कहीं सुना है आपने कि फ़ौज के सेनापति को उसका मातहत बोले कि अगर उसने युद्ध की जानकारी लेने के लिए अफ़सर भेजे तो वह उन्हें गिरफ्तार कर लेगा? कहीं सुना है आपने कि सेनापति के मैदाने जंग से पीछे हट जाने के आदेश को उसका मातहत मानने से इंकार कर दे? फ़ौज के कायदे कानून के लिहाज़ से ये नाफ़रमानियां होती हैं जिनके लिए कोर्ट मार्शल भी हो जाता है.

पर कभी-कभी ऐसी नाफ़रमानियां अदम्य साहस की पहचान बन जाती हैं. 1965 की जंग में ऐसा ही हुआ था. तब यह तथाकथित नाफ़रमानी करने वाले थे तत्कालीन लेफ्टिनेंट जनरल हरबक्श सिंह. वे जिनके सिर 1965 में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भारत की निर्णायक बढ़त का सेहरा है.

1897 की सारगढ़ी की लड़ाई से रिश्ता

हरबक्श सिंह का जन्म संगरूर (पंजाब) में हुआ था. फ़ौज खून में थी. इनके पिता हरनाम सिंह फ़ौज में डॉक्टर थे. हरनाम सिंह का परिचय यह भी हो सकता है कि सारगढ़ी की महान जंग को उन्होंने अपनी आंखों से देखा था. इस जंग के बारे में तो आपने सुन ही रखा होगा. यह ऐसी असाधारण लड़ाई थी जिसमें सिख रेजिमेंट की 4 सिख यूनिट के 22 सिख जवानों ने 10,000 पठानों से भिड कर अपनी जान गंवा दी पर पीछे नहीं हटे! किस्मत का फेर देखिये, आगे चलकर हरबक्श सिंह की ज़िन्दगी में वह मुक़ाम आया जब उन्हें 4 सिख यूनिट की अगुवाई करने का मौका मिला. इस यूनिट ने 1965 की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी.

लाहौर में कॉलेज की पढ़ाई करते हुए हरबक्श सिंह को हॉकी से जूनून हो गया. बाद में अक्सर वे कहा करते कि अगर दूसरा विश्व युद्ध नहीं होता तो वे हॉकी के खिलाड़ी बनते. दिलचस्प बात यह भी है कि उन्होंने मेजर ध्यानचंद के ख़िलाफ़ हॉकी खेली थी. पढ़ाई के बाद हरबक्श सिंह ने ब्रिटिश भारतीय फ़ौज को अपना मुक़ाम चुना.

जब जापानी फ़ौज ने बंदी बनाया

हरबक्श सिंह के बड़े भाई गुरबक्श सिंह भी ब्रिटिश भारतीय फ़ौज में लेफ्टिनेंट कर्नल थे. जापानियों के साथ जंग के दौरान दोनों भाई, जो कि एक ही यूनिट में थे, बंदी बना लिए गए. जापानियों की हार के बाद ब्रिटिश अफ़सर ने गुरबक्श सिंह से उन जापानी अफसरों के नाम जानने चाहे जिन्होंने उनकी टुकड़ी को संभावित यातनाएं दी थीं. अपनी क़िताब ‘इन द लाइन ऑफ़ ड्यूटी’ में हरबक्श सिंह ने इस क़िस्से को याद करके लिखा है, ‘ज़ाहिर था अब जापानियों को युद्ध बंदी बनाया जाना था. नाम लिए जाने पर अंग्रेज़ जापानियों के साथ रियायत नहीं बरतते. गुरबक्श सिंह के आदेश हमने किसी भी जापानी अफ़सर का नाम नहीं लिया.’

ब्रिटिश अफसर के जाने के बाद जापानी सेना का मेजर जनरल उनके भाई के सामने आया और उन्हें भरी आंखों सेल्यूट करते हुए कहा कि गुरबक्श उससे बड़े अफ़सर हैं. वह कुछ आगे गया फिर पीछे मुड़ा और मेरे भाई से सिगरेट पीने की इज़ाज़त मांगी. वे लिखते हैं, ‘तय हुआ था कि जो कुछ भी जापानियों ने किया, वह जंग के चलते किया था न कि आपसी रंजिश के कारण. इसलिए, किसी भाई ने किसी को भी यातनाएं देने के लिए गुनाहगार नहीं माना.’

पंजाब के वर्तमान मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह उनके एडीसी रहे हैं. अपने एक लेख में अमरिंदर सिंह ने भी ज़िक्र किया है कि हरबक्श सिंह तीन साल तक जापानियों के युद्ध बंदी रहे. इस दौरान वे कुपोषण और बीमारियों का शिकार हुए. उनका प्रमोशन तय था, पर उन्होंने 4 सिख यूनिट का डिप्टी कमांडिंग ऑफिसर बनना मंज़ूर किया! क़ैद रहने की वजह से वे इतने कमज़ोर हो गए थे कि उन्होंने घोड़े पर बैठकर परेड की सलामी ली थी. उनकी फ़ौजी ज़िंदगी में कई अहम पड़ाव आए जब उन्होंने ऐसे निर्णय लिए जो चौंकाने वाले थे.

1948 में कश्मीर बचाया

अक्टूबर 1947 को कबायलियों और पाकिस्तानी सेना के जवानों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया था. तब लेफ्टिनेंट कर्नल हरबक्श सिंह 161 ब्रिगेड की कमान संभाल रहे थे. एक महीने के अन्दर कबायली श्रीनगर तक चले आये थे. 22 नवंबर, 1947 को हरबक्श सिंह की अगुवाई में सिख और कुमाऊं बटालियनों ने लगभग 3000 कबायलियों पर ज़बरदस्त हमला बोलकर उन्हें शहर से दूर खदेड़ दिया. इस बहादुरी का नतीजा उन्हें पदोन्नति के रूप में मिला. वे कर्नल बनाये गए.

1962 का हादसा

चीन ने अक्टूबर 1962 में भारत पर हमला बोला था. तब नेफ़ा बॉर्डर पर बीएम कौल ‘जनरल ऑफिसर इन कमांडिंग’ (जीओसी) थे. चीनी सैनिकों ने बॉर्डर पर अफ़रातफ़री मचा दी थी. रामचंद्र गुहा ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि अचानक जनरल कौल बीमार हुए और दिल्ली चले आए. उनकी जगह बेहद प्रतिष्ठित मेजर जनरल हरबक्श सिंह की नियुक्ति हुई. इसके पहले कि वे कुछ कारनामा कर पाते, कौल ने वापस आकर अपनी कमान संभाल ली.’

जानकार बताते हैं कि तत्कालीन सेनाध्यक्ष पीएन थापर ने कौल के दोबारा कमान संभालने का विरोध किया था, जिसे रक्षा मंत्री वीके मेनन ने दरकिनार कर दिया. कौल की जवाहरलाल नेहरू और मेनन से नज़दीकी तब चर्चा का विषय होती थी. यह भी कहा जाता है कि अगर हरबक्श सिंह नेफ़ा मोर्चे पर होते तो शायद उस जंग परिणाम कुछ और ही होता.

1965 की लड़ाई

1965 में पकिस्तान ने गुजरात के कछ इलाके से घुसपैठ शुरू की थी, जो सुनियोजित तरीक़े से जंग में बदल दी गयी. इस दौरान हरबक्श सिंह पश्चिम कमांड के जीओसी थे, उनकी ज़िम्मेदारी में लद्दाख से लेकर पंजाब तक का इलाका था. भारत-पाक लड़ाई का केंद्र कश्मीर और पंजाब के इलाके हो गए थे. यानी, सब कुछ अब लेफ्टिनेंट जनरल हरबक्श सिंह के हवाले था. जीत उनके सिर होती और अगर हार होती तो उसका भी बोझ उनके कंधों पर गिरता.

हरबक्श सिंह ने लाहौर पर चढ़ाई का ख़ाका तैयार किया था जो काफ़ी साहसी कदम था. कुलदीप नैयर ‘बियॉन्ड द लाइन्स’ में लिखते हैं कि हरबक्श सिंह का प्लान था कि अगर पाकिस्तान कश्मीर की तरफ़ बढ़ता है तो भारतीय सेना को पाकिस्तान में घुसना होगा. यानी प्रतिरक्षा की नीति न अपनाकर, हमला बोलना होगा. इसी योजना पर आगे भी बढ़ा गया. पाकिस्तान छम्ब (जम्मू) सेक्टर में हमला बोलते हुए सीमा के काफ़ी अन्दर तक आ गया था. भारतीय सेनाध्यक्ष और दिल्ली सरकार तब पशोपेश में थी कि हमला बोला जाए कि रोका जाए. हरबक्श सिंह ने नेहरू की बात का हवाला देते हुए कहा कि कश्मीर पर हमला, भारत पर हमला है. पर दिल्ली में अब भी कशमकश जारी थी.

लाहौर में भारतीय फौज

पकिस्तान ने ब्यास नदी के किनारे भारतीय सेना को काफ़ी नुकसान पहुंचाया था. ख़तरा यह था कि पाक़िस्तानी फ़ौजें नदी पार कर हिंदुस्तानी सीमा के भीतर घुस जायेंगी. तत्कालीन सेनाध्यक्ष जेएन चौधरी ने 9-10 सितंबर की दरमियानी रात को हरबक्श सिंह को फ़ोन कर हमला करने के बजाए हमला रोकने की रणनीति बनाने का आदेश दिया. कैप्टन अमरिंदर सिंह बताते हैं कि फ़ोन पर दोनों के बीच तीखी बहस हो गयी और हरबक्श सिंह ने जनरल चौधरी का आदेश ठुकरा दिया. कहा जाता है कि उस रात हरबक्श ने कहा था कि एक बार पंजाब खो (विभाजन के दौरान) दिया है, दोबारा ऐसा नहीं हो सकता. उन्होंने अपनी रणनीति कायम रखी भारतीय सेना लाहौर जा पंहुची थी.

1965 की लड़ाई का अंत जल्द ही हो गया. भारतीय सेना ने पाकिस्तान के मुक़ाबले ज़्यादा बड़े इलाके पर कब्ज़ा कर लिया था. पाकिस्तान ने घुटने टेक दिए. ताशकंद समझौते के बाद ये सारे इलाके पाकिस्तान को वापस कर दिए गए.

क्या लाल बहादुर शास्त्री ने उन्हें सेनाध्यक्ष बनाने का वादा किया था?

ऐसा खुद हरबक्श सिंह ने दावा किया था. उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री को ख़त लिखकर सेनाध्यक्ष जेएन चौधरी को पद्म विभूषण दिए जाने का विरोध किया था. उनके मुताबिक़ जनरल चौधरी जंग के दौरान सिर्फ़ तीन बार ही उनसे मिलने आये थे. तत्कालीन रक्षा मंत्री वाईबी चव्हाण ने उन्हें कहा कि ये सिर्फ़ रस्म अदायगी है और वे जनरल चौधरी के बाद सेनाध्यक्ष बनाये जायेंगे. ताशकंद में लाल बहादुर शास््री चल बसे और कुछ समय बाद चव्हाण की भी मृत्यु हो गयी.

जो भी है, जब भी 1965 के युद्ध का इतिहास लिखा जाएगा, लेफ्टिनेंट जनरल हरबक्श सिंह को उनके सेनाध्यक्ष से ज़्यादा याद किया जाएगा.