राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी ने लंबे इंतजार के बाद गुरुवार रात को अपने प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर दी है. सूबे के 200 विधानसभा क्षेत्रों में से 152 के लिए घोषित किए गए कांग्रेस के उम्मीदवारों में पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासिचव अशोक गहलोत, पार्टी प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट, पूर्व प्रदेशाध्यक्ष व केंद्रीय कैबिनेट मंत्री रह चुके सीपी जोशी और नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी के नाम शामिल हैं. इस सूची में पार्टी ने गहलोत सरकार (2008-13) के 22 मंत्रियों और छह संसदीय सचिवों पर एक बार फिर भरोसा जताया है जबकि 2013 विधानसभा चुनाव के अपने प्रत्याशियों में से 79 नाम बदल दिए हैं. इनमें बीडी कल्ला और डॉ चंद्रभान जैसे पूर्व प्रदेशाध्यक्षों समेत 24 प्रत्याशी ऐसे हैं जो दो बार से लगातार जीत हासिल करने में नाकाम रहे थे.

कांग्रेस ने राजस्थान विधानसभा चुनावों के लिए नामांकन के तीन दिन गुज़र जाने के बाद अपने उम्मीदवारों को फाइनल किया है जबकि प्रदेश में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी रविवार के बाद से अभी तक ऐसी दो सूचियां सार्वजनिक कर चुकी है. अभी दोनों दलों के प्रत्याशियों की आख़िरी लिस्ट आना बाकी है. जानकार कांग्रेस पार्टी द्वारा प्रत्याशियों के नाम घोषित करने में हुई इस लंबी देर के पीछे कई कारण बताते हैं जिनमें से प्रदेश संगठन के दिग्गज नेताओं की आपसी तनातनी को प्रमुखता से गिनवाया जा रहा है.

हालांकि, कुछ जानकारों की मानें तो यह आपसी सिर फुटव्वल इस बार कांग्रेस के लिए फायदे का सौदा साबित हुई है. दरअसल इसके चलते कांग्रेस खुद में ही उलझ कर रह गई जबकि भाजपा ने अपने अधिकतर चेहरों से पर्दा हटा दिया. सूत्रों की मानें तो इस वजह से कांग्रेस को कई सीटों पर जातिगत और राजनैतिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए अपना प्रत्याशी बदलने का मौका मिल गया. इसी के चलते कांग्रेस को भाजपा से बागी हुए सांसद हरीश मीणा व विधायक हबीबुर्रहमान जैसे नेताओं के अलावा कन्हैयालाल झंवर जैसे कद्दावर नेताओं को भी खुद से जोड़ने का मौका मिला.

हालांकि सूची को गौर से देखें तो पार्टी ने अपने अध्यक्ष राहुल गांधी के उस दावे को हवा में उड़ाने का भी किया है जिसमें उन्होंने पैराशूट प्रत्याशियों की डोरी काट देने की बात कही थी. इनमें से यदि झंवर की बात करें तो उन्होंने सूची सामने आने से महज कुछ ही मिनट पहले कांग्रेस पार्टी का हाथ थामा है. पैराशूट प्रत्याशी का आना अक्सर स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी का सबब बनता है. यानी यह सूची कांग्रेस के लिए फायदे और नुकसान, दोनों का सबब हो सकती है.

इस सूची में देर इस कशमकश के चलते भी हुई कि पार्टी प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट इस चुनाव में खड़े होकर सिर्फ एक क्षेत्र से नहीं बंधना चाहते थे और हाईकमान के सामने ऐसी ही कुछ राय उन्होंने गहलोत और जोशी के लिए भी दी थे. जबकि अशोक गहलोत शुरु से ही इससे विपरीत मंशा ज़ाहिर करते रहे हैं. इस बारे में चली लंबी गहमागहमी के बाद बुधवार को पायलट ने यह चुनाव लड़ने के लिए अपनी सहमति ज़ारी कर दी थी.

इस विधानसभा चुनाव में जहां गहलोत और सीपी जोशी अपनी-अपनी पारंपरिक सीटों सरदारपुरा (जोधपुर) व नाथद्वारा (राजसमंद) से ताल ठोकेंगे तो वहीं पायलट ने अपने पहले विधानसभा चुनाव के लिए टोंक विधानसभा क्षेत्र को सर्वाधिक मुफ़ीद माना है. दरअसल, परिसीमन के बाद टोंक में गुर्जर मतदाता बड़ी संख्या में जुड़े हैं जो अपने समुदाय से आने की वजह से कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष को एकतरफा समर्थन देते हैं. इसके अलावा इकलौती मुस्लिम रियासत होने के दौर से ही टोंक में कांग्रेस के पारंपरिक वोटर माने जाने वाले मुस्लिम समुदाय की तादाद भी अच्छी-खासी बताई जाती है.

इस सूची में कुछ नामों के शामिल न होने ने प्रदेश के राजनीतिकारों को चौंकाया भी है. इनमें भरतपुर के पूर्व राजवंश से ताल्लुक रखने वाले मौजूदा विधायक विश्वेंद्र सिंह और पार्टी प्रवक्ता अर्चना शर्मा शामिल हैं. इसके अलावा जबरदस्त चर्चाओं के बावजूद पूर्व केंद्रीय भंवर जितेंद्र सिंह अलवर से मैदान में नहीं उतरे हैं. बहरहाल, इंतेहा की हद तक इंतजार करवाने के बाद कांग्रेस ने अपने सिपाहियों को मैदान में उतार तो दिया है, लेकिन यह वक़्त ही बताएगा कि पार्टी की यह पहली फेहरिस्त ‘देर आए दुरुस्त आए’ वाली कहावत पर कितनी ख़री उतरेगी.