ज़्यादा नहीं, पांच साल पहले की इन्हीं दिन-महीनों की बात है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 2014 के लोक सभा चुनाव के लिए गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का अपना उम्मीदवार बनाने का ‘जोख़िम भरा फ़ैसला’ किया था. जोख़िम इसलिए था कि तमाम कोशिशों के बावज़ूद मोदी तब तक अपनी ‘कट्‌टर हिंदुत्व’ वाली छवि से उबर नहीं पाए थे. गुजरात दंगों के दाग उनके दामन से साफ नहीं हो पाए थे. तब भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में नीतीश कुमार जैसे सहयोगी तो क्या शिवराज सिंह चौहान जैसे कद्दावर भाजपाई भी मोदी का नेतृत्व स्वीकार करने काे राज़ी नहीं थे.

उसी दौरान दूसरी तरफ़ कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार भ्रष्टाचार और घोटालों के ख़ुलासों की मार झेल रही थी. इस सब पर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का ‘मौन’ उनकी सरकार के प्रति धारणा बिगाड़ने में अहम भूमिका निभा रहा था. तब मोदी और भाजपा में उनके समर्थकों ने इसी को हथियार बनाया. हालांकि चुनौती इसमें भी थी क्योंकि लोक सभा चुनाव में छह-सात महीने का समय था. तब तक एक मुद्दे की हवा बनाए रखना मुश्किल था. लेकिन मोदी और उनकी टीम ने वह कर दिखाया. मई 2014 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने में उनकी अपनी छवि और इस मुद्दे से ज़्यादा उनका यही कारनामा क़ाबिले-ज़िक़्र था और आज भी है.

भाजपा और नरेंद्र मोदी से जुड़ा यह प्रसंग मध्य प्रदेश चुनाव के संदर्भ में पूरी तरह नहीं तो भी काफ़ी कुछ ठीक बैठता है. इसलिए पहले यह समझना बेहतर होगा कि यह प्रसंग कहां ठीक बैठ रहा है? इसके बाद ये कि ठीक बैठने के बाद भी यही प्रसंग पूरी तरह सटीक क्यों नहीं बैठता? पहले सवाल के ज़वाब से शुरूआत करते हैं.

मध्य प्रदेश सरकार के ख़िलाफ़ भी भ्रष्टाचार और घोटालों जैसे बड़े मुद्दे हैं

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार को अगर केंद्र में 10 साल हुए थे तो मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को सत्ता संभालते 13 साल हो गए हैं. जबकि भाजपा सरकार को 15 साल. जिस तरह मनमोहन सिंह के शासन पर 2जी, कोयला, कॉमनवेल्थ जैसे घोटालों के आरोप थे, वैसे ही शिवराज सरकार पर भी हैं. इनमें तीन-चार तो बहुत ही बड़े हैं:

1. व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) घोटाला : प्रदेश तो क्या संभवत देश के इतिहास में सामने आए सबसे बड़े (जटिलता और प्रभावितों की नजर से) घोटालों में इसे शुमार किया जा सकता है. जुलाई, 2013 में यह घोटाला सामने आया था. तब पुलिस ने 20 ऐसे फ़र्ज़ी परीक्षार्थियों को ग़िरफ़्तार किया था, जो दूसरों के नाम पर परीक्षा दे रहे थे. बाद में मामले की जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि यह बड़ा ग़िरोह है. इसमें व्यापमं के अधिकारी, नेता और मंत्री (राज्य के मंत्री रह चुके लक्ष्मीकांत शर्मा मुख्य आरोपितों में हैं) तक शामिल हैं. वक़्त के साथ एक के बाद एक इस घोटाले की परतें निकलती गईं. पता चलता गया कि कैसे अयोग्य छात्र और छात्राएं पैसे देकर, सिफ़ारिश के बल पर व्यापमं द्वारा आयोजित प्रतियोगी परीक्षाओं में पास हो रहे थे. सरकारी नौकरियां हासिल कर रहे थे. यह मामला कितना बड़ा था और है भी, इसका अंदाज़ा इन आंकड़ों से लगाया जा सकता है. इस घोटाले के 3,800 आरोपित हैं. लगभग 170 मामले दर्ज़ हैं. इसमें 120 में आरोप पत्र दायर हो चुका है. जबकि 50 में जांच चल रही है. बीते तीन साल से तो केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) इसकी जांच कर रही है. वहीं बीते पांच साल में इस घोटाले से जुड़े लगभग 16 लोगों की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो चुकी है.

2. अवैध रेत खनन-डंपर घोटाला : नर्मदा जैसी जीवनदायिनी नदियों से अवैध रेत खनन का मसला पूरे प्रदेश को गहरे तक छूता है. राज्य के आधे से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में इसका असर और ज़िक़्र है. नर्मदा पट्‌टी और ग्वालियर-चंबल के क्षेत्रों में तो यह बेहद ही संवेदनशील मुद्दा है. कितना? इसका अंदाज़ा बीते सितंबर की घटना से लगा सकते हैं जब रेत माफ़िया के ट्रैक्टर ने मुरैना जिले में वन विभाग के डिप्टी रेंजर सूबेदार सिंह कुशवाह को कुचलकर मार दिया था.

रेत माफ़िया के शिकार हुए सूबेदार अकेले नहीं हैं. इसी साल भिंड में स्थानीय पत्रकार संदीप शर्मा भी ऐसे ही जान गवां चुके हैं. इससे पूर्व 2015 में एक सिपाही और उससे भी पहले 2012 में आईपीएस नरेंद्र कुमार भी रेत माफ़िया का शिकार हो चुके हैं. आंकड़ों के हिसाब से 2009 से 2015 तक (यह समय भाजपा के शासन का ही है) ही मध्य प्रदेश में अवैध खनन के 42,152 मामले दर्ज़ हो चुके थे. और पर्यावरण के जानकार बताते हैं कि किसी एक इलाके से ही अवैध खनन का यह कारोबार लगभग 25-30 लाख रुपए रोज का है. यहां तक कि इस कारोबार में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के शामिल होने के आरोप भी लगे. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इनसे बरी कर दिया पर उनके परिवार के इसमें शामिल होने की ख़बरें अक़्सर अब भी आती रहती हैं.

3. ई-टेंडरिंग घोटाला : शिवराज सरकार के कार्यकाल में हुए घपलों-घोटालों की फेहरिश्त में ई-टेंडरिंग सबसे नया है. इसी साल सितंबर में द इकॉनॉमिक टाइम्स ने इसका ख़ुलासा किया था. सरकारी तंत्र में कई सालों से यह घोटाला जारी था. अभी शुरुआती जांच की ही मानें तो इससे सरकार को लगभग 3,000 करोड़ रुपए का फटका लग चुका है. इसमें हुआ क्या? सरकारी काम और ख़रीदारी के ऑनलाइन ठेके देने में अयोग्य फर्मों की मदद की गई. टेंडर (निविदा) प्रक्रिया के दौरान ऐसी फर्मों को सबसे कम कीमत वाली निविदाओं के बारे में जानकारी लीक की गई. ताकि वे आख़िरी मौके पर उससे भी कम कीमत की निविदा जमा कर ठेका हासिल कर सकें. ऐसा कई फर्मों ने किया भी.

इसमें भी दिलचस्प बात ये कि सरकार ने इस पर तुरत-फुरत कार्रवाई भी की, लेकिन उस पर जिसने घोटाले की प्रामाणिकता (ऑथेंटिसिटी) को पुष्ट किया. सरकार का पूरा ऑनलाइन कामकाज देखने वाली नोडल एजेंसी- मध्य प्रदेश राज्य इलेक्ट्रॉनिक डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एमपीएसईडीसी) के प्रबंध निदेशक मनीष रस्तोगी का आनन-फानन में तबादला कर दिया. रस्तोगी ख़ुद कंप्यूटर विज्ञान और तकनीक के जानकार हैं. और उन्होंने वे तमाम कड़ियां जोड़ ली थीं जिनसे पता चल रहा था कि घोटाले के तार सिर्फ़ एक विभाग नहीं बल्कि कई और विभागों से जुड़े हैं, लिहाज़ा उन्हें इसकी सज़ा भुगतनी पड़ी. उनसे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख सचिव के साथ एमपीएसईडीसी के प्रबंध निदेशक की ज़िम्मेदारी भी वापस ले ली गई. उनकी जगह एक अन्य आईएएस अफसर प्रमोद अग्रवाल को ये ज़िम्मेदारियां दे दी गईं.

4. किसानों की दुर्दशा, बेरोज़ग़ारी, पलायन : बात चाहे किसानों की दुर्दशा की हो या बेरोज़ग़ारी और पलायन की. किसी और इलाके के लिए भले हों पर मध्य प्रदेश के संदर्भ में ये मुद्दे आम नहीं कहे जा सकते, क्योंकि मध्य प्रदेश ही देश का इक़लौता राज्य है, जो बीते पांच साल से कृषि कर्मण पुरस्कार जीत रहा है. यानी दूसरे अर्थों में यहां किसानों की हालत अच्छी ही नहीं बहुत बेहतर होनी चाहिए. साथ ही बेरोज़ग़ारी-पलायन की दर कम से कम होनी चाहिए क्योंकि ये दोनों भी काफ़ी हद तक खेती-किसानी से जुड़ते मसले हैं. लेकिन सच क्या है?

अभी इसी साल मार्च में एक रिपोर्ट आई थी. यह रिपोर्ट भी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की थी. इसके हवाले से केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने लोक सभा में बताया था कि 2014 से 2016 के बीच मध्य प्रदेश में किसानों की आत्महत्या की दर में 21 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है. जबकि देश के अन्य इलाकों में इसी दौरान इसमें 10 फ़ीसद की कमी दर्ज़ की गई थी.

ऐसे ही मालवा-निमाड़ के लिए सोयाबीन की खेती काफ़ी मायने रखती है. साल 2012-13 में 58.13 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में यह फसल बोई गई थी. और उत्पादन हुआ था 64.86 लाख टन. लेकिन 2017-18 सोयाबीन की बुवाई घटकर रह गई 50.10 लाख हेक्टेयर और उत्पादन रह गया 42 लाख टन. जबकि कुछ साल पहले तक इसी सोयाबीन की वज़ह से मालवा को ‘भारत का मिडवेस्ट’ और इंदौर को ‘शिकागो’ कहा जाता था. इस इलाके में बड़े पैमाने पर होने वाली अफ़ीम की खेती का भी यही हाल है. फिर आती है बात फ़सलों के उचित दाम की, तो याद दिला दें कि मंदसौर मध्य प्रदेश में ही है. वह जगह जहां फसलों की उचित कीमत पाने के लिए आंदोलन कर रहे किसानों में से छह की मौत पुलिस की गोलियों से हुई थी. सिर्फ़ मालवा या मंदसौर ही क्यों, उस बुंदेलखंड का भी बड़ा हिस्सा मध्य प्रदेश में है जहां से रोज़ग़ार की तलाश में लोग बड़े पैमाने पर पलायन करते हैं. मालवा-निमाड़ की तरह यहां की भी लगभग 30-40 फ़ीसदी आबादी हर मौसम में अपने घरों से, जड़ाें से दूर रहने को मज़बूर होती है.

5. भ्रष्ट तंत्र, निरर्थ-निराधार ढांचा : ये जो पांचवां मुद्दा है या कहें कि ‘मुद्दों का गठजोड़’ है, इसी एक के बलबूते 2003 में उमा भारती ने 10 साल पुरानी दिग्विजय सिंह सरकार को सत्ता से बेदख़ल कर दिया था. इस मसलाई गठजोड़ में अफसरशाही का भ्रष्ट तंत्र, अर्थ का कमजोर ढांचा जो हर उद्देश्य को ‘निरर्थ’ करता है और निराधार सा आधारभूत ढांचा (बिजली-सड़क-पानी) शामिल है. दिलचस्प है कि 2003 की तुलना में थोड़े-बहुत ही बदले स्वरूप के साथ यह सब आज भी मौज़ूद है. मिसाल देखनी है तो राजधानी भोपाल की ही लगभग दो किलोमीटर लंबी जेके रोड पर सफर कर लीजिए. कुछ समय पहले राजधानी के भाजपा शासित नगरीय निकाय ने इसे शहर की सबसे बेहतरीन सड़क बनाने की घोषणा की थी. मगर ये अभी शहर की सबसे ‘बदतरीन’ सड़कों में शुमार है.

इतने से काम न चले तो ख़ास तौर पर बुंदेलखंड, ग्वालियर-चंबल और विंध्य क्षेत्र की कुछ प्रमुख सड़कों पर सफर करने का हौसला बांधिए. आपके शरीर का पोर-पोर पूछने लगेगा कि क्या यह वही मध्य प्रदेश है जहां की सड़कें ‘अमेरिका से बेहतर’ हैं, जैसा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दावा करते हैं. बिजली-पानी के संकट का भी कमोबेश यही हाल है. इसका प्रमाण मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के ही चुनाव क्षेत्र- बुधनी के लोग उनकी पत्नी साधना सिंह और बेटे कार्तिकेय को दे रहे हैं. यहां तमाम ग्रामीण इलाकों में मां-बेटे (मुख्यमंत्री के प्रचार की कमान इन्हेांने संभाल रखी है) को सड़क-बिजली-पानी पर ही जनता के सवालों और विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

‘निरर्थ तंत्र’ का हाल शिवराज सरकार ने इस साल के बजट में बताया है कि राज्य पर कर्ज़ का बोझ बढ़कर 1,87,637 करोड़ रुपए हो चुका है. फिर जब राज्य के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र 60 से बढ़ाकर 62 की गई तब भी इसका प्रमाण मिला. क्याोंकि इसके पीछे ‘लोकलुभावन मक़सद’ से बड़ा कारण ये था कि सरकार के पास कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें देने के लिए 7,200 करोड़ रुपए नहीं थे. तिस पर अफ़सरशाही कैसे काम कर रही है, इसका प्रमाण ये है कि प्रदेश के ‘घोषणावीर मुख्यमंत्री’ की 12 हजार से अधिक घोषणाओं में अाधी से ज़्यादा प्रशासनिक-तकनीकी या वित्तीय कारणों से अब तक अटकी हुई हैं.

इन मुद्दों के बावजूद कांग्रेस भाजपाई रणनीति से भाजपा को मात देने का मंसूबा बांधे हुए है

कुल मिलाकर प्रदेश में न मुद्दों की कमी है और न इन्हें लेकर जनमानस में उबाल मारती भावनाओं की. साथ में वे मिसालें भी मौज़ूद हैं जो बताती हैं कि सिर्फ़ इतने भर से सरकारों को सत्ता से बेदख़ल किया जा सकता है. लेकिन इसके बावज़ूद कांग्रेस की प्राथमिकता इस वक़्त कुछ और दिखती है. वह शायद ‘भाजपाई रणनीति’ से भाजपा को मात देने का मंसूबा बांध रही है. यही कारण हो सकता है कि पार्टी के ‘वचन पत्र’ में ‘गाय, गौशाला, गौमूत्र’ जैसे मुद्दों पर ज़्यादा जोर दिया जाता है. इसीलिए प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ अल्पसंख्यकों की एक बैठक में बड़े साफ़ लफ्जों में कहते हैं, ‘मुस्लिमों के 90 फ़ीसदी वोट कांग्रेस को मिलने चाहिए. नहीं तो हम बड़ी मुश्किल में फंस जाएंगे.’ इसीलिए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी और अन्य नेता मंदिर-मंदिर माथा टेकते दिखाई देते हैं.

लेकिन कांग्रेस को यह ‘भाजपाई हथियार’ (क्योंकि भाजपा धर्म के आधार पर मतों के ध्रुवीकरण और धार्मिक प्रतीकों के राजनीति में इस्तेमाल की विशेषज्ञ मानी जाती है) भाजपा पर ही इस्तेमाल करते वक़्त गुजरात और कर्नाटक भी याद रखना होगा. इन दोनों राज्यों में कांग्रेस की यह रणनीति बुरी तरह विफल साबित हो चुकी है.