छत्तीसगढ़ चुनाव के लिए रविवार को प्रचार का शोर थमने के साथ ही राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा एक-दूसरे पर निशाना साधने की होड़ भी थम गई. सूबे की 90 सीटों में से 72 यानी 80 फीसदी सीटों पर आज मतदान है. इससे पहले बीती 12 नवंबर को नक्सल प्रभावित 18 सीटों के लिए मतदान हुआ था. छत्तीसगढ़ में दो प्रमुख प्रतिद्वंदी पार्टियां हैं - भाजपा और कांग्रेस. इनके अलावा कांग्रेस से निकाले गये नेता अजीत जोगी और मायावती का गठबंधन भी है जो इस बार के चुनाव में खुद को इनके विकल्प के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा था.

अगर छत्तीसगढ़ चुनाव में मुद्दों की बात करें तो इन्हें मोटे तौर पर दो हिस्सों में बांटा जा सकता है. एक राजनीतिक दलों के मुद्दे और दूसरे ढाई करोड़ आबादी के मुद्दे. करीब दो हफ्तों के चुनावी अभियान में सूबे के लोगों की तकलीफों की जगह रफाल, ‘राजपरिवार’ और ‘गरीब चाय वाला’ हावी दिखा. साथ ही, ‘हमने ये किया दूसरी सरकारों ने क्या किया’ और ‘हमारी सरकार बनेगी तो ये करेंगे, वो करेंगे’ का शोर भी खूब गूंजा. भाजपा के स्टार प्रचारक ने कांग्रेस को नक्सलियों का हितैषी कहा तो राहुल गांधी ने मोदी सरकार को 15-20 कारोबारियों का प्रधानमंत्री बताया. इन सबके बीच जनता अपने मुद्दे तलाशती रही.

छत्तीसगढ़ का चुनावी अभियान इस मायने में अलग है कि यहां न तो कांग्रेस अध्यक्ष मंदिर-मंदिर फिरते नजर आए और न ही भाजपा ने ‘हिंदुत्व राग’ का ‘सा’ भी अलापा. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जरूर इसे छेड़ने की कोशिश की थी. लेकिन, उनके अलाप का स्वर मतदाताओं के सिर चढ़ता हुआ नहीं दिखा. ‘छत्तीसगढ़ में हिंदू-मुसलमान का टकराव नहीं होता है. सभी लोग यहां आपस में मिलकर रहते हैं’ रायपुर में 40 साल के ऑटोरिक्शा चालक करीमुद्दीन कहते हैं, ‘राम मंदिर निर्माण यहां के लोगों के लिए कोई मुद्दा नहीं है.’ फिर वे केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों की वजह से हो रही परेशानी की बात खुद शुरू करते हैं, ‘बताइए नोटबंदी से किसको क्या हासिल हुआ. सारा पैसा तो वापस आ गया न! लेकिन, आम आदमी को अपनी दिहाड़ी मारकर अपने पैसे के लिए लाइन में खड़ा होना पड़ा.’ हमारे यह कहने पर कि नोटबंदी हुए तो दो साल हो गए हैं, करीमुद्दीन की बात को रेस्टोरेंट चलाने वाले अब्दुल अलीम आगे बढ़ाते हैं, ‘नोटबंदी के बाद बिजनेस आधा हो गया है. लोग गैर-जरूरी चीजों पर खर्च करने से बच रहे है. इस साल जैसा धनतेरस कभी नहीं देखा था. दुकानदारों का आधा धंधा भी नही हुआ.’

वहीं, जीएसटी को लेकर कारोबारियों की मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिलती है. जांजगीर के एक कारोबारी सुरेंद्र देवांगन का कहना था कि जीएसटी के लिए सरकार ने जिस तरह का प्रोसेस बनाया है, उससे व्यापारियों के मुसीबत खड़ी हो रही है. दूसरी ओर, रायपुर में एक सोने के व्यापारी दिलीप कहते हैं कि ‘सारी प्रक्रिया ऑनलाइन होने की वजह से काम करना आसान हो गया है. साथ ही, कर चोरी रुक गई है.’ हालांकि वे यह भी कहते हैं कि इसकी वजह से सरकारी मशीनरी में भ्रष्टाचार बढ़ गया है. छोटे-छोटे कामों के लिए बिना पैसा दिए काम नहीं होता है.

भाटापारा विधानसभा क्षेत्र के राजेश किसान परिवार से आते हैं और एक निजी अस्पताल में डाटा एंट्री ऑपरेटर का काम करते हैं. ‘अब जिसके पास स्मार्ट कार्ड (हेल्थ) है, उसे अगर अंबुलेंस लेना है तो स्मार्ट कार्ड के जरिए 1000 खर्च करने पर 100 से 200 देना पड़ता है’ इसके आगे राजेश सरकारी मंडी के बारे में भी बताते हैं, ‘सरकारी मंडी में धान बेचने के लिए चाय-नाश्ते के लिए पैसा चुकाना होता है. जितना अधिक धान होता है, उतनी ही अधिक ‘नाश्ते’ की कीमत होती है.’

राजेश के साथ जब हम बात कर ही रहे होते हैं तभी रायपुर-बिलासपुर हाईवे की धूल सरकार के विकास का दावा धुंधला करती हुई दिखती है. मुख्यमंत्री रमन सिंह दावा करते हैं कि जब उन्होंने राज्य की कमान संभाली थी तो नक्सल प्रभावित इलाकों में राजमार्ग भी कच्ची सड़क हुआ करते थे. उनका दावा है कि उनके आने के बाद से राज्य में सड़कों का काफी विकास हुआ है. लेकिन, हमें जमीनी हालात कुछ और ही दिखते हैं. सूबे की राजधानी को न्यायधानी यानी जबलपुर (हाई कोर्ट होने की वजह से) से जोड़ने वाले हाईवे को भी अभी पूरा होने में कम से कम डेढ़-दो साल का वक्त लगने की संभावना है. किसी भी अर्थव्यवस्था में सड़कों को उसकी धमनियां मानी जाती है.

छत्तीसगढ़ की धमनियां कैसी हैं, इस बारे में रायगढ़ के रवीन्द्र यादव बताते हैं, ‘छत्तीसगढ़ की किसी भी सड़क पर यात्रा कीजिए, आपके शरीर का सारा पुर्जा हिल जाएगा. रायगढ़ से अंबिकापुर तक गए थे. 210-220 किमी है. लेकिन पूरे नौ घंटे लग गए.’ बिलासपुर में सवारी गाड़ी चलाने वाले ब्रजेश उपाध्याय छत्तीसगढ़ की सड़कों की हालत कुछ इस तरह बताते हैं, ‘छह महीने में छह बार टायर चेंज करना पड़ता है.’

छत्तीसगढ़ के लोग केवल न केवल खराब सड़कों और नोटबंदी-जीएसटी की बात करते हैं, वे गैस की कीमत बढ़ने की वजह से भी परेशान है. बिलासपुर की 35 वर्षीय जानकी खांडेकर बताती हैं, ‘कुछ पैसे लेकर सरकार ने गैस कनेक्शन तो दे दिया लेकिन अब हजार रुपये देकर सिलिंडर कहां से भरवाएं. ऊपर से खाने-पीने की हर चीज महंगी हो गई है.’

रायपुर स्थित एक शराब की दुकान पर दोपहर ग्राहकों की कतार
रायपुर स्थित एक शराब की दुकान पर दोपहर ग्राहकों की कतार

छत्तीसगढ़ की महिलाओं की मुसीबत केवल गैस सिलिंडर की कीमत बढ़ना ही नहीं है बल्कि, पुरुषों में शराब की लत भी है. बीते कुछ वर्षों के दौरान वे शराब की दुकानें बंद करवाने के लिए सड़क पर भी उतरती रही हैं. इसके चलते बीते साल मुख्यमंत्री रमन सिंह ने शराबबंदी का वादा भी किया था. लेकिन, इस साल उन्होंने शराब की बिक्री से होने वाली कमाई का लक्ष्य 3200 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 3700 करोड़ रुपये कर दिया. करीब 65 साल के दिखने वाले ऑटोरिक्शा चालक रहमान खान कहते हैं, ‘शराब धीरे-धीरे छत्तीसगढ़ को खोखला कर दिया है.’ इसके बाद वे रायपुर में सड़क के बीचों-बीच बन रहे स्काईवॉक की ओर इशारा कर तंज भरे शब्दों में कहते हैं, ‘उसे देख रहे हैं, बताइए कौन चढ़ेगा उस पर. शराबी लोग ही तो चलेंगे उस पर. उन्हीं के लिए बनाया जा रहा है.’ भाजपा सरकार रायपुर में सड़क पर पैदल चलने वालों के लिए स्काईवॉक बना रही है. लेकिन, यहां के कई लोगों का मानना है कि यह केवल पैसे की बर्बादी है.

रायपुर शहर में सड़क के डिवाइडर के ऊपर निर्माणाधीन स्काईवॉक
रायपुर शहर में सड़क के डिवाइडर के ऊपर निर्माणाधीन स्काईवॉक

लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालने वाले इन सब मुद्दों के साथ बेरोजगारी भी सूबे में एक बड़ा मुद्दा है. एक प्राइवेट फर्म में काम करने वाले आशीष शर्मा का कहना है, ‘यहां के युवाओं को सरकारी नौकरी हासिल करने के काफी कम मौके हैं. जो कुछ मौके हैं, वे भी संविदा (ठेके) पर हैं. युवाओं के लिए प्राइवेट क्षेत्र में अधिक मौके हैं. लेकिन, वहां भी कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है. कई प्राइवेट कंपनियों में अधिकतर लोग दूसरे राज्यों के होते हैं.

बिलासपुर के पुराने बस स्टैंड के पास सुबह सात बजे ऑटो रिक्शाओं की कतार
बिलासपुर के पुराने बस स्टैंड के पास सुबह सात बजे ऑटो रिक्शाओं की कतार

बिलासपुर में रहने वाले शंकल लाल बताते हैं कि छत्तीसगढ़ की बेरोजगारी का आलम यहां की सड़कों पर ऑटोरिक्शाओं की संख्या को देखकर भी जाना जा सकता है. वे कहते हैं, ‘पढ़े-लिखे युवाओ को भी जब नौकरी नही मिलती है तो उन्हें ऑटोरिक्शा चलाने के लिए मजबूर होना पड़ता हैं.’ उनकी बातों को वहीं के रहने वाले ब्रजेश उपाध्याय आगे बढ़ाते हैं, ‘यहां से कामगारों को कम मजदूरी पर दूसरे राज्यों में ले जाया जाता है. इससे उनके बच्चों की पढ़ाई पर भी बुरा असर पड़ता है.’