व्यापार युद्ध में अमेरिका से टक्कर ले रहे और अंतरिक्ष विज्ञान में नई सफलताएं पा रहे चीन ने हाल ही में अपने एक और कारनामे से दुनिया का ध्यान खींचा है. बीते हफ़्ते यहां टेलीविजन पर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) तकनीक की मदद से दो कृत्रिम एंकरों से ख़बर पढ़वाई गई है. देखने में हू-ब-हू इंसान लगने वाले इन कृत्रिम एंकरों को लेकर चीन की सरकारी न्यूज़ एजेंसी शिन्हुआ ने दावा किया कि ये ‘कंप्यूटरीकृत दिमाग़’ से चलने वाले दुनिया के पहले एआई न्यूज़ एंकर हैं.

ख़बरों के मुताबिक़ चीन के जेझियांग प्रांत में आयोजित पांचवीं ‘वर्ल्ड इंटरनेट कॉन्फ़्रेंस’ में इन्हें पेश किया गया. शिन्हुआ और चीन की सर्च इंजन कंपनी Sogou.com ने मिलकर इन्हें तैयार किया है. ये दोनों एआई एंकर शिन्हुआ के दो असली एंकरों के ‘डुप्लीकेट’ हैं. एजेंसी ने बताया कि उसने इन्हें अपनी आधिकारिक रिपोर्टिंग टीम में भी शामिल किया है. शिन्हुआ के मुताबिक़ एआई एंकरों के आने से भविष्य में न सिर्फ़ समाचार संस्थान के रूप में उसकी कार्यकुशलता बेहतर होगी, बल्कि इससे प्रोडक्शन की लागत में भी कमी आएगी.

दुनियाभर में इस ख़बर को असली एंकरों के लिए ख़तरा बताया गया. कहा गया कि समाचार चैनलों के एंकरों को संस्थान भारी वेतन देते हैं. इसके बदले उनसे हफ़्ते के सातों दिन, चौबीसों घंटे काम नहीं करवाया जा सकता. शारीरिक व मानसिक सीमाओं के अलावा व्यक्तिगत अधिकारों से जुड़े नियम-क़ानून इसकी इजाज़त नहीं देते कि किसी इंसान से लगातार काम करवाया जाए. लेकिन एआई एंकरों के साथ यह स्थिति नहीं रहेगी. ख़बरों के मुताबिक़ कुछ और सुधारों के बाद चीन में इन एंकरों से 24 घंटे बुलेटिन पढ़वाए जाएंगे. चूंकि ये इंसान नहीं हैं तो जाहिर है कि ये न तो ये थकेंगे और न ही लगातार काम करवाए जाने पर आपत्ति या विरोध दर्ज कराएंगे. ऐसे में यह डर बेवजह नहीं हैं कि ये ‘नक़ली’ एंकर भविष्य में असली एंकरों के लिए ख़तरा बन सकते हैं.

अब सवाल है कि क्या यह नई खोज सिर्फ न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग को और कुशल व किफ़ायती बनाने की है, और क्या इस तकनीक का ख़तरा केवल असली एंकरों की नौकरियों तक सीमित है? कई जानकारों का कहना है कि पत्रकारिता में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस तकनीक को एक सीमा से ज़्यादा बढ़ावा देना कई मायनों में ख़तरनाक है. उनके मुताबिक़ यह न सिर्फ़ असली पत्रकारों और जनता के बीच के रिश्ते को ख़त्म करने का काम करेगी, बल्कि लोकतंत्र को कमज़ोर करने का ज़रिया भी बन सकती है. चीन के संदर्भ में यह आशंका और बढ़ जाती है जहां राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पहले से ही कमज़ोर होती जा रही है.

इस आशंका को समझने के लिए अंतरराष्ट्रीय ग़ैर-सरकारी व ग़ैर-लाभकारी संगठन ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर’ (आरडब्ल्यूबी) की एक रिपोर्ट पर ग़ौर करने की ज़रूरत है. संगठन की इस साल की रिपोर्ट के मुताबिक़ प्रेस की आज़ादी के लिहाज़ से चीन पिछले साल दुनिया के 180 देशों में 176वें स्थान पर रहा. यानी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला यह देश पत्रकारों व प्रेस को खुले और बेख़ौफ़ माहौल में काम करने देने के मामले में सबसे नीचे के पांच देशों में आता है.

आरडब्ल्यूबी के मुताबिक़ प्रेस की आज़ादी के लिए ज़रूरी क़दम उठाने के बजाय शी जिनपिंग पत्रकारिता के क्षेत्र में एक तरह का ‘सोशल मॉडल’ थोपने में लगे हुए हैं, जिसमें वे कामयाब होते भी दिखते हैं. इस मॉडल के ज़रिए वे अपने यहां के सरकारी और निजी क्षेत्र के प्रेस पर नियंत्रण और मज़बूत करते जा रहे हैं. विदेशी पत्रकारों के लिए भी चीन में काम करना मुश्किल होता जा रहा है. आरडब्ल्यूबी के मुताबिक़ चीन में कम से कम 50 पत्रकारों और ब्लॉगरों की जान को ख़तरा है.

इस स्थिति के लिए चीन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना होती रही है, हालांकि वह इन आलोचनाओं से बेफ़िक्र ही दिखता है. वहीं, शी जिनपिंग अपने यहां ऐसी स्थिति बनाने में भी लगे हुए हैं जिसमें उनकी सरकार किसी ख़बर को लेकर प्रेस पर कार्रवाई भी कर दे और उसकी आलोचना भी न हो. यही वजह है कि चीन की सरकार इस तकनीक के ज़रिए एक ‘नई अंतरराष्ट्रीय मीडिया व्यवस्था’ स्थापित करने की कोशिश में हैं. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के ज़रिए ऐसा किया जा सकता है. इसे समझने के लिए यहां एक वाक़ये का ज़िक्र ज़रूरी है.

चीन की एक इंटरनेट कंपनी टेनसेंट ने अपने एक मैसेजिंग एप्लिकेशन के लिए दो चैटबॉट (रोबोट) निर्मित किए थे. ये एआई रोबोट एप्लिकेशन के 80 करोड़ यूज़रों को हल्के-फुल्के मज़ेदार जवाब देते थे. पिछले साल एक यूज़र ने बेबीक्यू नाम के रोबोट से पूछ लिया कि क्या वह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को पसंद करता है. रोबोट ने इसके जवाब में कहा, ‘नहीं.’ फिर एक और वेब यूज़र ने कहा, ‘कम्युनिस्ट पार्टी अमर रहे’. इस पर बेबीक्यू ने यूज़र से कहा, ‘क्या तुम्हें लगता है कि ऐसा भ्रष्ट और अयोग्य राजनीतिक दल लंबे वक़्त तक टिक सकता है?’

इसके अलावा एआई रोबोट से पूछा गया कि लोकतंत्र के बारे में उसके क्या विचार हैं. इस सवाल के जवाब में बेबीक्यू ने कहा, ‘लोकतंत्र बहुत ज़रूरी है.’ रोबोट ने चीनी सरकार को लेकर ऐसी कुछ और बातें कही थीं जो (सरकार के डर की वजह से) कंपनी को नागवार गुज़रीं. इसके बाद उसने दोनों रोबोट को एप्लिकेशन से हटा लिया और बयान जारी किया कि कुछ बदलावों के बाद एप्लिकेशन सर्विस को दोबारा शुरू किया जाएगा.

यह वाक़या ये बताने के लिए काफ़ी है कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के ज़रिए चीन ही नहीं बल्कि एशियाई महाद्वीप में मीडिया सेंसरशिप कितनी आसान हो सकती है. वैसे भी यहां की सरकारों पर तमाम तरीक़ों से पत्रकारों को दबाने, धमकाने, यहां तक कि उनकी हत्या कराने के आरोप लगते रहे हैं. इसके चलते उनके व अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के बीच संघर्ष की स्थिति हमेशा बनी रहती है. लेकिन अगर न्यूज़रूम का ज़्यादातर काम कंप्यूटरी दिमाग़ से होने लगे तो सरकारें अपने कामकाज और नीतियों की आलोचना से भी बच पाएंगी और अपना प्रोपेगैंडा चलाने में भी उन्हीं काफ़ी आसानी हो जाएगी. कई जानकारों के मुताबिक़ यही वजह है कि चीन अपने यहां सभी प्रकार के मीडिया के लिए इस तकनीक को लाए जाने की बात कह रहा है.