आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कांग्रेस और चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) साथ में है. दोनों पार्टियां मिलकर तेलंगाना विधानसभा चुनाव लड़ रही हैं. अगले साल आंध्र प्रदेश विधानसभा और लोक सभा चुनाव भी मिलकर लड़ने पर इनके बीच सहमति बनी है. फिर भी सूत्राें के हवाले से द इकॉनॉमिक टाइम्स जो ख़बर दी है उसकी मानें तो चंद्रबाबू नायडू को लेकर कांग्रेस पूरी तरह आश्वस्त नहीं है. बल्कि कुछ चिंतित ही है. ख़ास तौर पर कांग्रेस की आंध्र इकाई में नायडू को लेकर दोराय है.

अख़बार के मुताबिक कांग्रेस की चिंता का विषय चंद्रबाबू नायडू की अतिसक्रियता है. पहले वह ये मान रही थी कि नायडू ने संभवत: कांग्रेस के साथ आकर ग़ैर-भाजपाई गठबंधन में उसका नेतृत्व स्वीकार कर लिया है. लेकिन अब यह धारणा हिलती दिख रही है क्योंकि नायडू कांग्रेस के साथ-साथ दूसरे दलाें से भी लगातार मेल-जोल बढ़ा रहे हैं. इससे यह आभास होने लगा है कि वे विपक्षी गठबंधन की अगुवाई करने के लिए देर-सबेर कांग्रेस नेतृत्व के समानांतर अपनी दावेदारी भी पेश कर सकते हैं.

वैसे भी चंद्रबाबू नायडू जिस टीडीपी की अगुवाई कर रहे हैं उसकी स्थापना ही कांग्रेस के विरोध में हुई थी. टीडीपी अपनी स्थापना के बाद से 36 साल बाद तक कांग्रेस विरोध पर ही आगे बढ़ती रही. यह तथ्य भी नायडू को लेकर पूरी तरह कांग्रेस को आश्वस्त होने से रोक रहा है. पार्टी के कई नेताओं को लगता है कि मौज़ूदा राजनीतिक परिस्थितियों में भले आज नायडू कांग्रेस के साथ हैं लेकिन वे मन से अपनी इस प्रतिद्वंद्वी पार्टी को ‘मित्र दल’ मान चुके हैं, यह बात ठीक से हज़म नहीं होती.

कांग्रेस की आंध्र इकाई के अध्यक्ष रघुवीर रेड्‌डी भी मानते हैं, ‘नायडू को लेकर प्रदेश में ख़ास तौर पर दो विचार हैं. इसके बावज़ूद इस वक़्त की ज़रूरत यह है कि दोनों दल मिलकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नियंत्रण वाली भारतीय जनता पार्टी से मुक़ाबला करें. यह अच्छी बात है कि नायडू ने कांग्रेस को ऐसी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्वीकार किया है जो लगातार भाजपा-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लड़ रही है. मगर जहां तक आंध्र की बात है कि यहां कांग्रेस के बिना आने वाले समय में कोई सरकार नहीं बना सकता.’