भारत में बाल दिवस देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन यानी 14 नवंबर को मनाया जाता है लेकिन, दुनिया यह दिवस आज मनाती है. यानी 20 नवंबर को विश्वभर में अंतरराष्ट्रीय बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है. इसकी शुरुआत संयुक्त राष्ट्र ने 1954 में की थी. अंतरराष्ट्रीय बाल दिवस बच्चों से जुड़े मुद्दों के प्रति जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए मनाया जाता है.

20 नवंबर का बाल दिवस के रूप में महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि आज ही के दिन 1959 में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा (जनरल असेंबली) ने बाल अधिकारों की घोषणा की थी. वयस्कों से अलग बच्चों के अधिकारों को बाल अधिकार कहा जाता है. बाल अधिकारों को चार अलग-अलग भांगों में बांटा गया है - जीवन जीने का अधिकार, संरक्षण का अधिकार, सहभागिता का अधिकार और विकास का अधिकार. जवाहर लाल नेहरू का मानना था कि बच्चे किसी भी देश के विकास की नींव होते हैं. यानी अगर हमें अपना भविष्य संवारना है तो बच्चों को तंदुरुस्त और साक्षर बनाना होगा. तो क्या भारत अपने भविष्य को तंदुरुस्त बनाए हुए है? आइए कुछ आंकड़ों के आधार पर भारत में बच्चों की स्थिति पर एक नजर डालते हैं

नीती आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध डेटा बताता है कि भारत में शिशु मृत्यु दर प्रति हजार पर 34 के करीब है. जबकि पांच साल से कम उम्र के बच्चों में यह आंकड़ा देखा देखा जाए तो यह प्रति हजार पर 39 है. इनमें से अधिकांश बच्चों की जान डायरिया और न्यूमोनिया जैसी बीमारियों के चलते होती है. 2016 में केवल डायरिया और न्यूमोनिया से करीब तीन लाख बच्चों की मौत हो गई थी. ये वे बीमारियां हैं जिनका इलाज आराम से हो सकता है.

भारत में हर साल अकेले कुपोषण से ही 10 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत हो जाती है . बिहार, मेघालय और मध्य प्रदेश उन भारतीय राज्यों में शुमार हैं जहां हर 10 में चार बच्चे कुपोषित हैं. देश में छह साल तक के 2.3 करोड़ बच्चे कुपोषण और कम वजन के शिकार हैं.

इसके अलावा शिक्षा की बात करें तो लगभग 10 करोड़ बच्चों को स्कूल नसीब नहीं है. डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फार एजुकेशन (डाइस) की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि हर सौ में महज 32 बच्चे ही स्कूली शिक्षा पूरी कर पा रहे हैं. इनमें करीब एक करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो घर की खराब हालत के चलते पढ़ाई के साथ काम करने को भी मजबूर हैं. विश्व बैंक की मानव विकास रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 10 से 14 करोड़ के बीच बाल मजदूर हैं. बाल अधिकारों के हनन के सर्वाधिक मामले भी भारत में ही होते हैं. इसके साथ ही स्कूली बच्चों में आत्महत्या की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है. एकल परिवारों में बच्चे साइबर बुलिंग का भी शिकार हो रहे हैं.

कुल मिलाकर ये आंकड़े तो यही बताते हैं कि हमें अपने भविष्य को सुधारने के लिए अभी काफी काम करने की जरूरत है.