवाणी की नाराजगी मोल लेकर मोदी का समर्थन कर अनंत कुमार ने कइयों को हैरत में डाल दिया था. अनंत कुमार एक ऐसे नेता थे जो हर अच्छे-बुरे वक्त में आडवाणी के साथ खड़े रहे थे. तब भी जब 1990 में आडवाणी पर हवाला के आरोप लगे थे और 2005 में उस वक़्त भी जब आडवाणी ने जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताकर संघ की जबर्दस्त नाराजगी मोल ले ली थी. लेकिन आगे जाकर मोदी का समर्थन करने के मुद्दे पर उन्होंने एक साक्षात्कार में ख़ुद ही ख़ुलासा किया था, ‘मैंने ऐसा करके आडवाणी जी का विरोध नहीं किया. बल्कि उस समय पार्टी और देश की जनता के रुख को पहचान गया था, जो सिर्फ मोदी को ही प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहती थी.’
कुछ साल पहले तक अनंत कुमार अपनी हिंदी बोलने की क्षमता को लेकर थोड़े असहज रहते थे. एक अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने हंसते हुए कहा था कि वे कभी बड़े नेता नहीं बन सकते क्योकि उन्हें ‘अच्छी हिंदी बोलनी नहीं आती.’ लेकिन दक्षिण भारत के इस नेता ने बिहार और मध्यप्रदेश जैसे हिंदी पट्टी के क्षेत्रों में पार्टी की जिम्मेदारी को कई सालों तक बेहतरीन ढंग से पूरा किया. उनके साथ एक उपलब्धि यह भी जुड़ी कि वे संयुक्त राष्ट्र (यूएन असेंबली) में कन्नड़ में भाषण देने वाले पहले शख्स थे. ऐसा करने का मौका उन्हें मनमोहन सिंह के कार्यकाल में मिला था. वे उस समय विदेश मामलों की स्थायी संसदीय समिति के अध्यक्ष थे.
वाजपेयी सरकार में एक साथ चार मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके अनंत कुमार भले ही मीठा खाने के शौक़ीन नहीं थे, लेकिन उनसे मिलने-जुलने वाले लोग बताते हैं कि वे बोलते बहुत मीठा थे. वे इतने मृदुभाषी थे कि कोई भी व्यक्ति उनसे एक मुलाकात में ही उनकी सौम्यता का कायल हो जाता था.
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