2019 के आम चुनावों के लिए महागठबंधन बनाने की कवायद तहत आज दिल्ली में विपक्षी पार्टियों की एक बैठक हो रही है. इस कवायद के सूत्रधार आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू हैं. कुछ दिन पहले इस बैठक की जानकारी देते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा था. उन्होंने कहा था कि मोदी चुनावी प्रधानमंत्री हैं और देश को ऐसा प्रधानमंत्री चाहिए जो शासन करे.

तेलुगू देशम पार्टी के अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू जिस तरह से पूरे विपक्ष को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र में सत्ताधारी भाजपा के खिलाफ गोलबंद करने में लगे हैं, उससे साफ लगता है कि वे विपक्षी एकजुटता के केंद्र में आ गए हैं. वे दक्षिण भारत सहित राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्ष को भाजपा और नरेंद्र मोदी के खिलाफ एकजुट करने में लगे हैं. कुछ समय पहले वे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मिले. फिर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी प्रमुख शरद पवार और बहुजन समाज पार्टी की सर्वेसर्वा मायावती के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी से भी उनकी मुलाकात हुई. यह सिलसिला आज की बैठक तक आ गया है.

राष्ट्रीय स्तर पर पूरे विपक्ष को एकजुट करने की कोशिशों के बीच चंद्रबाबू नायडू दक्षिण भारत में यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि भाजपा को इस क्षेत्र से बहुत कम सीटें मिलें. दक्षिण भारत के पांच राज्यों आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के साथ पुद्दुचेरी को भी जोड़ लें तो यहां 130 लोकसभा सीटें हैं. इन पांच राज्यों में से सिर्फ कर्नाटक ही एक ऐसा राज्य है जहां भाजपा ने किसी राज्य सरकार का नेतृत्व किया है. कर्नाटक में भाजपा का सांगठनिक ढांचा भी है. इसी साल हुए कर्नाटक विधानसभा चुनावों के बाद भी भाजपा सबसे बड़ी पार्टी रही. इसके बावजूद वह सत्ता से बेदखल हो गई तो इसकी वजह उसे पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के साथ-साथ अलग-अलग चुनाव लड़े कांग्रेस और जनता दल सेकुलर का साथ आना भी रहा.

कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल सेकुलर के गठबंधन ने भाजपा के लिए यहां की चुनौती मुश्किल कर दी है. इसकी झलक लोकसभा और विधानसभा की कुछ सीटों के लिए हाल ही में हुए उपचुनावों में भी दिखी. कुल पांच सीटों में से चार पर कांग्रेस और जनता दल सेकुलर को जीत हासिल हुई.

अक्सर कर्नाटक से यह खबर आती है कि कांग्रेस और जेडीएस के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. दोनों पार्टियों के प्रदेश स्तर के नेताओं के बीच टकरावों को लेकर भी तरह-तरह की कयासबाजी चलती है. लेकिन चंद्रबाबू नायडू कर्नाटक की राजनीति में इस तरह से दखल दे रहे हैं कि कांग्रेस और जेडीएस का गठबंधन बना रहे. पिछले दिनों उन्होंने जेडीएस के संस्थापक, पूर्व प्रधानमंत्री और कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के पिता एचडी देवगौड़ा से मुलाकात की. इसके बाद नायडू कुमारस्वामी से भी मिले. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से भी उनकी मुलाकात हुई थी. बताया जा रहा है कि कर्नाटक की राजनीति में हर पक्ष से चंद्रबाबू नायडू ने यही कहा है कि गठबंधन हर हाल में बचना चाहिए और अगर यह बचा रहा तो अगले लोकसभा चुनावों में कर्नाटक में भाजपा की दाल नहीं गलने वाली.

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लिए चंद्रबाबू नायडू ने कांग्रेस को साथ लेकर महागठबंधन बना लिया. इस महागठबंधन में इन दोनों राज्यों में सक्रिय वामपंथी दल भी हैं और कुछ छोटी स्थानीय पार्टियां भीं. औपचारिक तौर पर इस महागठबंधन ने अभी तेलंगाना विधानसभा चुनावों के लिए आकार लिया है, लेकिन कई मानते हैं कि यह आगे भी जा सकता है. तेलंगाना में इस महागठबंधन के दलों के बीच सीटों का जो बंटवारा हुआ उससे स्पष्ट है कि जहां चंद्रबाबू नायडू की पार्टी बेहद मजबूत नहीं है, वहां उन्हें कांग्रेस के पीछे चलने में भी परहेज नहीं है. तेलंगाना में तेलुगू देशम पार्टी कांग्रेस के मुकाबले काफी कम सीटों पर चुनाव लड़ी.

चंद्रबाबू नायडू तमिलनाडु की क्षेत्रीय पार्टियों के जरिए भी भाजपा के लिए मुश्किलें पैदा करने की गोलबंदी में भी जुटे हुए हैं. भाजपा के बारे में यह कहा जाता है कि वह सत्ताधारी अन्नाद्रमुक के साथ ज्यादा सहज है. हालांकि, दोनों दलों में कोई औपचारिक गठबंधन नहीं है. लेकिन जयललिता के निधन के बाद अन्नाद्रमुक पर भाजपा का प्रभाव बढ़ा है.

ऐसे में चंद्रबाबू नायडू डीएमके को साधने की कोशिश करते दिख रहे हैं. करुणानिधि के निधन के बाद स्टालिन के हाथों में पार्टी आ गई है. चंद्रबाबू नायडू ने पिछले दिनों उनसे मुलाकात की. इस मुलाकात के बाद ऐसी खबरें आईं कि उन्होंने स्टालिन से विपक्षी एकजुटता को मजबूत करने के संबंध में बात की और उन्हें इस प्रस्ताव के प्रति स्टालिन का रुख सकारात्मक लगा. चंद्रबाबू नायडू डीएमके को विपक्षी खेमे में संभवतः इसलिए भी लाना चाहते हैं कि अन्नाद्रमुक को इस बार सत्ताविरोधी लहर का भी सामना करना पड़ेगा और चुनावी संभावनाओं के लिहाज से डीएमके की स्थिति अधिक मजबूत रह सकती है.

केरल में भी भाजपा की स्थिति बहुत अच्छी नहीं रही है. हालांकि, पिछले कुछ समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इसकी सहयोगी संस्थाओं के जरिए भाजपा काफी हाथ-पांव मार रही है लेकिन अब भी चुनाव जीतने के लिहाज से भाजपा बहुत अच्छी स्थिति में नहीं है. सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर उच्चतम न्यायालय के निर्णय ने केरल में भाजपा को ध्रुवीकरण का एक मुद्दा जरूर दिया है. इसके बावजूद केरल में भाजपा लोकसभा चुनावों में बड़ी सफलता हासिल कर पाएगी, यह कह पाना अभी मुश्किल है.

ऐसी स्थिति में दक्षिण भारत की 130 लोकसभा सीटों पर भाजपा के लिए 2019 की राह बेहद मुश्किल दिख रही है. अक्सर कहा जाता है कि केंद्र में सरकार बनाने का रास्ता उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों से होकर जाता है क्योंकि इन दोनों राज्यों से 120 लोकसभा सांसद चुने जाते हैं. लेकिन जिस तरह से चंद्रबाबू नायडू की अगुवाई में दक्षिण भारत में भाजपा की घेरेबंदी हो रही है, उससे लगता है कि नरेंद्र मोदी के लिए 2019 की राह मुश्किल करने में दक्षिण भारत की अहम भूमिका होने वाली है और इसके मुख्य किरदार चंद्रबाबू नायडू रहने वाले हैं.