राजस्थान विधानसभा चुनावों के लिए नामांकन का दूसरा दिन बीत जाने के बाद भी कांग्रेस पार्टी की तरफ से प्रत्याशियों की कोई सूची सामने नहीं आई है. इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं. इनमें से एक यह भी था कि पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अशोक गहलोत इस चुनावी दंगल में ताल ठोकना चाहते थे जबकि पार्टी प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट को ऐसा करने में झिझक महसूस हो रही थी. लेकिन, बुधवार को दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अशोक गहलोत ने बयान दिया है कि वे और सचिन पायलट दोनों ही इन चुनावों में मैदान में उतरेंगे.

ज़ाहिर तौर पर अशोक गहलोत ने यह घोषणा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की मंजूरी के बाद ही की है. सचिन पायलट ने भी बयान जारी इस बात की पुष्टि कर दी है. लेकिन वे इससे खुश शायद ही हों!

विश्लेषकों के मुताबिक पिछले लोकसभा चुनाव में अपनी अजमेर सीट पर फतेह हासिल करने में नाकाम रहे सचिन पायलट अपने लिए कोई ऐसी सीट नहीं तलाश पाए हैं जहां से वे आंख मूंद कर दांव खेल सकें. अजमेर से भाजपा सांसद सांवरलाल जाट के निधन के बाद वहां बीती जनवरी में हुए उपचुनाव में भी पायलट ने खुद सामने आने के बजाय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रघु शर्मा को आगे कर दिया था. हालांकि कई राजनीतिकारों के अनुसार यह निर्णय लेकर सचिन पायलट ने अपने रणनैतिक कौशल का परिचय दिया था. लेकिन राजस्थान के राजनैतिक हलकों में कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष के इस कदम के पीछे उनके कम आत्मविश्वास की भी चर्चा खूब हुई.

अब जब विधानसभा चुनाव की बारी आई तो एक बार फिर कयास लगने लगे थे कि सूबे में कांग्रेस के बहुमत साबित करने तक सचिन पायलट कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते. उनके डर के पीछे 2008 के विधानसभा चुनावों को भी वजह के तौर गिनाया जाता है जब कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार और पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सीपी जोशी नाटकीय ढंग से एक वोट से चुनाव हारकर राज्य के मुखिया की रेस से बाहर हो गए और यह ताज अशोक गहलोत के सर सजा. जोशी समर्थक उनकी हार के लिए जिम्मेदार कारणों का ज़िक्र करते हुए अशोक गहलोत की तरफ प्रमुखता से उंगलियां उठाते रहे हैं.

प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि चुनाव में कांग्रेस के बढ़त हासिल करने की स्थिति में मुख्यमंत्री पद पर आमराय बनाने के लिए आयोजित बैठक में जीते हुए विधायक होंगे, प्रदेशाध्यक्ष होने के नाते सचिन पायलट होंगे और दिल्ली से आने वाले दो पर्यवेक्षक शामिल रहेंगे. ऐसे में पायलट शायद मान कर चल रहे थे कि चूंकि अशोक गहलोत न तो प्रदेश संगठन में किसी पद पर हैं और विधानसभा चुनाव न लड़ पाने पर वे तब विधायक भी नहीं होंगे, तो उन्हें इस बैठक से दूर रख वे अपने पक्ष में आसानी से माहौल बना पाएंगे. कुछ राजनीतिकारों की मानें तो इसे देखते हुए ही अशोक गहलोत जानबूझकर लगातार चुनाव लड़ने की इच्छा ज़ाहिर कर पिछले कुछ महीनों से पायलट पर दवाब बनाते रहे थे.

सूत्रों के मुताबिक इस चुनौती से पार पाने के लिए सचिन पायलट ने मध्य प्रदेश की ही तर्ज़ पर पार्टी हाईकमान के सामने दलील दी कि न सिर्फ उन्हें बल्कि गहलोत और सीपी जोशी जैसे कद्दावर नेताओं को बजाय एक क्षेत्र में ही सीमित करने के पूरे प्रदेश में पार्टी को संभालने की बागडौर सौंपी जानी चाहिए. बताया जाता है कि इस तर्क़ के जवाब में गहलोत का कहना था कि वे पांच बार लोकसभा में और चार बार विधानसभा चुनावों में पार्टी द्वारा दी गई प्रदेश स्तरीय जिम्मेदारी संभालने के साथ अपने क्षेत्र में विजय पताका फहराने में भी सफल रहे हैं. ऐसे में पार्टी के दिग्गज नेताओं को कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए झिझकने की बजाय फ्रंट फुट पर आकर खेलना चाहिए.

कांग्रेस से जुड़े एक विश्वसनीय सूत्र के शब्दों में ‘रविवार देर रात भाजपा की तरफ से जारी की गई प्रत्याशियों की पहली सूची में शामिल मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के नाम को भी सचिन पायलट के तर्क की काट के तौर पर इस्तेमाल किया गया, कि एक तरफ भाजपा की सिपहसालार खुलकर सामने आ चुकी हैं और कांग्रेस के मुखिया हैं कि पीछे हटने के तमाम बहाने बना रहे हैं. नतीजतन सचिन पायलट को चुनाव लड़ने के लिए बेमन से अपनी सहमति जतानी पड़ी.’

विश्लेषकों का कहना है कि इस घोषणा के बाद जहां गहलोत और उनके समर्थकों के चेहरे से खुशी साफ तौर पर देखी जा सकती है, वहीं सचिन पायलट और उनके करीबियों का तनाव भी आसानी से महसूस किया जा सकता है. दरअसल, इस बात से एक संदेश यह भी गया है कि पायलट की तमाम कोशिशों के बावजूद कांग्रेस हाईकमान राजस्थान में गहलोत की राय के विपरीत कदम नहीं उठाना चाहता है. जानकारों की मानें तो दिल्ली में सचिन पायलट को लगातार दो दिन में यह दूसरा झटका लगा है. इससे पहले मंगलवार को राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष और अब तक पायलट के करीबी माने जाने वाले रामेश्वर डूडी ने उनकी पसंद के उम्मीदवारों के नाम पर आपत्ति जताते हुए कथित तौर पर उनसे कहा था कि वे यदि राजनीति को कल छोड़ते हों, तो आज ही छोड़ दें.