पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने बीते 31 अक्टूबर को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. उसने काफी समय से चर्चा में चल रहे ईशनिंदा के मामले में एक ईसाई महिला आसिया बीबी को बाइज्जत बरी कर दिया. सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच का कहना था कि आसिया पर लगे कोई भी आरोप साबित नहीं होते इसलिए उन्हें सजा नहीं दी जा सकती है.

क्या था मामला?

यह मामला करीब नौ साल पुराना है. साल 2009 में लाहौर के एक गांव की रहने वाली आसिया बीबी पर पैगम्बर मोहम्मद का अपमान करने का आरोप लगा था. दरअसल, तब उन्होंने उस बर्तन से पानी पी लिया था जिससे गांव की कुछ मुस्लिम महिलायें पानी पिया करती थीं. इसके बाद मुस्लिम महिलाओं ने इस बर्तन को अशुद्ध बताकर उससे पानी पीने से इनकार कर दिया. इसे लेकर आसिया की इन महिलाओं से बहस हो गई. घटना के अगले दिन गांव की कुछ महिलाओं ने आसिया पर पैगम्बर मोहम्मद के अपमान का आरोप लगते हुए मौलवी से शिकायत कर दी. इसके बाद पुलिस ने आसिया बीबी को ईशनिंदा के आरोप में गिरफ्तार कर लिया.

पाकिस्तान के कई पत्रकार बताते हैं कि आसिया के खिलाफ किसी भी अदालत में कभी कोई आरोप साबित नहीं हुए. लेकिन, इसके बावजूद पहले निचली अदालत और फिर हाईकोर्ट ने उसे मौत की सजा सुना दी. ये लोग कहते हैं कि ऐसा होने की सबसे बड़ी वजह मौलवियों और चरमपंथियों का डर था जिसके चलते कोई भी जज आसिया को बरी करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था.

पाकिस्तान में ईशनिंदा का कानून और इसका दुरुपयोग

पाकिस्तान में ईशनिंदा से जुड़े कानून की बात करें तो इसे अंग्रेजों ने स्थानीय जनता को धर्म के नाम पर विभाजित रखने के उद्देश्य से लागू किया था. इसके बाद पाकिस्तान की स्थापना के दौरान भी इसे ईशनिंदा को रोकने के मकसद से संविधान का हिस्सा बना दिया गया. लेकिन, 1987 में पाकिस्तान के तानाशाह शासक जिया उल हक़ ने इस कानून में काफी बड़े बदलाव कर दिए. हक़ ने इस कानून में इस्लाम के लिए अपशब्द इस्तेमाल करने वाले को तीन साल की कैद, कुरान को क्षति पहुंचाने वाले के लिए उम्रकैद, जबकि पैगंबर मोहम्मद की निंदा करने वाले के लिए मौत की सजा का प्रावधान कर दिया.

पाकिस्तानी पत्रकार इमाद जाफर अपनी एक टिपण्णी में लिखते हैं कि असल में इस बदलाव के बाद से ही पाकिस्तान में इस कानून का दुरुपयोग शुरू हुआ. इसके बाद से लोग अपनी व्यक्तिगत खुन्नस निकालने के लिए और अल्पसंख्यकों की जमीनों को हथियाने के लिए इस कानून का इस्तेमाल करने लगे. पाकिस्तान के ‘नेशनल कमीशन फॉर जस्टिस एंड पीस’ द्वारा प्रकाशित एक शोध के मुताबिक इस कानून में बदलाव किये जाने से पहले के 50 सालों में ईशनिंदा के केवल सात मामले ही दर्ज हुए थे. लेकिन, बदलाव के बाद बीते 31 सालों में 1500 से ज्यादा मामले दर्ज हो चुके हैं.

हालांकि, ये सभी मामले केवल अल्पसंख्यकों से जुड़े नहीं हैं. इनमें से करीब 700 मुस्लिमों के खिलाफ भी हैं. हालांकि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की बहुत कम आबादी के लिहाज से उसके खिलाफ ईशनिंदा के मामलों का प्रतिशत मुस्लिमों के मुकाबले बहुत ज्यादा बैठता है.

इमाद जाफर एक और बात भी बताते हैं. वे लिखते हैं, ‘पाकिस्तान के संविधान में ईशनिंदा से जुड़ा कानून मानव निर्मित है, लेकिन, अधिकांश पाकिस्तानी सोचते हैं कि यह ईश्वर द्वारा बनाया गया कानून है और जो भी सरकार इसे हटाने या बदलने की कोशिश करेगी, उसे ईशनिंदा का सबसे बड़ा दोषी माना जाएगा.’ इमाद कहते हैं कि ऐसे में मौलवियों और कटटरपंथियों के डर के कारण कोई सरकार इस कानून में छेड़छाड़ करने या इसे निरस्त करने की हिम्मत नहीं कर पाती.

क्यों आसिया बीबी मामले से बदलाव की उम्मीद जगी थी

पाकिस्तानी मीडिया के मुताबिक आसिया बीबी का ईशनिंदा से जुड़ा पहला ऐसा मामला है जिसमें आरोपित को निचली अदालतों द्वारा मौत की सजा सुनाये जाने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया. इस ऐतिहासिक मामले में तीन सदस्यीय बेंच ने जिस तरह से फैसला सुनाया वह काफी चौंकाने वाला था. कोर्ट ने फैसला सुनाने के दौरान सीधे-सीधे कट्टरपंथियों को निशाने पर लेते हुए कहा, ‘यह कोई भीड़, व्यक्ति या कोई गुट तय नहीं करेगा कि कौन-सा मामला ईशनिंदा के कानून के अंतर्गत आएगा या नहीं. यह फैसला सबूतों और गवाहों को सुनने के बाद देश की अदालत करेगी.’

आसिया बीबी के फोटो के साथ उनकी बेटियां; चार बच्चों की मां आसिया पिछले आठ साल से पाकिस्तान की जेल में बंद हैं | एएफपी
आसिया बीबी के फोटो के साथ उनकी बेटियां; चार बच्चों की मां आसिया पिछले आठ साल से पाकिस्तान की जेल में बंद हैं | एएफपी

इसके बाद इस फैसले पर सरकार और सेना के रुख ने भी न सिर्फ सभी को चौंका दिया बल्कि इसने देश में अल्पसंख्यकों की स्थिति में बदलाव होने की उम्मीद जगा दी. सर्वोच्च अदालत के निर्णय को पाकिस्तान की सरकार और सेना ने सही ठहराते हुए उसका स्वागत किया. सरकार की तरफ से यह भी कहा गया कि अगर आसिया बीबी सुरक्षा के मद्देनजर देश छोड़कर जाना चाहती हैं तो उन्हें इसकी इजाजत होगी.

दुनियाभर लोगों को इससे भी ज्यादा हैरानी तब हुई, जब कट्टरपंथियों की चेतावनी के बाद खुद देश के प्रधानमंत्री इमरान खान ने सामने आकर उन्हें सख्त लहजे में हिदायत दे डाली. अपने भाषणों में अक्सर पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के सिद्धांतों की बात करने वाले इमरान खान के इस रुख को देखकर लगा कि अब वे शायद जिन्ना के ही उस सिद्धांत पर चलने का मन बना चुके हैं जिसके तहत जिन्ना कहते थे, ‘आप किसी भी धर्म से क्यों न हों- देश को आपके धर्म से कोई फर्क नहीं पड़ता.’

फिर कैसे सरकार ने अदालत के फैसले पर पानी फेर दिया

अदालत के फैसले के विरोध में धार्मिक और राजनीतिक पार्टी तहरीक-ए-लबैक ने लाहौर, इस्लामाबाद, कराची सहित पाकिस्तान के सभी बड़े शहरों में जमकर उत्पात मचाया. तहरीक-ए-लबैक के प्रमुख पीर अफजल कादरी ने सरकार और सेना को सीधी चुनौती देते कहा कि यह आंदोलन तब तक बंद नहीं होगा जब तक अदालत अपना फैसला नहीं पलटेगी. कट्टरपंथियों की इस धमकी और आंदोलन को देखते हुए इमरान सरकार ने उनके सामने घुटने टेक दिए.

इमरान खान की सरकार और पंजाब सूबे की सरकार ने अफजल कादरी को आंदोलन खत्म करने के बदले में जो लिखित आश्वासन दिए हैं, उसने कोर्ट के फैसले पर पानी फेर दिया है. सरकार ने कट्टरपंथियों की पहली शर्त यह मानी कि वह आसिया बीबी को हिरासत में ही रखेगी और देश से बाहर नहीं जाने देगी. इसके अलावा कट्टरपंथी आसिया की रिहाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे जिसे सरकार की ओर से कोई चुनौती नहीं दी जायेगी. इसके साथ ही सरकार तहरीके लबैक के गिरफ्तार किए गए आंदोलनकारियों पर कोई मुकदमा दर्ज नहीं करेगी और उन्हें तत्काल रिहा करेगी. अफजल कादरी ने सरकार से आश्वासन मिलने के बाद कहा है कि अगर सरकार पश्चिमी देशों के दबाव में आसिया को पाकिस्तान से बाहर भेजती है तो देश में गृह युद्ध शुरू हो जाएगा.

पाकिस्तान में हमेशा से सरकारें कट्टरपंथियों के दबाव में आकर फैसले लेती रही हैं. यहां तक कि 1987 में ताकतवर सैन्य तानाशाह जिया उल हक़ ने भी मौलवियों और कटटरपंथियों को अपने पक्ष में रखने की वजह से ही ईशनिंदा के कानून में उनके मनमुताबिक बदलाव कर दिए थे. लेकिन, आसिया बीबी मामले में प्रधानमंत्री इमरान खान के शुरुआती रुख से संकेत मिले थे कि अब पाकिस्तान शायद एक नई राह पर निकलेगा. लेकिन, इमरान सरकार के भी कट्टरपंथियों के आगे समर्पण करने के बाद बस यही कहा जा सकता है कि पाकिस्तान बदलाव की चौखट तक आकर फिर वापस लौट गया है.