मध्य प्रदेश के 2003 के विधानसभा चुनाव का एक छोटा सा दिलचस्प और मौज़ूं वाक़या है. उस वक़्त राज्य में दिग्विजय सिंह की सरकार को 10 साल हो चले थे. कांग्रेस लगातार तीसरा चुनाव उन्हीं की अगुवाई में लड़ रही थी. तब भारतीय जनता पार्टी ने उनसे मुक़ाबले के लिए अपनी तेजतर्रार नेता उमा भारती को केंद्रीय मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दिलाकर मध्य प्रदेश भेजा. दूसरे शब्दों में कहें तो उन्हें पार्टी का चेहरा बनाया गया. लेकिन भाजपा का यह चेहरा अकेला नहीं था. पर्दे के पीछे कई चेहरे थे, जिनकी अगुवाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भाजपा में आए अनिल माधव दवे (अब दिवंगत) कर रहे थे. पीछे रहकर काम करने वाले इन चेहरों ने भोपाल के पॉश 74-बंगला इलाके में स्थित एक सरकारी बंगले को तब अपना ठिकाना बनाया था. मराठा शासक शिवाजी से गहरे तक प्रभावित दवे ने उस वक़्त इस बंगले को ‘जावली’ नाम दिया था.

इतिहास में ‘जावली’ महाराष्ट्र की वह जगह, जहां हिंदू राष्ट्र की स्थापना के लिए निकले शिवाजी ने मुग़ल सेनापति अफ़ज़ल खां को उसी की चाल से मार गिराया था. ठीक वैसे ही भोपाल का ‘जावली’ भी ‘हिंदुत्व के सियासी चेहरों’ के लिए भाग्यशाली साबित हुआ. दवे के दिमाग़ और इस ठिकाने से दिग्विजय के लिए निकले ‘मिस्टर बंटाढार’ जैसे तीरों ने ‘दिग्गी राजा’ (दिग्विजय सिंह को बोलचाल का नाम) को ऐसा धराशायी किया कि उसके दंश से वे आज 15 साल बाद भी उबर नहीं पाए हैं. पर्दे के पीछे सक्रिय चेहरे कितने असरदार हाे सकते हैं, यह इसकी देश-प्रदेश की सियासत में अहम मिसाल थी. और इस बार फ़िर मध्य प्रदेश की राजनीति में पर्दे के पीछे वाले चेहरे वैसे ही अहम हो सकते हैं.

भाजपा और कांग्रेस में ऐसे कई चेहरे हैं जो चुनावी नतीज़ों को निर्णायक मोड़ दे सकते हैं. इनमें कई तो पर्दे के पीछे हैं और कुछ अपने मूल दलों को छोड़कर किसी अन्य में दिख रहे हैं. लेकिन इनसे पहले उन चेहरों की बात करना लाज़िमी होगा, जिन्हें दोनों पार्टियों ने आगे कर रखा है.

वे तीन चेहरे जो सामने दिख रहे हैं

1. शिवराज सिंह चौहान (भाजपा) : यह कहना ग़लत न होगा कि शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश में इस वक़्त ‘सामने दिखने वाला भाजपा का इक़लौता चेहरा’ हैं. प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह से लेकर चुनाव अभियान समिति के प्रमुख नरेंद्र सिंह तोमर और देश-प्रदेश के पार्टी नेता तथा रणनीतिकार तक सब उनके पीछे है. यहां तक कि पोस्टर-बैनरों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इन दिनों शिवराज के पीछे ही दिख रहे हैं. इस बार शिवराज जिस बुधनी से चुनाव लड़ रहे हैं वह उनका गृह क्षेत्र है. यहां से लगता एक गांव है जैत. वहीं पांच मार्च 1959 को एक किसान परिवार में शिवराज का जन्म हुआ. गांव नर्मदा किनारे है, इसलिए स्वाभाविक तौर पर शिवराज उसी की लहरों के साथ खेलते-खाते बड़े हुए.

पढ़ने-लिखने के दिनों में ही शिवराज अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़ गए थे. बताते हैं कि महज़ 16 साल की उम्र में उन दिनों वे अपने स्कूल के छात्र संघ के अध्यक्ष बन गए थे. वह 1970 का दशक था. फिर इसी एबीवीपी के रास्ते बढ़ते-चढ़ते हुए वे राजनीति में जगह बनाते गए. पहली बार 1990 में शिवराज ने बुधनी से ही विधानसभा चुनाव लड़ा और विधायक बने. इसके एक साल बाद 1991 में वे अपने गृह जिले- विदिशा की संसदीय सीट से लोक सभा चुनाव जीतकर सांसद बन गए. तब यह सीट अटलबिहारी वाजपेयी ने जीतकर छोड़ी थी. शिवराज यहां से लगातार पांच लोक सभा चुनाव जीते. इसी बीच 2000 में वे भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिए गए.

उमा भारती के नेतृत्व में जब 2003 में भाजपा प्रदेश की सत्ता में आई तब तक शिवराज भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बन चुके थे. उस वक़्त पार्टी ने उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ राघौगढ़ से विधानसभा का टिकट दिया था. हालांकि वे वह चुनाव तो नहीं जीते मगर जैसा ख़ुद दिग्विजय एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘उनका भाग्य चेत गया.’ महज़ दो साल के भीतर राज्य में तेजी से सियासी उठापटक हुई. इसमें पहले उमा भारती को मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा. फिर उन्होंने अपना ‘विश्वस्त’ समझकर जिन बाबूलाल गौर काे ‘अपनी कुर्सी’ पर बिठाया उन्हें गद्दी छाेड़नी पड़ी. वह 2005 का साल था जब शिवराज कुछ समय प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रहते हुए मुख्यमंत्री के पद पर क़ाबिज़ हो चुके थे.

अब ज़रा ग़ौर किया जा सकता है और याद भी रख सकते हैं. जब शिवराज ने उस सरकार के बचे कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली तब तारीख़ थी 29 नवंबर. इसके ठीक अगली बार 2008 में जब वे अपने बलबूते पहली बार पार्टी को जिताकर मुख्यमंत्री बने, तब तारीख़ थी 12 दिसंबर था. जबकि इस बार प्रदेश में 28 नवंबर को मतदान है और 11 दिसंबर को चुनाव का नतीज़ा आना है.

2. कमलनाथ (कांग्रेस) : कमलनाथ के बारे में कुछ चीजें कम लोग जानते हैं. मसलन- इनका नाम ‘कमलनाथ’ सिर्फ़ ‘कमल’ है, ‘नाथ’ इनका सरनेम यानी उपनाम है. कमलनाथा बंगाली समुदाय से ताल्लुक़ रखते हैं. देश की आज़ादी से नौ महीने पहले 18 नवंबर 1946 को उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक समृद्ध परिवार में इनका जन्म हुआ. देहरादून के ‘दून स्कूल’ जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में इन्होंने पढ़ाई की जहां इंदिरा गांधी के पुत्र संजय भी पढ़ा करते थे. वहीं से इनकी मित्रता संजय गांधी से हुई और साथ ही कांग्रेस के ‘प्रथम गांधी-नेहरू परिवार’ से नजदीकी भी बनी. नज़दीकी भी ऐसी कि एक समय इन्हें इंदिरा गांधी का ‘तीसरा बेटा’ कहा जाने लगा था. तब यह लाइन अक्सर सुनने को मिलती थी- ‘इंदिरा गांधी के दो हाथ, संजय गांधी-कमलनाथ.’

शायद संजय गांधी और उनके परिवार का असर ही था जो महज़ 22 साल की उम्र में कमलनाथ 1968 कांग्रेस में शामिल हो गए. वे हर वक़्त संजय गांधी के साथ रहे. तब भी जब 1979 में देश की पहली ग़ैर-कांग्रेसी सरकार (जनता पार्टी के नेतृत्व वाली) ने संजय गांधी को तिहाड़ जेल भिजवा दिया. उस वक़्त संजय गांधी का मुक़दमा सुन रहे जज पर भरी अदालत में काग़ज़ के गोले फेंककर और उन पर आरोप लगाकर कमलनाथ भी तिहाड़ चले गए. गांधी परिवार के ही कहने पर 1980 में वे पहली बार मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा से लोक सभा का चुनाव लड़ने आए. फिर नौ बार यहां से लोक सभा के सदस्य चुने गए पर लगातार नहीं. मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा से 1997 में वे हार गए थे.

कमलनाथ स्थापित कारोबारी हैं. इनके दोनों बेटे- बकुल और नकुल अलग-अलग क्षेत्रों में संचालित लगभग दर्ज़न भर कंपनियां संभालते हैं. कमलनाथ देश की मौज़ूदा 16वीं लोक सभा के सबसे वरिष्ठ सदस्य हैं. साथ ही वे चार से पांच जून 2014 के बीच इस लोक सभा के इक़लौते सदस्य भी रह चुके हैं. तब इन्हें अंतरिम अध्यक्ष पद की शपथ दिलाई गई थी. लेकिन केंद्रीय मंत्री गोपीनाथ मुंडे के निधन की वज़ह से किसी और सदस्य की शपथ नहीं हो पाई थी. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में भड़के सिख दंगों की आंच कमलनाथ तक भी आई है. इस सबके साथ जीवन के 72 बसंत बिता चुके कमलनाथ को कांग्रेस ने इसी अप्रैल में मध्य प्रदेश इकाई की कमान सौंपी है. ताकि इस चुनाव में वे पार्टी की नैया पार लगा सकें.

3. ज्योतिरादित्य सिंधिया (कांग्रेस) : ग्वालियर राजघराने के मौज़ूदा प्रमुख ज्योतिरादित्य सिंधिया के पास ‘राज और राजनीति’ विरासत में आई है. मुंबई में एक जनवरी 1971 को जन्मे ज्योतिरादित्य ने यह विरासत उस मुश्किल वक़्त में संभाली जब 30 सितंबर 2001 को उनके पिता माधवराव सिंधिया का एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया. इससे राजघराने के प्रमुख की गद्दी और गुना-शिवपुरी लोक सभा सीट (यहां से माधवराव चुने गए थे) दोनों खाली हो गईं. इस सीट पर फरवरी-2002 में उपचुनाव हुआ और ज्योतिरादित्य पहली बार यहां से जीत हासिल कर लोक सभा में पहुंचे. महज़ 31 साल की उम्र में. इसके बाद से वे इसी सीट से लगातार तीन बार लोक सभा का चुनाव जीत चुके हैं. ज्योदिरादित्य केंद्र में मंत्री भी रहे हैं.

कांग्रेस लगातार ज्योतिरादित्य को मध्य प्रदेश में अपना ‘चेहरा बनाने का संकेत’ दे रही है क्योंकि युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता अच्छी है, ऐसा माना जाता है. संभवत: इसीलिए उन्हें 2013 में और इस बार भी लगातार दूसरी बार प्रदेश चुनाव अभियान समिति के प्रमुख की ज़िम्मेदारी दी गई है. हालांकि कुछ अंदरूनी मज़बूरियों का तक़ाज़ा ही रहा होगा जो उन्हें मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी न पहले घोषित किया गया था, न इस बार ही. अलबत्ता भाजपा ज़रूर अपने चुनावी फ़ायदे के लिए इस चुनाव को ‘महाराज बनाम शिवराज’ बनाने की कोशिश में है. महाराज यानी ज्योतिरादित्य, जो अपने राजघराने की विरासत में मिली लगभग 20,000 करोड़ की संपत्ति के मालिक बताए जाते हैं.

और वे चेहरे जो पीछे या दाएं-बाएं होकर भी निर्णायक हो सकते हैं

इसके बाद अब उन चेहरों की चर्चा जो पीछे हैं या दाएं-बाएं हैं. इनमें सबसे पहले हैं दिग्विजय सिंह. कभी ग्वालियर महाराज के अधीन आने वाली राघौगढ़ रियासत के राजा रहे दिग्विजय 1993 से 2003 तक मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार के मुखिया भी रहे हैं. इस नाते उनका प्रदेशव्यापी असर है, अच्छा-बुरा दोनाें. अच्छा इसलिए कि कांग्रेस संगठन पर उनके जैसी पकड़ वर्तमान में किसी की नहीं मानी जाती. इसी वज़ह से कांग्रेस ने इन्हें चुनाव समन्वय समिति का प्रमुख बनाया है. बुरा इसलिए कि मुख्यमंत्री के रूप में 10 साल के शासन के दौरान सड़क, बिजली, पानी के मोर्चे पर वे ख़ासे असफल रहे. इसलिए भाजपा उनके शासन को हमेशा मुद्दा बनाने की कोशिश करती रही है. यही वज़ह है कि कांग्रेस इस बार इन्हें पीछे रखकर चल रही है. वहीं भाजपा दिग्विजय सिंह को आगे लाने की कोशिशों में लगी है. इस तरह दोनों पार्टियों के लिए दिग्विजय और उनका असर मायने रखता है.

कांग्रेस में एक और बड़ा नाम सत्यव्रत चतुर्वेदी का है. वे बुंदेलखंड के असरदार नेता हैं. दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली मौज़ूदा समन्वय समिति के सदस्य भी हैं. इनकी मां विद्यावती और पिता बाबूराम चतुर्वेदी की गांधी-नेहरू परिवार से ख़ासी नज़दीकी रही है. इसी बलबूते सत्यव्रत खजुराहो लोक सभा सीट से सांसद और कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी रहे. लेकिन फिलहाल वे पार्टी से अलग राह पर हैं. इसकी वजह उनके बेटे नितिन को टिकट न मिलना बताई जाती है. इसके बाद नितिन ने राजनगर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी के तौर पर पर्चा भर दिया और सत्यव्रत उनकी जीत के लिए जोर लगा रहे हैं. जानकारों के मुताबिक उनका रुख़-रवैया बुंदेलखंड में कांग्रेस के प्रत्याशियों की संभावनाओं पर थोड़ा-बहुत असर डालेगा ही.

इनके अलावा कांग्रेस से भाजपा में गए पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्‌डू हैं. इनके बेटे अजीत बौरासी प्रदेश युवक कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रह चुके हैं. इस बार अजीत भाजपा के टिकट पर घटि्टया से लड़ रहे हैं. ऐसे ही घोड़ाडोंगरी से सपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे कांग्रेस के पूर्व मंत्री प्रताप सिंह उइके और निर्दलीय उतरे- जतारा सीट से पूर्व विधायक दिनेश अहिरवार, झाबुआ से पूर्व विधायक जेवियर मेड़ा, उज्जैन दक्षिण से जयसिंह दरबार तथा उज्जैन उत्तर से माया त्रिवेदी जैसे लगभग 14 बाग़ी भी पार्टी की संभावनाओं पर असर डालेंगे.

इसी तरह केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भाजपा में पर्दे के पीछे सक्रिय सबसे अहम-असरदार चेहरों में हैं. वे ग्वालियर से सांसद हैं. प्रदेश में भी मंत्री रह चुके हैं. दो बार (2008 और 2013 में) विधानसभा चुनाव के ऐन मौके प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए शिवराज सिंह की ‘सफलता के सारथी’ बन चुके हैं. इस बार भी भाजपा की चुनाव अभियान समिति के प्रमुख हैं. मुख्यमंत्री पद के अग्रणी दावेदारों में भी शुमार होते हैं. अपने बेटे देवेंद्र के लिए टिकट चाहते थे पर मिला नहीं. इससे मन में कोई क़सक न आई होगी, यह मानना मुश्किल है.

ऐसे ही पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर लगातार 11वीं बार अपने लिए टिकट चाहते थे लेकिन नहीं मिला. उनकी बहू भाेपाल की पूर्व महापौर कृष्णा गौर को भी पार्टी ने गोविंदपुरा से टिकट तब दिया जब वे निर्दलीय चुनाव लड़ने की तैयारी कर चुकी थीं. एक वर्ग की मानें तो इस सबके बाद ये दोनों भोपाल की बाकी सीटों पर पार्टी की संभावना मज़बूत करने के लिए काम करेंगे, यह थोड़ा मुश्किल लगता है. लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को भी बेटे मंदार के लिए टिकट चाहिए था. लेकिन नहीं मिला. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश को वहां (सुमित्रा के क्षेत्र इंदौर-3) से मिला जहां से उनकी प्राथमिकता नहीं थी. इसका भी कुछ न कुछ असर तो ज़रूर होगा.

भाजपा के एक अन्य दिग्गज पूर्व केंद्रीय मंत्री सरताज सिंह और शिवराज सिंह के सगे साले संजय मसानी कांग्रेस में जा चुके हैं. इनमें सरताज होशंगाबाद और संजय बारासिवनी से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में भाजपा का सिरदर्द बढ़ा रहे हैं. दमाेह-पन्ना तथा खजुराहो से सांसद और प्रदेश के मंत्री रह चुके रामकृष्ण कुसमारिया दमोह से निर्दलीय लड़ रहे हैं. भिंड से भाजपा के पूर्व विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाह सपा के टिकट पर मैदान में हैं. गुना की बमौरी सीट से पूर्व मंत्री केएल अग्रवाल, जबलपुर मध्य से भारतीय जनता युवा मोर्चा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धीरज पटैरिया, ग्वालियर से भाजपा की पूर्व महापौर समीक्षा गुप्ता भी निर्दलीय हैं. पूर्व मंत्री कुसुम महदेले को पार्टी ने पन्ना से टिकट ही नहीं दिया. जिन बृजेंद्र प्रताप सिंह को दिया वे ठाकुरवाद के लिए जाने जाते हैं. महदेले उनका समर्थन करेंगी इसकी उम्मीद कम है.

इस तरह ‘चेहरे पर चेहराें की सियासत’ गड्‌डमड्‌ड हो गई है. इस गड्‌डमड्‌ड के गड़बड़ में तब्दील होने की आशंका भाजपा के लिए ज़्यादा है क्योंकि इस वक़्त उसके 70-75 चेहरे असंतुष्टों-कम संतुष्टों की ज़मात में शामिल दिख रहे हैं.