महोदय,

मैं अलग-अलग संबोधनों के साथ इतने आवेदन लिख चुका हूं कि अब मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं ये खत किसे संबोधित कर लिखूं, इसलिए सिर्फ महोदय!

मैं तेजप्रताप शर्मा, मध्य प्रदेश के छोटे से जिले रीवा में रहने वाला 75 साल का बुजुर्ग व्यक्ति हूं. ऐसा बुजुर्ग जो दिल का मरीज है और बीते साल बाईपास सर्जरी झेलने के बाद, एक तरह से दूसरा जीवन जी रहा है. बिना लाग लपेट सीधे काम की बात पर आता हूं. इस उम्र और हालत में भी मेरा कष्ट शारीरिक से ज्यादा मानसिक है क्योंकि दिल की बीमारी और बुढ़ापे से तो मैं बीते कुछ ही सालों से परेशान हूं लेकिन अपने साथ हुए अन्याय का दंश मैं पिछले 25 सालों से झेल रहा हूं.

साल 1987 में लोकसेवा आयोग मध्य प्रदेश, इंदौर से अपने 23 साथियों के साथ सीधी भरती द्वारा मैं उपसंचालक कृषि के पद पर चयनित हुआ था. लेकिन सही वरीयता नहीं मिलने के कारण लंबे समय तक मुझे पदोन्नति नहीं दी गई. मेरे प्रमोशन में इतनी देर हुई कि सालों नौकरी करने के बाद मैं रिटायर भी हो गया और अब रिटायर होने के बाद भी करीब 15 साल गुजर चुके हैं.

ऐसा नहीं है कि इसके लिए मैंने वक्त पर कोशिश नहीं की. जब तक नौकरी रही सालों इसी तरह के आवेदन और चिट्ठियां लिखता रहा. फिर भी जब आश्वासन या टालमटोल के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगा तो मैंने माननीय अदालत में जाना ही ठीक समझा. कई सालों की कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद बीते साल नवंबर में जबलपुर हाई कोर्ट से भी मैं मुकदमा जीत गया. हाई कोर्ट में वर्ष 1990-91 में वरिष्ठता मिलने के फलस्वरूप जनवरी, 1993 से संयुक्त संचालक कृषि और दिसंबर, 1997 से अपर संचालक कृषि के पद पर पदोन्नति सबंधी आदेश दिया. साथ ही विभागीय प्रमुख सचिव, किसान कल्याण और कृषि विभाग को आदेशित किया कि तीन महीने के भीतर मुझे उक्त पदों पर पदोन्नति देकर समस्त सेवानिवृत्ति लाभों के साथ रिवाइज्ड पेंशन फिक्सेशन किया जाए.

लेकिन जल्दी ही केस जीतने की मेरी यह खुशी काफूर हो गई क्योंकि आदेश को अमली जामा पहनाने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे थे. इसलिए तीन महीने बाद मुझे अवमानना नोटिस जारी करवाने के लिए मजबूर होना पड़ा और यह मामला भी जबलपुर हाई कोर्ट में चल रहा है. फरवरी, 2018 में अवमानना नोटिस जारी होने के बाद विभाग और प्रमुख सचिव अपने बचाव का रास्ता निकालने लगे और आरक्षण से जुड़े कुछ ऐसे मामलों की दुहाई देकर मुझे मेरा हक देने से इंकार कर दिया, जिनका मेरे प्रकरण से कोई संबध ही नहीं था. फिर भी मेरे लिए यह आश्चर्य की बात नहीं थी क्योंकि साल 2012 में भी मुख्य सचिव द्वारा मेरे साथ यह व्यवहार किया जा चुका है.

दरअसल 2006 में जब पदोन्नति के लिए मेरे नाम पर विचार किया जा चुका था, उसके पहले ही आरक्षण में पदोन्नति के तहत पांच अधिकारी चयनित हो चुके थे. लेकिन विभाग बाद में यह कहकर बचना चाह रहा है कि केवल आरक्षित कोटे में आने वालों की पदोन्नति होनी थी जो कि हो चुकी है, इसलिए मेरी पदोन्नति नहीं की जा सकती. अब इसे जबरदस्ती की बात नहीं तो क्या कहेंगे. इसके अलावा उस समय माननीय कोर्ट के आदेश का पालन वक्त रहते नहीं किया गया था, बाद में पहले विधानसभा चुनावों के चलते लगी आचार-संहिता और फिर यही बेजा बहाना देकर मेरी फाइल रोक दी गई थी. एक बार फिर से वही परिस्थितियां बन रही हैं और मुझे फिर से आचार-संहिता का हवाला दिया जाने लगा है.

इन सबके बीच सबसे ज्यादा जो बात मुझे चौंकाती है वो यह कि केस जीतने के तुरंत बाद वकील ने मेरी फाइल वापस कर दी. मुझे पता चला है कि उसने ऐसा किसी ऊपरी दबाव के चलते किया है. इसके अलावा अवमानना के मामले मैं जब भी अपनी सुनवाई पर जाता हूं (जहां हर बार तारीखें बढ़ने के अलावा कुछ भी नहीं होता) हाई कोर्ट के क्लर्क से लेकर तमाम लोग जो मेरे केस के बारे में जानते हैं, मुझे घर बैठने की सलाह देते नजर आते हैं. कुछेक ने दबे शब्दों मुझे य़ह तक कहा है कि यहां एरियर्स से जितना पैसा आपको मिल सकता था उससे कहीं ज्यादा तो आपकी फाइल कोर्ट और विभाग में आगे न बढ़ाने के लिए खर्च किए जा चुके हैं. यह सब क्या हो रहा है, मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है.

मुझे समझ नहीं आता कि 75 साल का एक बूढ़ा, जो दिल का मरीज है और अपने इलाज के चलते लाखों के कर्ज से दबा हुआ है, वह इतने बड़े सरकारी अमले का क्या बिगाड़ सकता है. मुझे यह भी समझ नहीं आता कि क्या सिर्फ अदालत का आपके हक में फैसला दे देना ही न्याय कर देना है? यह तो बिल्कुल नहीं कि आखिर कृषि विभाग, कार्मिक एवं पेंशनर विभाग और मुख्य सचिव मेरी थोड़ी सी बची जिंदगी आसान बना देने का अदना कष्ट उठाकर कितने नुकसान में आ सकते हैं? अदालत ने अगर मेरे हक में फैसला देकर मेरे साथ न्याय किया था तो वह आज तक मुझे मिला क्यों नहीं है? और सबसे बड़ा सवाल क्या इस तरह की पीड़ा झेलने वाला मैं दुनिया में अकेला हूं?

तेज प्रताप शर्मा