राजस्थान विधानसभा चुनावों के लिए भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस अपने-अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर चुकी हैं. लेकिन, प्रदेश के राजनीतिकारों को सबसे ज्यादा जिस नाम ने चौंकाया है, वह है मानवेंद्र सिंह जसोल. हाल ही में भाजपा से बाग़ी होकर कांग्रेस का हाथ थामने वाले विधायक मानवेंद्र सिंह को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ झालरापाटन (झालावाड़) से मैदान में उतारा गया है.

कांग्रेस का मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा यह दांव कई मायनों में दिलचस्प है. अव्वल तो यही कि कांग्रेस से जुड़ने के बाद ख़ुद मानवेंद्र विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने की इच्छा कई बार ज़ाहिर कर चुके हैं. दूसरे, वे पश्चिमी राजस्थान में पाकिस्तान के सीमावर्ती जिले बाड़मेर से आते हैं जो कि दूसरे छोर पर स्थित झालरापाटन से करीब सात सौ किलोमीटर दूर है. जानकारों का कहना है कि मानवेंद्र सिंह के लिए झालरापाटन तो जाना-पहचाना हो सकता है, लेकिन वहां के मतदाताओं के लिए वे और उनके लिए वहां के मतदाता बिल्कुल नए होंगे.

वहीं, इस क्षेत्र से लगातार तीन लोकसभा और तीन विधानसभा चुनावों में विजय पताका फहराने वाली वसुंधरा राजे वहां की तीन पीढ़ियों पर जबरदस्त पकड़ रखती हैं. ऐसे में, झालरापाटन कांग्रेस के किसी भी नेता के लिए डूबते जहाज़ से कम नहीं माना जाता. इसके अलावा, मानवेंद्र सिंह को टिकट देकर कांग्रेस ने अपने अध्यक्ष राहुल गांधी की उस बात को भी जुमला साबित किया है जिसमें उन्होंने पैराशूट उम्मीदवारों की डोरी अपने हाथ से काटने का दावा किया था.

हालांकि, झालरापाटन से टिकट मिलने से जुड़ी किसी भी पूर्व जानकारी के सवाल पर मानवेंद्र सिंह ने मीडिया के सामने अनभिज्ञता ज़ाहिर की है. लेकिन, कुछ जानकारों का कहना है कि पार्टी की तरफ से उन्हें इस बात का इशारा पहले दिन से था. वहीं, कुछ का मानना है कि पिता जसवंत सिंह के अपमान का बदला लेने के लिए मानवेंद्र ने ही इस सीट को अपने लिए मांगा था. उनके राहुल गांधी की झालावाड़ में आयोजित चुनावी रैली में प्रमुखता से शामिल होने को इन्हीं कयासों से जोड़कर देखा जा रहा है. कुछ अन्य सूत्रों की मानें तो विभिन्न सर्वे रिपोर्ट्स के आधार पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मुकुल वासनिक और अहमद पटेल ने हाईकमान के सामने मानवेंद्र को झालरापाटन से मौका देने का मशवरा दिया था.

इसमें कोई दो राय नहीं कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के सामने ताल ठोककर मानवेंद्र ने अपने कंधे पर पहाड़ उठाने जैसी चुनौती स्वीकार की है. लेकिन कुछ विश्लेषक ऐसे भी हैं जो इस घटनाक्रम को इतिहास बदलने वाला भी कह रहे हैं. अपनी बात के पक्ष में ये लोग झालावाड़ में हुए हालिया नगरपालिका, निकाय और छात्रसंघ चुनावों का हवाला देते हैं जिनमें कांग्रेस और उसका छात्र संगठन एनएसयूआई अच्छा प्रदर्शन करने में सफल रहे थे. कुछ अन्य जानकार प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों और किसानों की वसुंधरा राजे से नाराज़गी को भी मानवेंद्र को फायदा पहुंचाने वाले बड़े फ़ैक्टर के तौर पर देख रहे हैं.

झालरापाटन के जातिगत समीकरण भी मानवेंद्र के हौसले को हिम्मत देते दिखते हैं. यहां कांग्रेस के पारपंरिक वोटर माने जाने वाले दलित और मुस्लिमों के अलावा गुर्जर और सोंधिया राजपूत समुदाय से ताल्लुक रखने वाले मतदाता भी बड़ी संख्या में हैं. जहां भाजपा से नाराज़ राजपूतों को खुद मानवेंद्र सिंह अपने साथ जोड़ने का माद्दा रखते हैं, वहीं कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट की वजह से गुर्जर समुदाय का समर्थन भी सिंह को मिलने की संभावना है. हालांकि इसी सीट से सचिन पायलट की मां, रमा पायलट, वसुंधरा राजे से मात खा चुकी हैं. लेकिन, तब उनके पास राजपूतों का समर्थन न होने की बात कही जाती है.

प्रदेश के कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि मानवेंद्र सिंह 21 साबित हों या न हों, लेकिन उन्हें आगे कर कांग्रेस ने राजे को चुनावों तक अपना अधिकतर समय झालरापाटन में ही बिताने को मजबूर कर दिया है. ऐसा होने की स्थिति में सूबे के अन्य जिलों में मुख्यमंत्री के प्रस्तावित अधिकतर प्रचार कार्यक्रमों को रद्द करना पड़ सकता है जो भाजपा कार्यकर्ताओं के आत्मविश्वास के लिए ठीक नहीं रहेगा. वरिष्ठ पत्रकार ओम सैनी कहते हैं, ‘मानवेंद्र के आ जाने से यह चुनाव राजे के लिए वैसा ‘कैटवॉक’ साबित नहीं होने वाला जैसा कि वे समझती रही हैं.’

जयनारायण व्यास (1952), टीकाराम पालीवाल (1968), अशोक गहलोत (1989) और भैरोसिंह शेखावत (1993) जैसे पूर्व मुख्यमंत्रियों को मिली हार का ज़िक्र कर सैनी इस चुनाव में वसुंधरा राजे को हो सकने वाली मुश्किलों के आकलन की कोशिश करते हैं. इनमें से अशोक गहलोत को तो जसवंत सिंह जसोल ने ही परास्त किया था. कांग्रेस की पहली लिस्ट में इंतेहा की हद तक हुई देर को लेकर पार्टी के सांसद रघु शर्मा ने कहा था, ‘जितना मंथन होगा उतना अमृत निकलेगा?’ अब, देखने वाली बात होगी कि क्या मानवेंद्र सिंह कांग्रेस के लिए वही अमृत साबित हो पाते हैं या नहीं?