केंद्र या किसी राज्य में कोई सरकार 15 साल से सत्ता संभाल रही हो और उसके ख़िलाफ़ कोई मुद्दा न हाे, ऐसा तकरीबन नामुमकिन ही है और मध्य प्रदेश इसका अपवाद नहीं है. यहां ऐसे मुद्दे पर्याप्त से भी अधिक हैं, जिनके बलबूते कितनी भी लोकप्रिय सरकार को सत्ता से बेदख़ल किया जा सकता है. लेकिन मतदान की तारीख़ (28 नवंबर) सिर पर आ जाने के बाद भी अब तक ऐसे किसी मुद्दे की हवा बनती नहीं दिख रही जाे शिवराज सिंह चौहान की 13 और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की 15 साल पुरानी सरकार के माथे पर शिकन डाल दे.

इसके बजाय होता ये दिख रहा है जैसे भाजपा अपनी सोची-समझी रणनीति से चुनावी मुद्दे तय कर रही हो, वहीं इक़लौती विपक्षी पार्टी कांग्रेस उसका अनुसरण कर रही हो. इस आकलन के कुछ पुख़्ता आधार मौज़ूद हैं. यही आधार सत्ताधारी भाजपा के लिए मुद्दाें को अपने मुताबिक तोड़ने-मरोड़ने-मोड़ने का जरिया भी बन रहे हैं. किस तरह? इस पर एक नज़र डालते हैं.

कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर के मीडिया मैनेजर चूक रहे हैं

किसी भी पार्टी के मीडिया मैनेजरों (प्रवक्ता या मीडिया प्रभारी) से उस दल के नेतृत्व की अपेक्षा होती है कि वे सूचना-संचार के माध्यमों के जरिए विरोधी दल को परेशान करने वाले मुद्दों की हवा बनाए रखें. लेकिन मध्य प्रदेश में इसी मामले में कांग्रेस के बड़े-बड़े मीडिया मैनेजर भी चूकते दिख रहे हैं. सिर्फ़ दाे उदाहरणाें से इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

पहला- रणदीप सिंह सुरजेवाला जैसे पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के मीडिया प्रभारी भी कई बार पत्रकार वार्ताओं में ग़लत संदर्भों और तथ्यों तथा आधी-अधूरी तैयारी के साथ उतर रहे हैं. मसलन - वे महाभारत का संदर्भ देते हुए कहते हैं, ‘पार्टी अर्जुन की तरह नहीं, अभिमन्यु की तरह मध्य प्रदेश का चुनाव लड़ेगी.’ ऐसा कहते हुए निश्चित रूप से अभिमन्यु की बहादुरी उनके ध्यान में रही हो सकती है. लेकिन उसी वक़्त उनके ज़ेहन से यह तथ्य उतर जाता है कि महाभारत के दौरान अभिमन्यु चक्रव्यूह में फंसकर जान गवां बैठा था.

इसके एकाध महीने बाद यानी जून में जब सुरजेवाला फिर राजधानी भोपाल आते हैं तो मध्य प्रदेश में किसानों की दुर्दशा पर बात करते हैं. लेकिन उस समय भी उनके पास इस सवाल का संतोषजनक ज़वाब नहीं होता कि राज्य को लगातार ‘पांच साल से कृषि कर्मण पुरस्कार’ कैसे मिला?’ तब वे यह कहकर बात आगे बढ़ा देते हैं कि अगली बार वे इस सवाल का ज़वाब तथ्यों के साथ लेकर आएंगे. उन्होंने जैसा कहा वह किया भी. अगली बार वे सरकारी आंकड़ों से सजे प्रस्तुतीकरण के साथ यह ज़वाब लेकर भी आए कि शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने एक बार नहीं हर मर्तबा आंकड़ों में हेरा-फेरी कर पुरस्कार हासिल किया. लेकिन वे फिर चूक गए और यह नहीं बता पाए कि इन पांच में से तीन पुरस्कार तो कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) सरकार ने मध्य प्रदेश को दिए थे. वह आंकड़ों की हेरा-फेरी को क्यों नहीं पकड़ पाई?

इसी तरह दूसरा उदाहरण वर्तमान में मध्य प्रदेश कांग्रेस के मीडिया विभाग की अगुवाई कर रहीं शोभा ओझा से जुड़ा है. शोभा को इस चुनाव के लिए ख़ास तौर पर दिल्ली से भोपाल लाया गया है. माणक अग्रवाल सरीख़े प्रदेश के पुराने दिग्गज को हटाकर बीती जुलाई में उन्हें मीडिया विभाग का प्रमुख बनाया गया. यह पद संभालने के एक महीने बाद ही उन्होंने जिस आक्रामक तरीके से भोपाल स्थित मूक-बधिर बच्चियों के छात्रावास में हो रहे कुकृत्य का ख़ुलासा किया, उसने उम्मीद जगाई. लेकिन जल्द यह धारणा बदलती दिखी क्योंकि यह मामला अभी प्रदेश तो क्या भोपाल में ही चुनावी मुद्दा नहीं है. जबकि यह मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार में बच्चियों से बलात्कार जैसा समाज को हिला देने वाला मसला था.

मुद्दे परोसने वाले और प्रदेश अध्यक्ष जैसे दिग्गज़ भी ग़फ़लत कर रहे हैं

पिछले दिनों भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार शिवअनुराग पटैरया ने सत्याग्रह से बातचीत में बड़े साफ़ शब्दों में कहा था, ‘यह चुनाव ऐसा है जिसमें अगर कांग्रेस कुछ न करे तो इतने भर से वह सत्ता हासिल कर सकती है. बस वह अपने पुराने मूल स्वरूप में बनी रहे. लेकिन उसने उत्साह में आकर कुछ अनापेक्षित किया तो उसके लिए मुकाबला बेहद नज़दीकी हो जाएगा.’ कांग्रेस ने जिस वक़्त अपना घोषणा पत्र जारी किया और फिर उसी के आसपास पार्टी प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ के जो विवादित बयान वग़ैरह (इन्हें ग़फ़लत कहना चाहिए) आए, उससे शिवअनुराग पटैरया जैसे जानकारों का आकलन (नज़दीकी मुकाबले का) कुछ हद तक सही साबित होता दिखने लगा है.

मसलन- कांग्रेस ने इस बार राज्य में ‘घोषणा पत्र’ की जगह ‘वचन पत्र’ जारी किया है. कहने के लिए तो यह जनता को पार्टी की रीति-नीति पर भरोसा दिलाने के लिए है. लेकिन कई जानकार इसे भाजपा के ‘दृष्टि पत्र’ जारी करने जैसी कोशिश मान रहे हैं. फिर इस वचन पत्र में शामिल मुद्दों को देखें- ‘राम वन गमन पथ’और ‘गोशालाओं का निर्माण’, ‘गौमूत्र के कारोबार’, ‘आध्यात्मिक विभाग’ की स्थापना आदि. क़रीब 112 पेज के इस ‘वचन पत्र’ में और भी तमाम बातें थीं लेकिन चर्चा इन्हीं सब की ज़्यादा हुई. भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता दीपक विजयवर्गीय ने तो यह तक कह दिया, ‘कांग्रेस मुद्दाविहीन है. इसलिए वह उन मुद्दों और नीतियों की नकल कर रही है जो हम लागू कर चुके हैं या करने वाले हैं.’

‘सत्याग्रह’ से बातचीत में भाेपाल के एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार अनुराग उपाध्याय इसे ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ को साधने की कांग्रेस की ‘जोख़िम भरी कोशिश’ मानते हैं. अपनी बात के समर्थन में वे कांग्रेस और कमलनाथ से जुड़ी दो बातों को ख़ास तौर पर याद दिलाते हैं. इनमें से एक कथित तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं पर प्रतिबंध लगाने की बात. दूसरा- कमलनाथ का बयान, जो उन्होंने बंद कमरे में हुई बैठक के दौरान समुदाय विशेष को संबोधित करते हुए दिया. इसमें उन्होंने कहा, ‘नागपुर मेरे क्षेत्र छिंदवाड़ा के नजदीक है, जहां संघ के लोग दिन में आते हैं और रात में चले जाते हैं. वे सिर्फ दो लाइन का पाठ पढ़ाने आते हैं- अगर हिंदू को वोट देना है तो हिंदू शेर, मोदी को वोट दो. मुसलमान को वोट देना है तो कांग्रेस को दो. ये फिर आपको ऐसे ही उलझाने की कोशिश करेंगे. लेकिन इस समय आपको सतर्क रहने की जरूरत है. इनसे हम निपट लेंगे बाद में.’

अनुराग के मुताबिक, ‘कमलनाथ और उनकी पार्टी इस दोहरी रणनीति से अपने परंपरागत वोट बैंक को साथ रखना चाहती है. साथ ही भाजपा समर्थक मतदाताओं को तोड़कर अपनी तरफ़ लाना भी चाहती है. लेकिन यह कोशिश, मैं फिर कहूंगा कि जोख़िम भरी है. इसलिए इसकी सफलता पर संदेह किया जा सकता है.’ हालांकि यह भी ग़ौर करने लायक है कि कमलनाथ आरएसएस पर प्रतिबंध और उससे निपट लेने संबंधी बातों से इंकार कर रहे हैं. लेकिन बात इतनी ही होती तो भी ठीक था. इस चुनाव में ‘महिलाओं काे कम टिकट देने के मसले’ को भी कमलनाथ ठीक से नहीं रख पाए. उन्होंने कह दिया, ‘हमने जीतने की क्षमता के हिसाब से महिलाओं को टिकट दिया है. कोटा या सजावट के आधार पर नहीं.

अब देखिए भाजपा किस तरह मुद्दों को उलट-पुलट कर रही है

यक़ीनी तौर पर इसे कांग्रेस की ग़फ़लत ही माना जा सकता है कि जो भाजपा इस चुनाव में ज़बर्दस्त तरीके से बचाव की मुद्रा में हो सकती थी, वही अब आक्रामक तरीके से मुद्दों को उलटने-पलटने में लगी है. बात महिलाओं के टिकट के मुद्दे से ही शुरू करते हैं. कांग्रेस ने इस बार 25 महिलाओं को टिकट दिया है. जबकि भाजपा ने सिर्फ दो ज़्यादा 27 को. लेकिन कमलनाथ के बयान के बाद भाजपा ने इस मसले को ‘महिलाओं के आत्मसम्मान’ से जोड़ दिया है. अपनी लगभग हर सभा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बता रहे हैं कि कांग्रेस और उसके प्रदेश अध्यक्ष ने ‘महिलाओं का अपमान’ किया है. यही दिल्ली से प्रदेश आने वाले स्मृति ईरानी जैसे भाजपा के प्रचारक भी कर रहे हैं.

ऐसे ही आरएसएस की शाखाओं पर प्रतिबंध लगाने संबंधी मसला भी उलट गया. इस पर अब भले कांग्रेस और कमलनाथ सफाई दे रहे हों कि ‘वचन पत्र’ ऐसी कोई बात नहीं है पर भाजपा को मुद्दा मिल गया है. साथ ही आरएसएस को भाजपा के पक्ष में हवा बनाने के लिए ‘रणनीतिक हथियार’ भी. द इकॉनॉमिक टाइम्स के अनुसार संघ और उसके सहयोगी संगठनों ने 15 नवंबर से इस ‘रणनीतिक हथियार’ का इस्तेमाल भी शुरू कर दिया है. वे शाखाओं पर प्रतिबंध के कथित मुद्दे को आधार बनाकर अपने उन समर्थकों को ख़ास तौर पर साध रहे हैं जो 15 साल के भाजपा के शासन से नाराज़ हैं. इसीलिए राज्य के एक मंत्री शाखाओं पर प्रतिबंध के मसले को ‘कांग्रेस का आत्मघाती गोल’ कहने से भी नहीं चूकते.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश की एक सभा में रफाल विमान सौदे में भ्रष्टाचार का मसला उठाया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरने की कोशिश थी. इसके ज़वाब में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने 19 नवंबर को नरसिंहपुर में आयोजित एक रैली में यह कहकर मुद्दा पलटने की कोशिश की कि ‘कांग्रेस और राहुल गांधी को मोदी फोबिया हो गया है. इसीलिए वे 22 मिनट के भाषण में 44 बार मोदी का नाम लेते हैं.’ शाह इस तरह नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही खेती-बाड़ी के मसले पर कांग्रेस नेताओं की ‘असावधानियों’ पर भी तंज कसने से नहीं चूकते. वह भी सीधे राहुल गांधी की आड़ लेकर. वे कहते हैं, ‘मुझे शक़ है कि राहुल गांधी को तो यह भी पता न होगा कि आलू-प्याज ज़मीन के नीचे होता है या ऊपर.’

इसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘कांग्रेस में कोई चेहरा सामने न होने’ का मसला अन्य मुद्दाें के साथ जोड़ देते हैं. वे मध्य प्रदेश की चुनाव रैलियों में अपने ख़ास अंदाज़ में कह रहे हैं, ‘कांग्रेस फ़्यूज़, नेता कन्फ्यूज़.’ उन्होंने कांग्रेस को चुनौती भी दी है कि वह प्रदेश में मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करे. फिर ‘अयोध्या में राम मंदिर’ का मसला तो है ही. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे भाजपा के ‘हिंदुत्व के चेहरे’ मध्य प्रदेश के मतदाताओं को आश्वस्त कर रहे हैं कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण जल्द होने वाला है. साथ ही वे राहुल गांधी के ‘मंदिरों में माथा टेकने’ और ख़ुद को ‘जनेऊधारी हिंदू’ कहने को मुद्दा बना रहे हैं. धार में आयोजित अपनी रैली में उन्होंने कहा था, ‘राहुल गांधी को तो मंदिर और मस्जिद में बैठने के तरीके में फ़र्क़ भी नहीं पता है.’ अमित शाह, मोदी और योगी के ये बयान राष्ट्रीय मीडिया में भी काफी चर्चित रहे और वहीं कांग्रेस नेताओं के बयान इनके आगे कही बौने साबित हुए.

यानी मध्य प्रदेश में जो चुनाव भ्रष्टाचार पर होना चाहिए था. जो घपलों-घोटालों पर होना था. जिसमें बेरोज़गारी-पलायन मुद्दा बनना चाहिए था. जहां किसानों की आत्महत्या और खेती में हो रहे घाटे को मुद्दा उठना था. जहां रेत के अवैध खनन से नर्मदा जैसी प्रदेश की जीवनदायिनी नदियों का आंचल छलनी कर देने की बात होनी थी, वहां उन मसलों का ज़िक़्र है, जो भाजपा तय कर रही है. यह मध्य प्रदेश के लिए बड़ी विडंबना है और इसके लिए कांग्रेस बराबर की ज़िम्मेदार है.