2019 के लोक सभा चुनाव नज़दीक हैं और सभी सियासी दल मतदाताओं की नब्ज़ टटोलने और उसके मुताबिक़ अपनी चुनावी रणनीतियां बनाने की तैयारी में हैं. चूंकि देश का राजनीतिक माहौल धर्म, जाति, ग़रीबी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों की गिरफ़्त में है इसलिए देश की राजनीति भी इन्हीं के इर्द-गिर्द घूम रही है. आज़ादी के बाद से अब तक कमोबेश सभी सियासी दल कुछ तयशुदा एजेंडों को लेकर ही आगे बढ़ते रहे हैं और इस वजह से विकास से जुड़े मुद्दों को अक्सर अनदेखा किया जाता रहा है.

इसमें मीडिया संस्थानों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. इनमें से ज्यादातर अपनी पसंद और विचारधारा के अनुकूल मतदाताओं के रुझान को प्रभावित करने में अपनी भूमिका निभाते रहते हैं. इस वजह से लोक कल्याण और विकास से जुड़े विषयों पर कोई समझदारी भरी बहस कम ही सुनने को मिलती है. मीडिया के इस शोर-शराबे और राजनीति के कुछ चुनिंदा विषयों से विशेष लगाव के चलते पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दे कहीं बहुत पीछे छूट जाते हैं. मीडिया इन्हें अपनी बहसों में शामिल नहीं करता और राजनीतिक दल अपने चुनावी घोषणापत्रों में.

आज देश की राजधानी एक गाढ़ी धुंध की गिरफ़्त में है और इस स्थिति की निंदा करने के बजाय हमारे पास और कोई विकल्प ही नहीं है. क्यूंकि दिल्ली के लोग अभी यह समझे ही नहीं हैं कि जब तक हम इस मुद्दे को सरकारों के अस्तित्व का प्रश्न नहीं बनाएंगे तब तक उनके कानों पर जूं भी नहीं रेंगने वाली है.

2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार को आदेश दिया था कि वह दिल्ली में प्रवेश करने वाले वाहनों से ‘पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति शुल्क’ वसूल करे. इससे वसूल हुई राशि का दिल्ली के वायु प्रदूषण को (नई तकनीकों के प्रयोग से) कम करने में इस्तेमाल होना था. सूचना का अधिकार के तहत मिली जानकारी बताती है कि इस शुल्क के ज़रिए मिले 700 करोड़ रुपयों को सही जगह पर इस्तेमाल करने में दिल्ली सरकार पूरी तरह से नाक़ाम रही है. चौंकाने वाली बात यह है कि हममें से किसी को भी इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.

दूसरे शहरों के तजुर्बे भी कोई ख़ास हौंसला बंधाने वाले नहीं हैं. बैंगलरू में पानी की प्राथमिक स्रोत ‘वर्तुर झील’ पूरी तरह प्रदूषित हो चुकी है. लेक़िन इस पर अब तक ढंग का कोई सार्वजनिक विरोध आयोजित नहीं किया गया है. इसी तरह, हैदराबाद की हुसैन सागर झील और अन्य शहरों के महत्वपूर्ण स्रोत भी गम्भीर पर्यावरणीय ह्रास झेल रहे हैं.

चौंकाने वाली बात है कि केंद्र ने पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर 75,000 करोड़ रुपए से ज़्यादा की राशि इकट्ठा तो की लेक़िन आज तक इसका कोई इस्तेमाल नहीं हुआ. जनवरी 2017 में विभिन्न राज्यों को ‘वस्तु एवं सेवा कर’ (जीएसटी) की वजह से हुए नुक़सान की भरपाई के लिए वे 56 हजार करोड़ रुपए दे दिए गए जो जलवायु परिवर्तन से पार पाने के लिए आवंटित किए गए थे. लेकिन इन सभी मुद्दों से मतदाताओं को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. और यही वजह है कि पर्यावरण सुरक्षा जैसे अहम मुद्दे हर स्तर के चुनावों में विमर्श से पूरी तरह बाहर हैं.

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक ओर जहां दुनिया भर के कई मुल्क़ पर्यावरण से जुड़े कई अहम क़दम उठा रहे हैं वहीं भारत जलवायु परिवर्तन से निजात पाने के लिए कोई ख़ास संजीदगी नहीं दिखा रहा. हमारे देश से बाहर पिछले कुछ सालों में पर्यावरण सुरक्षा के मसलों को उठाने वाले कुछ राजनैतिक समूह देखने को मिल रहे हैं. इनमें से सबसे क़ामयाब उदाहरण डच ग्रीन लेफ़्ट पार्टी (GroenLinks) का है. इसका गठन 1989 में परंपरागत लेफ्ट पार्टियों के विलय से हुआ और तभी से यह पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को मुख्यधारा की राजनीति में लाने के प्रयास करती रही है.

ग्रीन लेफ्ट की पहली बड़ी जीत 2017 के डच राष्ट्रीय चुनावों में हुई जिसमें इसे करीब नौ फीसदी वोट और केंद्रीय व्यवस्थापिका में 14 सीटें मिलीं. सकी की इस क़ामयाबी में सबसे बड़ा हाथ इसके प्रमुख नेता जेसी क्लेवर का था. क्लेवर ने नीदरलैंड के विश्वविद्यालयों में घूम-घूमकर लोगों को लामबंद किया और विद्यार्थियों के साथ पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर व्यापक चर्चा की. इनमें स्वच्छ ऊर्जा, थर्मल कोयले के संयंत्रों को कम करना, प्रदूषण फैलाने वालों पर कर लगाना, जीवाश्म ऊर्जा पर सब्सिडी को ख़त्म करना और साफ ईंधन के लिए होने वाले अनुसंधानों को बढ़ावा देना शामिल था.

अग़र हम नीदरलैंड्स की भारत से तुलना करे तो हमारे यहां क्लेवर जैसा कोई ऐसा राजनेता मिलना मुश्किल है जो पर्यावरण को लेकर इतना संवेदनशील हो. और कोई ऐसा हो भी क्यों जब ज्यादातर भारतीय इस मसले की गम्भीरता को ही नहीं समझते. सार्वजनिक बहस के मंचों, विशेषकर भारतीय विश्वविद्यालयों में भी अक़्सर परंपरागत मुद्दों पर ही बहस-मुबाहिसा होता है. राजनैतिक रूप से प्रेरित विद्यार्थी-समूह भी ज्यादातर कुछ तयशुदा समस्याओं का राग ही गाते रहते हैं. इसीलिए पर्यावरण सुरक्षा की महत्ता कहीं दिखाई नहीं देती. जबकि पर्यावरणीय ह्रास एक गंभीर चिंता का विषय है और इसके घातक दुष्परिणाम भारत और दुनिया के दूसरे हिस्सों में साफ़ देखे जा सकते हैं. उत्तराखंड की बाढ़, दिल्ली की धुंध और मुंबई की बारिश, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के ही उदाहरण हैं लेक़िन अफ़सोस कि सामान्य विमर्शों में इस पर कोई बात नहीं होती और इसीलिए हमारी सरकारें भी इसे लेकर संजीदा नहीं है.

भारत में, अग़र हम पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन का मुद्दा उठाना चाहते हैं तो विश्वविद्यालयों को इस बारे में लोगों की धारणा को बदलने और हरित एजेंडे को मुख्यधारा की सियासत में लाने के लिए पहल करनी होगी. भारत में भी उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी को ग्रीन लेफ्ट की तर्ज पर ही बनाया गया है. लेकिन अभी यह एक बहुत छोटा सा कदम है और इस दिशा में अभी हमें कई बुनियादी काम करने ही बाकी हैं. इनमें भी सबसे पहला काम पर्यावरण के महत्व को समझना और समझाना है.


रोहित कुमार सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं और प्रदूषण से जुड़े एक मामले में दिल्ली सरकार की पैरवी कर चुके हैं.