साल 1984 में जब जूही चावला ने मिस इंडिया का ताज पहना तो उनकी उम्र महज सत्रह साल थी. इसके ठीक दो साल बाद रिलीज हुई फिल्म ‘सल्तनत’ से उन्होंने बॉलीवुड में कदम रखा. बीच के इस छोटे से वक्त में यह छोटी सी लड़की एक सफल मॉडल बन चुकी थी. इस तरह, ‘सल्तनत’ के साथ बॉलीवुड को वह पहली अभिनेत्री मिली जो मॉडलिंग से फिल्मों में आकर एक सफल नाम बनने जा रही थी. हालांकि इस फिल्म ने धर्मेंद्र, श्रीदेवी, सनी देओल और शक्ति कपूर जैसी लंबी-चौड़ी स्टार कास्ट के बावजूद बॉक्स ऑफिस पर कोई खास कमाल नहीं दिखाया, फिर भी जूही चावला की पहली फिल्म होने के चलते यह सिनेमा के इतिहास में नाम दर्ज करवा चुकी है.

‘सल्तनत’ की अपनी बेहद छोटी सी भूमिका में जूही चावला सिर्फ अपनी बड़ी-बड़ी आंखें फैलाए, डरती या अचंभा करती दिखाई देती हैं. सुंदरता के अलावा उनकी कोई और खूबी इस फिल्म में देखने के लिए नहीं मिलती है. इसलिए यह कहा जा सकता है कि लहराते-घुंघराले बाल, चमकीली आंखों और उससे भी ज्यादा चमकदार मुस्कुराहट वाली इस मासूम सी गुड़ियानुमा अभिनेत्री का असली स्वागत तब हुआ जब वे आमिर खान के साथ बतौर लीड अभिनेत्री ‘कयामत से कयामत तक’ में नज़र आईं.

मंसूर खान निर्देशित ‘कयामत से कयामत तक (क्यूएसक्यूटी)’ 1988 में रिलीज हुई जिसमें उनके हीरो आमिर खान थे जो पहली बार परदे पर थे. फिल्म में जूही चावला ने फर्स्ट ईयर स्टूडेंट का किरदार निभाया है और न सिर्फ अपनी उम्र से बल्कि अदाओं से भी वे इसके लिए एकदम फिट साबित हुई थीं. सुपरहिट रोमैंटिक ड्रामा में भोली-भाली प्रेम दीवानी का रोल करने के लिए जूही ने उस साल बेस्ट फीमेल डेब्यू का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता था.

हालांकि अगर जूही चावला के ही पैमानों पर देखें तो उनके इस अभिनय को बहुत कमाल तो नहीं कहा जा सकता है, लेकिन इस बात से इंकार नहीं है कि यह आगे के लिए उम्मीदें जगाने वाला जरूर था. ‘इमोशनल सीन्स’ में उनके कुछ ‘एक्सप्रेशन्स’ तो एकदम कमाल के हैं लेकिन कई बार मासूम शक्लें और आवाज बनाकर बोलते हुए वे बनावटी सी भी लगती हैं. कई दृश्य जिस तरह से लिखे गए हैं कि अब उन्हें देखते हुए आपकी हंसी भी छूट सकती है लेकिन उस दौर और चलन के हिसाब से ये न सिर्फ परफेक्ट थे बल्कि जूही के अभिनय ने भी उन्हें सार्थक बनाया था. मगर यह बात उनके हर दृश्य के लिए नहीं कही जा सकती.

क्यूएसक्यूटी में जूही चावला जिस सभ्य सुशील कन्या के अवतार में नज़र आती हैं, यह छवि सालों उनकी फिल्मों में बार-बार दोहराई गई. उदाहरण के लिए ‘स्वर्ग,’ ‘साजन का घर,’ ‘डर’ और तमाम फिल्मों में वे ऐसी ही भोली प्रेमिका बनती रहीं. इस फिल्म में आंखें मिचका कर और मुंह बनाकर कॉमेडी करने वाली जूही बस जरा सा ही दिखाई देती हैं. हालांकि यहां पर वे ऐसी कोशिश करते हुए बचकानी ही लगती हैं. शायद तब उन्हें खुद भी अपने इस सिग्नेचर अंदाज के बारे में पता न रहा हो और वे इसे करते हुए बहुत सहज न रही हों. लेकिन बाद के सालों में ‘मिस्टर एंड मिसेस खिलाड़ी,’ ‘हम हैं राही प्यार के’ या ‘आमदनी अठन्नी खर्चा रुपया’ सहित लगभग हर फिल्म में, कम या ज्यादा उनका यह स्टाइल नजर जरूर आया, पसंद भी किया गया और सफल भी रहा.

हां, यह फिल्म उस जूही की झलक तो बिल्कुल भी नहीं दिखा पाती जो बाद के सालों में ‘गुलाब गैंग,’ ‘चॉक एंड डस्टर’ और ‘झंकार बीट्स’ जैसी फिल्मों में नज़र आती है. उस समय अगर ऐसी कोई स्क्रिप्ट लिखी भी गई होती तो उन भूमिकाओं के लिए शायद ही जूही के नाम पर गौर किया जाता जिन्हें बाद में उनके कारण ही जाना जाता है.

कत्थक में ट्रेन्ड डॉन्सर जूही के कमाल के डॉन्स को अच्छी तरह ना भुना पाने के अलावा क्यूएसक्यूटी उनकी वह खनकदार हंसी दिखाने से भी चूक जाती है जो बाद में उनकी पहचान का हिस्सा बन गई. इस फिल्म में जूही चावला को देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल रहा होगा कि यह अभिनेत्री सुपरस्टार श्रीदेवी और धीरे-धीरे करके छा रही माधुरी दीक्षित को कड़ी टक्कर देने वाली है.

कुल मिलाकर कहने का मतलब यह है कि क्यूएसक्यूटी यह तो दिखाती है कि हिंदी सिनेमा को बॉर्बी डॉल जैसी दिखने वाली एक बेहद खूबसूरत अभिनेत्री मिल गई है लेकिन आने वाले वक्त में पेड़ों के इर्द-गिर्द नाचने के अलावा वे और क्या कमाल दिखाने वाली है, इसका अंदाजा जरा भी नहीं दे पाती. बॉलीवुड में रोमांटिक कॉमेडी ‘रॉम-कॉम’ के अनोखे मापदंड तय करने का जरा भी नहीं और उनके करियर की इस लंबाई और ऊंचाई का तो बिल्कुल भी नहीं.