राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन भरने के पहले दिन यानी सोमवार के बीत जाने के बाद भी कांग्रेस अपने प्रत्याशियों के नाम फाइनल नहीं कर पाई है. कयास लगाए जा रहे थे कि पार्टी सोमवार को अपने 150 उम्मीदवारों की सूची ज़ारी कर देगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. उधर, तमाम अंदरूनी रस्साकशी के बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने रविवार देर रात को अपने 131 प्रत्याशियों की पहली लिस्ट ज़ारी कर दी थी. कांग्रेस की तरफ से हो रही इस देर के पीछे उसके प्रमुख नेताओं की आपसी सिरफुटव्वल को प्रमुख कारण बताया जा रहा है. इसकी ताजा बानगी के तौर पर पार्टी की केन्द्रीय चुनाव समिति (सीईसी) की कथित अंतिम दौर की बैठक को देखा जा सकता है. सोमार देर रात हुई इस बैठक में पार्टी प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट और विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी के बीच तीखी नोक-झोंक हो गई.

सूत्रों की मानें तो करीब आधा दर्जन सीटों अपनी पसंद के प्रत्याशियों को मौका दिए जाने की बात पर शुरू हुई यह गहमागहमी इतनी बढ़ गई कि प्रदेशाध्यक्ष पायलट ने अपनी बात न माने जाने पर राजनीति ही छोड़ देने की बात कह दी. सूत्रों के मुताबिक पायलट के जवाब में डूडी का कहना था, ‘यदि तुम कल राजनीति छोड़ते हो तो आज ही छोड़ दो’. और इसके बाद वे अपने साथ लाए कागज फेंक कर बैठक से बाहर चले गए. इसके बाद संगठन महासचिव अशोक गहलोत और स्क्रीनिंग कमेटी की चेयरपर्सन कुमारी शैलजा की समझाइश के बाद चर्चा बहाल हो सकी. हालांकि मीडिया के सामने डूडी समेत बैठक में मौजूद सभी नेताओं ने इस तरह की किसी भी घटना से इन्कार किया है.

वैसे यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस की भीतरी रस्साकशी की ख़बरें सामने आई हैं. कुछ दिन पहले भी डूडी और पायलट के बीच ऐसे ही कुछ विवाद की बात सामने आई थी. लेकिन तब भी दोनों ने इन ख़बरों का खंडन किया था. प्रदेश के राजनीतिकारों की मानें तो यह अंदरूनी कलह कांग्रेस के लिए एक तरह से थाली में सजे विधानसभा चुनाव का जायका बिगाड़ सकती है.

ऐसा नहीं है कि सिरफुटौव्वल की यह स्थिती सिर्फ कांग्रेस में ही है. भाजपा में भी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और पार्टी शीर्ष नेतृत्व के बीच की तनातनी समय-समय में सुर्ख़ियों में बनी रहती है. इसके अलावा पार्टी की तरफ से ज़ारी की गई लिस्ट से पत्ता कटने के बाद सुरेंद्र गोयल जैसे कई दिग्गज नेता भी बग़ावत पर उतर आए हैं. लेकिन राजस्थान में पहले से कई धड़ों में बंटी कांग्रेस ऐसी इस मामले में भाजपा से इक्कीस साबित हुई है. इससे पहले प्रदेश विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र पार्टी द्वारा शुरू किए गए ‘मेरा बूथ, मेरा गौरव’ अभियान के कार्यक्रम नेताओं के लिए अखाड़े बन गए थे जिनमें मारपीट से लेकर कुर्सियां तक फेंके जाने की ख़बरें सामने आई थीं.

प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘किसी भी प्रदेश के राजनैतिक संगठनों में में चुनाव नजदीक आने पर सीटों को लेकर अंदरूनी तनाव पैदा होना आम बात है, लेकिन राजस्थान कांग्रेस इसके चरम पर पहुंच जाती है.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘ऐसे मामलों की संख्या खास तौर पर तब ज्यादा बढ़ जाती है जब राज्य में कांग्रेस सत्ता से बाहर होती है. क्योंकि तब यह लगभग तय माना जाता है कि चुनाव-दर-चुनाव सत्ता बदलने वाले राजस्थान में अगली सरकार उसी की बननी है. ऐसे में संगठन के नेता जबरदस्त महत्वाकांक्षा और असुरक्षा के मिले-जुले भावों के चलते अपना सब्र खो देते हैं.’

राजस्थान में भाजपा की तुलना में कांग्रेस में भीतरी कलह कहीं ज्यादा होने के पीछे जानकार प्रदेश संगठन के शीर्ष नेतृत्व को भी बड़ा जिम्मेदार मानते हैं. पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत के जमाने से ही प्रदेश भाजपा में मोटे तौर पर एक ही नेता का वर्चस्व रहा है जिसे राज्य की मौजूदा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया बखूबी बरकरार रखने में सफल रही हैं. लिहाजा पार्टी में ऊपर से लेकर नीचे तक गुटबाजी होने की संभावना बहुत कम रहती है. लेकिन प्रदेश कांग्रेस के साथ ऐसा नहीं है. आजादी के बाद से ही संगठन में हर स्तर पर बराबर के कद वाले कई नेताओं की मौजूदगी से पैदा हुई आपसी प्रतिद्वंदिता और गुटबाजी की स्थिति आज तक बनी हुई है.

मौजूदा दौर की बात करें तो प्रदेश कांग्रेस में नेताओं का एक बड़ा समूह पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पीछे है और दूसरा प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट के. इसके बाद नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी और पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सीपी जोशी जैसे नेताओं का भी अपना अलग समर्थक वर्ग है. इनके अलावा भी प्रदेश कांग्रेस कई अन्य छोटे-बड़े समूहों में बंटी हुई मानी जाती है. इनमें से अभी तक डूडी सचिन पायलट के करीब होते हुए भी सभी नेताओं से संतुलित रिश्ते बनाए हुए थे. लेकिन हालिया घटना ने सूबे के कई विश्लेषकों को चौंकाया है.

जानकार कांग्रेस की इस स्थिति को उसके लिए आत्मघाती मानते हैं. उनका अनुमान है कि इन विधानसभा चुनावों में परिस्थितियां पिछले चुनावों जैसी नहीं रहने वालीं. दरअसल इस साल की शुरुआत में राज्य की दो लोकसभा और एक विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव हारने के बाद से प्रदेश भाजपा कहीं ज्यादा मुस्तैद होती दिखी है. वहीं टिकट वितरण में पूरी तरह वसुंधरा राजे को तरज़ीह देने के पीछे कई कारणों में से एक यह भी है कि भाजपा हाईकमान चुनावों के दौरान किसी भी तरह के बड़े भितरघात या आपसी द्वंद से बचना चाहता है. लेकिन कांग्रेस रणनैतिक तौर पर इस मामले में कमजोर दिख रही है.

इससे पहले राजस्थान में भेजे गए चार सह प्रभारियों- विवेक बंसल, तरुण कुमार, देवेंद्र यादव और काजी निजामुद्दीन पर पैसे लेकर टिकट देने के आरोपों के चलते भी कांग्रेस की जमकर किरकिरी हुई. हालांकि बाद में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने इन चारों के पैनल को निरस्त कर इन नेताओं को टिकट वितरण प्रक्रिया से बाहर का रास्ता दिखाकर स्थिति संभालने की कोशिश की थी. इसके अलावा भी गांधी समय-समय पर गहलोत और पायलट को भी सार्वजनिक मंचों पर एक साथ लाकर प्रदेश में पार्टी की एकजुटता का संदेश देने की कोशिश करते रहे हैं ताकि चुनावों में संगठन किसी हाल में कमजोर न होने पाए. देखने वाली बात होगी कि राजस्थान कांग्रेस के मुख्य स्तंभ कहे जाने प्रमुख नेता अपने अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए अपनी महत्वाकांक्षाओं के अश्वों को थामने में कितना सफल हो पाते हैं.