केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोक समता दल के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा 2019 के लोकसभा चुनावों में किस ओर रहेंगे, इसे लेकर संशय बना हुआ है. 2013 में जब नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड ने भारतीय जनता पार्टी का साथ छोड़ दिया था और बिहार में भाजपा के पास कोई साझीदार नहीं था तब उपेंद्र कुशवाहा 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए बिहार में भाजपा के पहले सहयोगी के तौर पर उभरकर सामने आए थे. बाद में रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी भी भाजपा के साथ आ गई थी.

लेकिन अब बदली हुई परिस्थितियों में भाजपा की पुरानी सहयोगी जनता दल यूनाइटेड उसके साथ है और ऐसे में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी के लिए भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में कोई प्रमुख भूमिका नहीं दिख रही है. कभी नीतीश कुमार के बेहद नजदीक रहे उपेंद्र कुशवाहा के लिए नीतीश के साथ कामकाजी संबंध चलाना भी मुश्किल लगता है. ऐसे में कुशवाहा के लिए कई तरह से अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है. लेकिन इसमें जाने से पहले बिहार में उपेंद्र कुशवाहा के उभार और उनकी राजनीतिक पूंजी से संबंधित कुछ बुनियादी बातों को जानना जरूरी है.

बिहार की राजनीति में उपेंद्र कुशवाहा की पहली बार पहचान बनते तब दिखी जब वे नीतीश कुमार के साथ थे. यह 90 के दशक के उत्तरार्ध की बात है. तब नीतीश कुमार ने उन्हें तरजीह देना शुरू किया था. जाॅर्ज फर्नांडिस की अगुवाई वाली समता पार्टी में नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा दोनों साथ-साथ थे. वे समता पार्टी के महासचिव भी थे. लेकिन पहली बार उपेंद्र कुशवाहा की प्रदेशव्यापी पहचान बनने की शुरुआत तब हुई जब वे 2000 में विधायक बनने के बाद विधानसभा में समता पार्टी के उपनेता बनाए गए. 2004 में नीतीश कुमार ने उन्हें बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया और इस दौरान उन्हें सदन में समता पार्टी के नेता की भूमिका भी निभाई.

उपेंद्र कुशवाहा के राजनीतिक जीवन का वह दौर ऐसा था जब नीतीश कुमार के साथ उनकी खूब बनती थी. लेकिन जब 2005 में नीतीश कुमार भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से पूर्ण बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बने तो नीतीश सरकार में कुशवाहा के लिए जगह नहीं बन पाई. तकरीबन पांच साल बाद नीतीश कुमार ने जेडीयू की ओर से उन्हें राज्यसभा सांसद बनाया. लेकिन 2012 आते-आते यह बात सार्वजनिक हो गई कि नीतीश कुमार से उपेंद्र कुशवाहा के संबंध सहज नहीं रहे हैं.

उपेंद्र कुशवाहा ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा तो 2013 में दिया लेकिन जेडीयू से अलग एक नई पार्टी बनाने को लेकर उन्होंने कोशिशें 2012 में ही शुरू कर दी थीं. जेडीयू में उनके साथ रहे और जहानाबाद के सांसद अरुण कुमार इस कोशिश में उपेंद्र कुशवाहा के साथ हो गए.

उस दौर में इन दोनों के करीब रहे विश्वस्त लोग बताते हैं कि अलग पार्टी बनाने को लेकर अरुण कुमार ने उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर काम कर रहे नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात की थी. भाजपा में पहले कुछ लोग यह चाहते थे कि उपेंद्र कुशवाहा और अरुण कुमार दोनों भाजपा में शामिल हो जाएं और भाजपा के टिकट पर 2014 लोकसभा चुनाव लड़ें. लेकिन वहीं भाजपा के अंदर दूसरा धड़ा ऐसा भी था जो यह चाहता था कि ये दोनों मिलकर एक नई पार्टी बनाएं ताकि जेडीयू के कुछ प्रमुख नेताओं को तोड़कर इस नई पार्टी में लाया जा सके और यह पार्टी भाजपा के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़े. इसी योजना के तहत राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का गठन हुआ.

भाजपा के पास उस वक्त बिहार में कोई साझीदार नहीं था. ऐसे में भाजपा के समर्थन से बनी आरएलएसपी बिहार में 2014 के लोकसभा चुनावों के लिहाज से भाजपा की पहली सहयोगी बनी. बाद में रामविलास पासवान की अध्यक्षता वाली लोक जनशक्ति पार्टी भी भाजपा के साथ आ गई. अगर एलजेपी भाजपा के साथ नहीं आती तो 2014 के लोकसभा चुनावों में आरएलएसपी पांच-छह सीटों पर चुनाव लड़ती. लेकिन एलजेपी के आने की वजह से आरएलएसपी को तीन सीटों पर संतोष करना पड़ा.

लोकसभा चुनावों के बाद जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनी तो उपेंद्र कुशवाहा केंद्र में मंत्री बनाए गए. लेकिन अब उन्हीं अरुण कुमार से उनकी ठनने लगी जिन्होंने जेडीयू से अलग होकर नई पारी खेलने में उनकी हर कदम पर मदद की थी. धीरे-धीरे स्थिति यह हो गई कि अरुण कुमार और कुशवाहा के रास्ते अलग हो गए. इसका मतलब यह हुआ कि जो तीन सांसद कुशवाहा की पार्टी के पास थे, उसमें से सिर्फ दो ही उनके पास बचे.

इन सबके बीच जब जेडीयू जुलाई, 2017 में वापस भाजपा के साथ आ गई. कुछ ही महीने में यह स्पष्ट होने लगा कि 2019 के लोकसभा चुनावों को लेकर सीटों का जो बंटवारा होगा उसमें जेडीयू को सम्मानजनक सीटें देने के लिए भाजपा, एलजेपी और आरएलएसपी तीनों की सीटों में कटौती होगी. लेकिन कुशवाहा इसके लिए तैयार नहीं दिखे. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर आरएलएसपी की सीटों को कम किए जाने की किसी भी कोशिश का विरोध किया. वे और उनकी पार्टी सार्वजनिक तौर पर नीतीश कुमार के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं.

दरअसल, उपेंद्र कुशवाहा की राजनीति पर अस्तित्व का संकट मंडराने की कई वजहें दिख रही हैं. सबसे पहली बात यह कि जिस तरह से 2014 में भाजपा उन पर निर्भर थी, वह निर्भरता जेडीयू के आने के बाद नहीं है. नीतीश कुमार और कुशवाहा मोटे तौर पर एक ही वोट बैंक की राजनीति करते हैं और इसमें निश्चित तौर पर नीतीश कुमार कुशवाहा पर हमेशा भारी पड़े हैं. बताया जाता है कि यही वजह थी कि जब नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ मिलकर फिर से सरकार बनाई तो दो विधायकों वाली लोक जनशक्ति पार्टी को तो उन्होंने अपनी सरकार में जगह दी लेकिन कुशवाहा की पार्टी को इससे बाहर ही रखा.

दूसरी बात यह है कि उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के सांसद अरुण कुमार उनके साथ नहीं हैं. ऐसे ही उनके विधायकों के भी जेडीयू में शामिल होने की संभावना है. उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी 2015 विधानसभा चुनाव 23 सीटों पर लड़ी थी. इनमें से दो पर उसे सफलता मिली थी. बताया यह जा रहा है कि उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के दोनों विधायक ललन पासवान और सुधांशु शेखर जेडीयू में जाने वाले हैं. इन दोनों ने जेडीयू के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर से इस बारे में मुलाकात भी की है. अगर ये दोनों जेडीयू में चले जाते हैं तो कुशवाहा के पास कोई भी विधायक नहीं रहेगा.

तीसरी बात यह है कि उपेंद्र कुशवाहा जिस काराकाट लोकसभा सीट से सांसद हैं, वहां उनकी स्थिति बेहद खराब बताई जा रही है. काराकाट नई लोकसभा सीट बनी है. कुशवाहा खुद इस क्षेत्र के रहने वाले नहीं हैं. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की लहर और जातिगत समीकरणों की वजह से वे इस सीट पर कामयाबी हासिल करने में सफल रहे थे. उनके संसदीय क्षेत्र के लोगों से बातचीत करने पर पता चलता है कि स्थानीय लोग न तो बतौर सांसद उनके कामकाज से खुश हैं और न ही अगले चुनाव में उनके जीतने की संभावना देख रहे हैं.

इन परिस्थितियों में उपेंद्र कुशवाहा की आखिरी उम्मीद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव बचे हैं. सूत्रों के मुताबिक जिस तरह से जेडीयू कुशवाहा के विधायकों को तोड़ने में लगी है उसके खिलाफ कुशवाहा अमित शाह के समक्ष हस्तक्षेप की गुहार लगाने वाले हैं. अब अमित शाह इस मामले में हस्तक्षेप करते हैं या नहीं, यह तो उनकी राजनीतिक योजना पर निर्भर करेगा. अगर उपेंद्र कुशवाहा एनडीए से निकलते हैं तो उनके पास आरजेडी और कांग्रेस के खेमे में जाने का विकल्प है. लेकिन वहां भी वे एनडीए से ज्यादा अच्छी स्थिति में रहेंगे, इसे लेकर अभी कोई स्पष्टता नहीं है.

कुल मिलाकर स्थिति यह है कि कभी बिहार में एनडीए का सबसे बड़ा नेता बनने का ख्वाब देखने वाले उपेंद्र कुशवाहा अपनी और अपनी पार्टी की राजनीति को भी बचा पाते हैं या नहीं, यह अब खुद उनकी बजाए दूसरे नेताओं और दूसरी पार्टियों पर निर्भर हो गया है.