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बीते साल राजकुमार राव की फिल्म ‘न्यूटन’ काफी चर्चा में थी. 2017 में रिलीज हुई इस फिल्म को भारत की तरफ से ऑस्कर पुरस्कारों के लिए भी भेजा गया था. यह फिल्म नक्सल प्रभावित एक गांव में मतदान के दिन होने वाली घटनाओं को दिखाती है. रियल लोकेशन्स पर शूट की गई इस फिल्म में दिखाया गया गांव, छत्तीसगढ़ का कोंगरा गांव है. क्विंट की यह वीडियो रिपोर्ट फिल्म में दिखाए गए गांव और उसके असली हालातों को तुलना करती है. दुखद यह है कि दोनों में आज भी कोई खास अंतर नजर नहीं आता है.

फिल्म में दिखाए गए लोगों में से कई किरदार इस गांव के ही मूल निवासी हैं और फिल्म की ही तरह असलियत में भी यह गांव काफी पिछड़ा हुआ है. हालांकि फिल्म में आने के बाद यहां के लोगों को उम्मीद थी कि उनके गांव की दशा बदलेगी और इसकी उन्नति के लिए सरकार कुछ कदम उठाएगी लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. आज भी गांव वालों को पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा के लिए जूझना पड़ रहा है. वीडियो रिपोर्ट बताती है कि डेढ़ हजार की आबादी वाले इस गांव में आठ हैंडपंप हैं लेकिन इनमें से ज्यादातर से फ्लोराइड मिला हुआ पानी आता है. इसलिए गांव वालों को या तो बहुत दूर से पानी लाना पड़ता है या गंदे पानी का इस्तेमाल करना पड़ता है. इस तरह फिल्म भले ही हिट होकर ऑस्कर्स तक पहुंच गई हो, लेकिन गांव वालों के हालात आज भी वैसे के वैसे हैं और फिलहाल, यही उनकी सबसे बड़ी शिकायत है.

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साल 2014 में देश में स्वच्छता अभियान की शुरूआत के साथ-साथ स्वच्छता सर्वेक्षण भी शुरू किया गया था. इस सर्वेक्षण में पहले दो साल कर्नाटक के मैसूर शहर ने अव्वल स्थान हासिल किया. तीसरे साल यह चौथे और चौथे साल यह आठवें पायदान पर खिसक गया. इसके बावजूद सफाई किसी शहर की संस्कृति कैसे बनती है, यह मैसूर से सीखा जा सकता है. इस शहर को लगातार स्वच्छ बनाए रखने में सबसे बड़ा योगदान यहां कुंबरकोप्पल इलाके में स्थित अपशिष्ट प्रबंधन संयत्र (वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट) का है जो बीते करीब दो दशकों से काम कर रहा है.

अच्छी बात यह है कि सिर्फ यह प्लांट ही नहीं शहर का हर बासिंदा इस कचड़े से निपटने में अपने हिस्से का काम करता है, फिर वह चाहे ग्रीन और प्लास्टिक कचरे को अलग-अलग करने जैसा छोटा काम ही क्यों ना हो. इस छोटी सी मदद के चलते शहर भर से इकट्ठा किए गए कचरे का लगभग 50 फीसदी हिस्सा कम्पोस्ट बनाने में और 25 फीसदी रिसायकल करके इस्तेमाल कर लिया जाता है. संयत्र में यह इस काम को करीब 40 नगरबंधुओं (सिविक वर्कर) की मदद से किया जाता है. दिलचस्प बात यह है कि इन नगर बंधुओं में से अधिकांश वह हैं जो पहले असगंठित तौर पर कूड़ा-कचरा बीनने का काम करते थे. अब कचरा बेचकर जो कमाई की जाती है, उससे इन नगरबंधुओं तनख्वाह तथा अन्य सुविधाएं (आवास, स्वास्थ्य सुविधाएं) उपलब्ध कराई जाती है. इन्हीं पैसों से संयत्र की देखभाल भी की जाती है. यह कहना गलत नहीं होगा कि कचरा प्रबंधन के लिहाज से मैसुरू का कुंबरकोप्पल अपशिष्ट प्रबंधन संयत्र देश के अन्य शहरी निगमों के लिए एक आदर्श स्थापित करता है.

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दीवाली उत्तर भारतीय हिंदुओं का सबसे प्रमुख त्योहार है. दुनिया भर में भारतीयों के फैलने के साथ हजारों साल पुराना यह त्यौहार अब विदेशों में मनाया जाने लगा है. इसके सबसे बड़े उदाहरणों में से एक है, ऑस्ट्रेलिया. यहां की आबादी का एक बड़ा हिस्सा भारतीय मूल का है. 2016 में ऑस्ट्रेलियाई सांख्यिकी विभाग (एबीएस) द्वारा जारी जनगड़ना के अनुसार ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीयों की जनसंख्या करीब 1 लाख 63 हजार थी जो कि इस देश की कुल जनसंख्या का लगभग एक फीसदी है. भारतीयों की बढ़ती तादाद के कारण अब ऑस्ट्रेलिया में दिवाली को सामूहिक रूप से बड़े पैमाने पर मनाया जाने लगा है. युवा हो चाहें वृद्ध सभी भारत से दूर होकर भी दिवाली को लेकर काफी उत्साहित रहते हैं और सबके पास इसके अपने कारण होते हैं. किसी के लिए यह संपन्नता का प्रतीक है तो किसी के लिए मिठाई खाने का दिन और किसी के लिए सारे भारतीय मूल के लोगों के लिए एक जगह एकत्रित होने का बहाना, यह वीडियो यही दिखाता है.