छत्तीसगढ़ में दूसरे चरण के मतदान से पहले पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और बसपा प्रमुख मायावती ने बड़ा बयान दिया. एक ओर, अजीत जोगी ने सूबे में नई सरकार बनाने के लिए भाजपा के साथ गठबंधन के लिए तैयार होने की बात कही. वहीं, मायावती का कहना था कि वे विपक्ष में बैठना पसंद करेगी लेकिन, भाजपा या कांग्रेस के साथ नहीं जाएंगी.

जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ प्रमुख अजीत जोगी और मायावती ने चुनाव से पहले जब एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया था तो माना गया कि इससे कांग्रेस को बड़ा नुकसान पहुंच सकता है. इसकी वजह उनका सतनामी संप्रदाय से आना बताया गया. इस संप्रदाय की राज्य की आबादी में करीब 12 फीसदी की हिस्सेदारी है. अजित जोगी का बिलासपुर, जांजगीर-चांपा और दुर्ग के इलाके में प्रभाव माना जाता है. साथ ही, यह भी माना गया कि पूर्व कांग्रेसी होने की वजह से वे अपनी पुरानी पार्टी के लिए ‘वोट कटुआ’ साबित होंगे. वहीं, पिछले चुनावों में बसपा का वोट शेयर चार से सात फीसदी रहा है. सो ये सभी समीकरण मिलकर कांग्रेस का खेल बिगाड़ और भाजपा का बना सकते हैं.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह भी इस बात को कई बार दुहरा चुके हैं कि अजीत जोगी और मायावती के गठबंधन का असर कम से कम 30 सीटों पर होगा. साथ ही, उनका कहना था कि इसकी वजह से भाजपा को जहां 20 फीसदी मतों का नुकसान हो सकता है. वहीं, कांग्रेस को अपने 40 फीसदी वोट गंवाने पड़ सकते हैं. उनकी इन बातों से ये संकेत मिलते हैं कि वे राज्य में सत्ता विरोधी लहर के बीच ‘जोगी फैक्टर’ के सहारे चौथी बार मुख्यमंत्री बनने का रास्ता तलाश रहे हैं. हालांकि, अनुमानों से इतर जमीनी पड़ताल की बात करें तो इस गठबंधन की वजह से कांग्रेस से अधिक भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है.

‘जोगी फैक्टर’ की वजह से भाजपा को अधिक नुकसान की संभावना

अजीत जोगी का प्रभाव जिस बिलासपुर, जांजगीर-चांपा और दुर्ग इलाके में माना जाता है उसमें विधानसभा की कुल 19 सीटें हैं. इनमें से 11 पर भाजपा का कब्जा है. वहीं, कांग्रेस ने सात सीटों पर जीत दर्ज की है. हालांकि, इनमें से दो विधायक - अमित जोगी और रेणु जोगी - कांग्रेस से बाहर हो चुके हैं और इस चुनाव में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ की ओर से चुनावी दंगल में हैं. साल 2013 के चुनाव में अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित 10 में से नौ सीटों पर भाजपा ने कब्जा किया था. अब अगर इन सीटों पर अजीत जोगी या मायावती फैक्टर काम करता है तो कांग्रेस की तुलना में भाजपा को अधिक नुकसान पहुंचा सकता है.

इसके अलावा एक फैक्टर सत्ता विरोधी रुझान का भी है. राज्य में उच्च वर्ग और मध्यम तबके को छोड़कर अलग-अलग मुद्दों पर रमन सिंह की सरकार के खिलाफ लोगों में काफी नाराजगी दिखती है. राज्य में कई लोगों का मानना है कि यह नाराजगी पिछले चुनाव में भी थी लेकिन इसके बावजूद अगर कांग्रेस अब तक अपनी चुनी हुई सरकार यहां नहीं बना पाई है तो इसकी बड़ी वजह अजीत जोगी है. इस बारे में रायगढ़ इलाके में पैकर्स का काम करने वाले रवीन्द्र यादव का कहना है, ‘अजीते जोगी जी दे दिए जो भाजपा आ गई. छत्तीसगढ़ में किसी और को लोग जानते भी नहीं थे.’ हमने जब उनसे पूछा कि क्या केवल लोग अजीत जोगी को ही जानते थे. इस पर संयुक्त मध्य प्रदेश में अर्जुन सिंह से लेकर रमन सिंह तक की सरकार को देखने वाले रवीन्द्र का कहना था, ‘जोगी को नहीं, पंजा को केवल जानते थे. अजीत जोगी जी आए और ऐसा उल्टा-सीधा काम किए कि भाजपा को चांस मिल गया.’ रवीन्द्र यादव की तरह कइयों का मानना है कि चुनाव में अगर कांग्रेस अजीत जोगी के साथ होती तो इससे भाजपा को ही फायदा पहुंचता.

अजीत जोगी की घटती विश्वसनीयता और पहचान का संकट

अजीत जोगी ने चुनावी नतीजे आने से पहले ही खुद को राज्य का भावी मुख्यमंत्री घोषित कर दिया है. लेकिन इस चुनाव में उनके फैसलों और बयानों से उनकी विश्वसनीयता लगातार कम होती दिख रही है. कुछ महीने पहले उन्होंने ऐलान किया कि वे विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री रमन सिंह के खिलाफ राजनांदगांव से ताल ठोकेंगे. इसके बाद उन्होंने कहा कि वे चुनाव नहीं लडेंगे. आखिर में कार्यकर्ताओं की इच्छा का हवाला देकर उन्होंने अपने बेटे अमित जोगी की सुरक्षित सीट मारवाही से उतरना सही समझा. और अब सत्ता विरोधी माहौल में वे भाजपा के साथ जाने की बात कहकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हुए दिख रहे हैं. ऐसा कहके उन्होंने भाजपा के साथ अपनी मिलीभगत के आरोपों को भी मजबूत कर दिया है. रायपुर के कारोबारी दिलीप सर्राफ का कहना है, ‘जोगी को तो भाजपा ने ही खड़ा किया है. और अगर भाजपा को बहुमत से कुछ सीटें मिलती हैं तो वह उन्हें अपने साथ ले जा सकती हैं.’ ऐसे में कई मतदाताओं का मानना है कि अजीत जोगी के साथ जाने का मतलब सत्ता विरोधी रूझान को कमजोर करना होगा.

अजीत जोगी को न केवल विश्वसनीयता बल्कि अपनी पहचान के संकट से भी जूझना पड़ रहा है. करीब तीन दशक तक कांग्रेसी नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाने के बाद अब उनके लिए इससे पीछा छुड़ाना भी मुश्किल हो रहा है. सूबे के गांव-देहात में मतदाताओं की बड़ी संख्या उन्हें ‘पंजा छाप वाले नेता’ के तौर पर ही जानते हैं. ऐसे में उनके कई समर्थक उन्हें पंजा छाप वाला समझकर ही कांग्रेस के मतों की संख्या में बढ़ोतरी कर सकती है. कांग्रेस और भाजपा के बीच कड़ी टक्कर वाली सीटों पर यह वोट भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर सकता है.

जोगी का भूत

जब हमने लोगों से अजीत जोगी की सियासी पारी के भविष्य की बात छेड़ी तो मतदाता हमें उनके भूत की ओर ले गए. राज्य के लोगों का मानना था कि जिस तरह इंदिरा गांधी के शासन में संजय गांधी की भूमिका थी, ठीक वैसे ही भूमिका जोगी सरकार (2000-03) में उनके बेटे अमित जोगी की थी. फिलहाल पार्टी के नीतिगत फैसलों में उनकी बड़ी भूमिका रहती है. वरिष्ठ पत्रकार विनोद वर्मा अपने एक लेख में अमित जोगी के बारे में वे लिखते हैं, ‘अपने पिता के मुख्यमंत्री रहते हुए ही अमित जोगी पर एनसीपी के प्रदेश कोषाध्यक्ष की हत्या का आरोप लगा. उन्हें लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा तो यह डर स्थायी हो गया. इतना स्थायी कि चुनाव के समय भाजपा के लोग चुनाव प्रचार के दौरान कहने लगे कि भाजपा को नहीं जिताया तो जोगी फिर मुख्यमंत्री बन जाएंगे. इस चुनाव की बात करें तो इसमें भी उनके साथ-साथ, उनकी पत्नी, बेटा और बहू सभी चुनाव लड़ रहे हैं. नैला के रहने वाले 30 वर्षीय आशीष शर्मा इस पर तंज भरे लहजे में कहते हैं, ‘जोगी का वश चले तो पेट में पलने वाले बच्चे को भी चुनाव में उतार दें.’

अजीत जोगी पर अपने फायदे के लिए पार्टी उम्मीदवारों को ही चुनाव में मात देने के लिए हर तरह की तिकड़मबाजी करवाने के आरोप लगते रहे हैं. 2013 में एक माओवादी हमले में जब कांग्रेस के शीर्ष नेताओं - महेंद्र कर्मा, विद्याचरण शुक्ल और नंद कुमार पटेल - की मौत हुई थी तो इसके पीछे भी अजीत जोगी का नाम होने की बात कही गई थी. ‘जोगी परिवार को लेकर कांग्रेसियों के मन में भी बहुत डर भरा रहता है कि पता नहीं वे क्या कर दें.’ विनोद वर्मा अपने एक लेख में कहते हैं.