बीते कुछ समय से आरोप लग रहे हैं कि सरकार न्यायपालिका में दखलअंदाजी करने की कोशिश कर रही है. पर आज भी एक बड़ा वर्ग यही मानता है कि सर्वोच्च न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट वह जगह है जहां संविधान अपने आपको सुरक्षित महसूस कर सकता है. ऐसा जिन न्यायविदों के कारण है उनकी सूची में जस्टिस वीआर कृष्णा अय्यर को सबसे ऊपर रखा जाता है. कुछ समय पहले एक साक्षात्कार में भारत के पूर्व कानून मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता शांति भूषण का कहना था, ‘मेरे विचार से जस्टिस कृष्णा अय्यर आज तक सुप्रीम कोर्ट में जितने भी न्यायाधीश हुए उनमें सबसे महान जज थे.’

जस्टिस वैद्यनाथन रामा कृष्णा अय्यर को भारतीय न्याय व्यवस्था में विवेक कायम रखने का श्रेय दिया जाता है. उनके फ़ैसले आज भी सुप्रीम कोर्ट के कमरों में गाहे-बगाहे बतौर नज़ीर आ जाते हैं. नियति ने उनके लिए एक दिन ऐसा भी तय कर दिया था जब लोकतंत्र को बचाने के लिए उन्होंने एक दिन में निर्णय दिया. यह दिलचस्प किस्सा है. और हां, उस दिन बेंच नहीं थी, सिर्फ़ वही थे.

यह किस्सा है इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण केस का. इसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा की चुनावी जीत को असंवैधानिक ठहरा रख देश की सांसें रोक दी थी. पर इसके बाद क्या हुआ, यह कम ही ज्ञात है. क्या इंदिरा सुप्रीम कोर्ट नहीं गयी होंगी? ज़ाहिर है, वे प्रधानमंत्री थीं, देश की सबसे बड़ी पार्टी की मुखिया थीं और इलाहबाद हाई कोर्ट के निर्णय के बाद देश में संवैधानिक संकट पैदा हो गया था.

हाई कोर्ट के फ़ैसले से स्तब्ध कांग्रेस पार्टी, इंदिरा गांधी, सरकार और क़ानूनी मंत्री एचआर गोखले ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने का फ़ैसला किया. मामला वीआर कृष्णा अय्यर के सामने पेश होना था. एचआर गोखले और वीआर की दोस्ती जगज़ाहिर थी. इसी दोस्ती की वजह से गोखले ने उनसे मिलने की दरख्वास्त की. कांग्रेस और इंदिरा को भी आस थी. लेकिन सबको चौंकाते हुए वीआर कृष्णा अय्यर ने गोखले से मिलने से मना कर दिया. साथ ही कहलवा दिया कि अगर उनकी (सरकार) मंशा अपील की है तो वे अपील कोर्ट में रजिस्टर करवाएं और हाई कोर्ट के निर्णय के ख़िलाफ़ अंतरिम रोक की अपील पेश करें. हारकर, कांग्रेस ने ऐसा ही किया.

चूंकि देश और लोकतंत्र पर संवैधानिक संकट था, वीआर ने अगले दिन केस की सुनवाई की तारीख दी. कोर्ट की छुट्टियां होने की वजह से, बेंच पर वे ही अकेले न्यायधीश थे. सोचिये, एक जज की ज़िंदगी में कितने उफ़ान आते हैं. शेक्सपियर ने कहा है, वही इंसान ऊंचा उठता है, जो अपने जीवन में उठ रहे ज्वारों की उत्तुंगता पर सवार हो. अगले दिन वीआर के सामने थे देश के दो सबसे काबिल वकील. इंदिरा की पैरवी के लिए नानी पालकीवाला और राज नारायण की तरफ़ से प्रशांत भूषण के पिता शांति भूषण. वही शांति भूषण जिन्होंने अय्यर को सुप्रीम कोर्ट का महानतम जज बताया है.

‘वान्ड़ेरिंग इन मैनी वर्ल्डस’ में याद करते हुए वीआर लिखते हैं कि पालकीवाला की बात से प्रभावित हुए बिना रह पाना बहुत मुश्किल होता था. उनकी भाषा, तर्कशीलता और प्रमाण अकाट्य होते थे. वहीं, शांति भूषण बड़ी तूफ़ानी पैरवी करने के लिए मशहूर थे. दोनों के पास इतनी क़ाबिलियत थी कि बिना रुके घंटों बहस कर सकते थे. वीआर कृष्णा अय्यर ने दोनों से पूछा कि उन्हें बहस के लिए कितना समय चाहिए. जवाब था - दो घंटे.

समय तेज़ी से निकला जा रहा था. वीआर और वकीलों ने दोपहर का भोजन न करने का निर्णय लिया. सुबह 10.30 पर शुरू हुई बहस शाम के पांच बजे ख़त्म हुई. वीआर कृष्णा अय्यर ने वकीलों से कहा कि वे अगले दिन दोपहर में निर्णय सुना देंगे. मुद्दा बेहद अहम था और निर्णय उससे भी अधिक. लिहाज़ा, वीआर ने देर रात तक अपने घर पर फ़ैसला लिखवाया. इस दौरान उनका घर किले में तब्दील हो गया. आवाजाही बिलकुल बंद हो गई. निर्णय की हज़ारों प्रतिलिपियां तैयार की गयीं, जो अगले दिन बांटी जानी थी. उन प्रतिलिपियों पर निर्णय क्या था? यह यक्ष प्रश्न रात भर इंदिरा, सरकार, कांग्रेस, विपक्ष और देश को परेशान करता रहा.

अगले दिन, वीआर ने अपने जीवन का सबसे अहम फ़ैसला सुनाया. उन्होंने इंदिरा गांधी की लोकसभा की सदस्यता ख़त्म कर दी पर उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने दिया. अपनी जीवनी में वे लिखते हैं कि वे इस कयासबाज़ी में नहीं पड़ना चाहते कि क्यों इंदिरा गांधी ने मौलिक अधिकारों का हनन करते हुए आपातकाल घोषित किया और क्यों जस्टिस पीएन भगवती और वाईवी चंद्रचूड़ ने आपातकाल को संवैधानिक ठहराया. उनके मुताबिक़ जब-जब भी उन्हें मौका मिला, उन्होंने इंदिरा गांधी को ज़रूर चेताया कि आपातकाल की आड़ में आम इंसानों के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती.

आजादी के बाद वीआर कृष्णा अय्यर इकलौते राजनेता हैं जिन्हें जेल जाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने का अवसर मिला हो. मई 1948 में उन्हें गिरफ्तार किया गया था. उन पर हिंसक गतिविधियों में कम्युनिस्टों की मदद करने और उन्हें छिपाने का आरोप था. हालांकि तत्कालीन मद्रास सरकार यह आरोप साबित नहीं कर सकी और एक महीना जेल में रहने के बाद वे रिहा हो गए.

कई बार मिसालें रास्ता खोजने के लिए मशाल का काम भी करती हैं. वीआर कृष्णा अय्यर के कई फैसले ऐसे ही हैं. साम्यवादी होने के बावजूद, गांधी और नेहरू से ज़बरदस्त प्रभावित वीआर ने कुछ ऐसे फैसले दिए हैं जो नज़ीर बन गए. जब-जब भी न्यायाधीशों को आगे की राह देखने की ज़रूरत महसूस हुई, इन फैसलों की तरफ देखा गया. मिसाल के तौर पर कुछ समय पहले दिल्ली सरकार बनाम राज्यपाल के वर्चस्व की लड़ाई में, शमशेर सिंह केस वीआर द्वारा सुनाए गए फ़ैसले ने कोर्ट के सामने बतौर नज़ीर काम किया. इस ऐतिहासिक फ़ैसले के पीछे अगर अगर कोई था तो वे थीं उनकी बीमार पत्नी शारदा अय्यर. यह क़िस्सा फिर कभी.

वीआर कुल सात साल सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रहे. इस दौरान उन्होंने लगभग 400 मामलों पर निर्णय दिए. यानी, हर हफ़्ते उन्होंने एक फ़ैसला सुनाया था. जब वे रिटायर हुए तो उन्हें बताया गया कि इतने समय में किसी अन्य जज की तुलना में उनकी कलम से दोगुने फ़ैसले निकले हैं. शांति भूषण के मुताबिक वीआर का दिमाग बहुत फर्राटे से भागता था.

‘ज़मानत अधिकार है और जेल अपवाद’ कहने वाले वीआर की जिंदगी में कुछ महीनों की जेल एक अहम पड़ाव रहा. यहां से न्याय के प्रति उनका दृष्टिकोण बदल गया. उन्होंने कैदियों को हथकड़ी बांधकर कोर्ट लाने पर एतराज़ जताया. उनके मुताबिक़ सम्मान से जीना हर किसी का अधिकार है और इस तरह सबके सामने लाए जाने से व्यक्ति के आत्मसम्मान पर ठेस लगती है. जेलों में बंद कैदियों को जंजीरों में रखने की व्यवस्था को भी उन्होंने ख़त्म किया.

वीआर पहले जज रहे जिन्होंने मौके पर पहुंचकर और स्थिति का जायज़ा लेकर निर्णय देने की प्रक्रिया शुरू की. इसके लिए आज भी रतलाम नगरपालिका के मामले में दिया गया उनका निर्णय एक मिसाल है. दरअसल, इसके पीछे उनके वकालत के जीवन का एक केस था जो 1940 में उन्होंने लड़ा और हारा था!. केरल के तेल्लिचेरी में मजिस्ट्रेट के सामने एक केस आया था जिसमें मकान मालिक ने गुहार लगाई थी कि उसके किरायेदार ने दरवाज़ा बंद करके शौच सफ़ाईकर्मी को आने से रोक दिया है जिससे मकान मालिक की शौच व्यवस्था गड़बड़ा गयी और चारों तरफ़ बदबू फैलने से मकान में रहना मुश्किल हो गया. वीआर किरायेदार के वकील थे. मजिस्ट्रेट ने मौका मुआयना कर हालात का जायज़ा लिया और मकान मालिक के हक़ में निर्णय दिया. वीआर ने इससे सीख लेकर अपने फ़ैसलों में कानून के मानवीय पक्ष पर और जोर दिया. इसी प्रकार उन्होंने, मृत्यु दंड को अत्यंत असाधारण मामलों तक ही सीमित रहने की बात कही.

मानव अधिकारों की बात करता उनका एक और फ़ैसला शानदार नजीर है. यह फैसला ‘मुथम्मा बनाम राज्य’ मामले में आया था. मुथम्मा विदेश सेवा की एक काबिल अधिकारी थीं, जिन्हें महिला होने के चलते न प्रमोशन मिले और न उन्हें कभी राजदूत बनाया गया. जब यह मामला वीआर के सामने आया तो उन्हें मालूम हुआ कि महिला विदेश अधिकारी को शादी के बाद इस्तीफ़ा देना पड़ता था. उन्होंने सरकार से पूछा. सोली सोराबजी ने इसके पीछे सरकार की तरफ़ से दलील पेश की कि शादीशुदा महिला अपने पति को राष्ट्रीय महत्व की जानकारियां लीक कर सकती है. वीआर कृष्णा अय्यर ने सोराबजी से कहा कि क्या शादीशुदा पुरुष विदेश अधिकारी ऐसी जानकारियां लीक नहीं कर सकता? सोराबजी के पास कोई जवाब नहीं था. मुथम्मा राजदूत नियुक्त हुईं. विडंबना देखिये, सोराबजी ताउम्र महिला अधिकारों की पैरवी करने वाले वकील के तौर पर जाने जाते जाते हैं और मुथम्मा ने कभी शादी नहीं की!

कानून के जानकार बताते हैं कि वीआर कृष्णा अय्यर की अंग्रेज़ी भाषा पर ज़बरदस्त पकड़ थी. उनके द्वारा लिखाये गए फ़ैसले अंग्रेजी में ही होते थे, जिनमें वे शब्दों का चयन बेहद सावधानीपूर्वक करते थे. भाषा का स्तर साहित्यिक होता था. दरअसल, वे साहित्य और दर्शन के भी जानकार थे. जीवन के अंतिम पलों में अपनी जीवनी ‘वांडरिंग इन मैनी वर्ल्डस’ में वे लिखते हैं ‘अब जब मेरी विदाई तय है, मैं अपनी जड़ें तलाश रहा हूं. मानो हर पालना हर ताबूत से पूछता है- कहां से, किधर तक?’