लेखक : करण अंशुमन, पुनीत कृष्णा, विनीत कृष्णा

कलाकार : पंकज त्रिपाठी, अली फजल, विक्रांत मैसी, दिव्येंदु शर्मा, रसिका दुग्गल, श्रिया पिलगांवकर, श्वेता त्रिपाठी, शीबा चड्ढा, हर्षिता गौर, कुलभूषण खरबंदा

रेटिंग : 3.5/ 5

(समीक्षा में कुछ छोटे-बड़े स्पॉइलर मौजूद हैं, अपनी समझ से आगे बढ़ें और पढ़ें)

तुलनाएं करके चीजों को तुरंत खारिज करना इंटरनेट के (सिने) प्रेमियों का नया शगल हो चला है. बिला शक, अनुराग कश्यप के सिनेमा से बेइंतिहा मोहब्बत करने वालों की ही उपज है ‘मिर्जापुर’. पुरानी बॉलीवुड फिल्मों का प्रभाव, उनका रेफरेंस, ‘गेम ऑफ थ्रोन्स’ (जीओटी) के एक खास एपीसोड से खासा प्रभावित होने वाला एक लंबा घटनाक्रम, जीओटी की ही तरह अंधाधुन हिंसा को हथियार बनाना, टेरंटिनो के अति हिंसक सिनेमा से लेकर ‘स्कारफेस’ (1983) जैसी प्रसिद्ध गैंगस्टर फिल्मों की इसे देखते हुए याद आना और अंतत: कश्यप की मकबूल फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ जैसे अंदाज की कहानी कहना. ‘मिर्जापुर’ बिना शक पूर्णता मौलिक वेब-सीरीज नहीं है. ‘सेक्रेड गेम्स’ के स्तर की तो बिलकुल भी नहीं.

लेकिन यह भी सच है कि उसे ऐसा होने का गुमान भी नहीं है. उसे पता है कि वो कहां से आ रही है, उसकी प्रेरणाएं क्या हैं, किस ढांचे में रहकर उसे पटकथा में फेरबदल करके खुद को नयापन देना है, और समान परिवेश में समान आबोहवा में बोया हुआ होने के बावजूद किस तरह अलग फूल बनकर खिलना है. इसलिए अगर गुलाब-गुलाब के बीच फर्क करना आपको आता है, तो ‘मिर्जापुर’ को ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ वगैरह की सस्ती नकल कहने की गलती आप नहीं करेंगे.

तुलनाओं को तौलने से पहले यह भी तो देखिए कि खुद ‘मिर्जापुर’ कैसे ऊपर वर्णित फिल्म व वेबसीरीज को अपना सलाम ठोंक रही है. एमेजॉन प्राइम की नौ एपीसोड की इस पेशकश में एक जगह खिलंदड़ नायिका स्वीटी (श्रिया पिलगांवकर) शरमा रहे नायक गुड्डू (अली फजल) से सीन खत्म होते-होते कहती है कि ‘छूना नहीं हमको, बिना परमिशन’. जाहिर तौर पर यह ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के ‘परमिशन’ वाले मशहूर संवाद को निर्देशकों की आदरांजलि है.

वहीं एक एक्शन सीक्वेंस में एक आदमी दूसरे गैंग के आदमी को जान से मारने के लिए बंद छतरी उसके सीने के आरपार निकालता है और फिर उस छतरी को खोल देता है! इस क्रिया पर आप चहक सकते हैं क्योंकि ये सीधे-सीधे ‘सेक्रेड गेम्स’ के बंटी महाशय द्वारा कहे ‘...छतरी खोल दुंगा’ नामक मशहूर संवाद को भेजा गया सलाम मालूम होता है! स्टैनगन लेकर शूटआउट करने वाले सीन अल पचीनो की ‘स्कारफेस’ को ट्रिब्यूट हैं तो अस्सी के दशक वाले बॉलीवुड के कई सिनेमाई रेफरेंस मौजूद हैं और कहानी कहने की स्टाइल – जैसे बीस साल पहले, मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हूं - कई दफा उसी वक्त के बॉलीवुड को ट्रिब्यूट है.

यह टेरंटिनो स्टाइल की ‘सिनेमा से सीखकर सिनेमा बनाने’ वाली फिल्ममेकिंग है. इसमें अपने पसंद के सिनेमा को ट्रिब्यूट दिया जाता है, दर्शकों के खोजने वास्ते पॉप-कल्चर रेफरेंस ईस्टर एग की तरह प्लेस किए जाते हैं, और इरेवरेंट होना – यानी कि बेअदब - खास तरह की खासियत माना जाता है. साथ ही यथार्थ भी, फिक्शन के अंदर आसानी से फंक्शन कर सके, उतना ही उपयोग किया जाता है.

बेअदबी के प्रति इस आग्रह की वजह से ‘मिर्जापुर’ की लिखाई में खासा निखार आया है. बॉलीवुड के पुराने फार्मूलों से बंधा एक चिर-परिचित क्राइम-ड्रामा होने के बावजूद ‘मिर्जापुर’ नाम की इस वेबसीरीज में जिस तरह के सीन करण अंशुमन, पुनीत कृष्णा और विनीत कृष्णा ने लिखे हैं, जिस तरह के मारक और मनोरंजक संवाद रचे हैं, जिस तरह ब्लैक ह्यूमर का प्रयोग सतत किया है, वो इस वेबसीरीज की ‘देखी हुई’ फील को कभी इसका नकारात्मक पहलू नहीं बनने देता. मजबूत लिखाई, दिलचस्प किरदार और बेहतरीन अभिनय मिलकर ‘मिर्जापुर’ को पुरजोर बिंज-वर्थी बनाते हैं (हाय हाय ये अंग्रेजी!).

मुलाहिजा फरमाइए, दृश्यों की लिखाई के निरालेपन पर. ‘हासिल’ (2003) से हासिल एक सीन में एक छात्र नेता उनकी मुखालफत करने वाले एक प्रतिद्वंदी को कक्षा में घुसकर मारता है और लहूलुहान कर देता है. सीन तकरीबन खत्म होने को ही होता है कि आगे ब्लैकबोर्ड के पास आराम से घटना को नजरअंदाज करते हुए बैठे मास्टर जी पिटते लड़के की हालत देखते हुए कहते हैं, ‘अब खन्ना की दोनों एफडी टूट जाएंगी!’ एक सामान्य से सीन में एक गैंगस्टर दो नए-नवेले लड़कों को अपने गैंग में शामिल करता है और यह सीन भी तकरीबन खत्म होने को है कि मौत के मुंह से अभी-अभी बचकर निकला एक लड़का डॉन से कहता है कि वो साइकिल चलाते-चलाते दुखी हो चुका है, अगर एक ‘लूना’ मिल जाती तो मजा आ जाता. ऐसे ही ढेर दृश्य ‘मिर्जापुर’ में मौजूद हैं – जिनका ज्यादा जिक्र स्पॉइलर हो जाएगा – जो कि अभूतपूर्व रूप से दृश्य-संरचनाओं में ब्लैक ह्यूमर की गुंजाइश ढूंढ़ लेते हैं और उसका बेहद सुघड़ उपयोग करते हैं.

गैंगस्टर फिल्मों के जॉनर में इतना कुछ पहले से एक्सप्लोर हो चुका है कि ‘गॉडफादर’, ‘गैंग्स ऑफ न्यूयॉर्क’, ‘स्कारफेस’ जैसी फिल्मों के विषयों पर दोबारा लौटने पर फिल्मकारों के पास चतुर लिखाई और दिलचस्प किरदार ही खुद को अलग दिखाने का एकमात्र रास्ता होते हैं. हमारी खुशकिस्मती से ‘मिर्जापुर’ में दिलचस्प किरदारों की जैसे बाढ़-सी आती है! ज्यादा दिलचस्प है कि ऐसे ढेर किरदार होने के बावजूद भसड़ नहीं मचती और ऑर्गेनिक अंदाज में कई सब-प्लॉट्स के उलझे सिरे धीरे-धीरे सीधे किए जाते हैं. आखिर तक.

अब इन अनोखे किरदारों पर भी मुलाहिजा फरमाइए. एक नौजवान गैंगस्टर है जो अति की हिंसा में शामिल रहता है लेकिन महादेवी वर्मा के लेखन का मुरीद है. उनकी कविता का पाठ करने से लेकर उनके संस्मरणों के संग्रह ‘पंथ के साथी’ जैसी किताब दिन भर वायलेंस और गैरकानूनी कामों में उलझे रहने के बाद घर आकर पढ़ता है. एक है जो पहलवानी का इतना शौकीन है कि तनावग्रस्त स्थिति में भी थाली भर उबले अंडों की दरख्वास्त करता है और आरती में जब पीतल की छोटी घंटी बजाता है तब उसे भी हाथ में पकड़े डम्बल की तरह ऊपर-नीचे करते हुए बजाता है.

एक शादीशुदा महिला है जो बाद में चलकर अपने अजीजों द्वारा हिंसा का रास्ता अपना लेने का समर्थन करती है और उसके बीज बहुत पहले ही सीरीज एक सीन में बो देती है. इस सीन में उसका ईमानदार पति आत्मविश्वास से कहता है कि क्राइम से लड़ने के लिए उसके पास कानून के अलावा लाइसेंसी रिवाल्वर भी है, और ऐसा सुनते ही पत्नी तपाक से जवाब देती है कि ‘गन का गाना तो गाओ मत, दो साल भागे हो तब जाकर मिला है लाइसेंस, जबकि शहर में डेढ़ हजार में तुरंत कट्टा मिल जाता है’. अपराध, कानून से हमेशा दो-तीन कदम आगे चलता है और जिंदगी में तेज चलने की चाहत रखने वालों को अक्सर ऐसे ही लुभाता है.

फिर एक यारों का यार है, जो कट्टों के व्यापारी का सबसे करीबी होने के बावजूद उस्तरे से प्यार करता है और जब उस्तरे के प्यार में प्रेम-कविता के दर्जे के संवाद बोलता है तो आप सिहर उठते हैं. कट्टों से भरी पड़ी इस वेबसीरीज का सबसे हिंसक दृश्य भी उसका उस्तरा लिए है और यह सीन हिंसा के मनोविज्ञान की काफी दिलचस्प व्याख्या करता है.

‘मिर्जापुर’ को चलताऊ पल्प फिक्शन या सिनेमाई लुगदी साहित्य कहकर खारिज करने वाले इसकी एक खूबी शायद नजरअंदाज कर गए होंगे. कि ये अपराध की दुनिया में घुसे नए किरदारों के बहाने हिंसा के मनोविज्ञान को समझने-समझाने की काबिले-तारीफ कोशिश भी करती है. एनाटॉमी ऑफ वाइलेंस को विजुअल्स के माध्यम से परदे पर रचना आसान नहीं होता क्योंकि उसके लिए किरदारों की साइकी में घुसना पड़ता है जो कि अपने आप में एक थकाऊ फिल्ममेकिंग की प्रक्रिया है. लेकिन ‘मिर्जापुर’ अपने दो नायकों के बहाने – गुड्डू पंडित व बबलू पंडित – अपराध की दुनिया से उनके लगाव को बेहतरीन अंदाज में सिलसिलेवार दिखाती है. और हिंसा के प्रति उनकी शुरुआती झिझक से लेकर बाद में चलकर उससे उनके प्रेम-आलिंगन को दिखाते वक्त बेहद शानदार अंदाज में हिंसा के समाज-शास्त्र की चीर-फाड़ करती है.

दोनों नायकों का परिवार, उनकी प्रेमिकाएं जिन मुख्तलिफ तरीकों से उनकी इस हिंसा के प्रति रिएक्ट करती हैं वो भी वाइलेंस के इसी समाज-शास्त्र को समझने की कोशिश है. खासकर मां (शीबा चड्ढा, अद्भुत अभिनय करते हुए) जो कि अपने बच्चों की अपराध जगत में ‘उन्नति’ देखकर खुश है और चाहती है कि वे जाकर परचून की दुकान वाले को डरा-धमका आएं क्योंकि उसका व्यवहार उनके प्रति ठीक नहीं है. इसके बाद दुकान वाले को समझाइश देने वाले सीन में अली फजल की सनक देखकर आपके रोंगटे खड़े होते हैं और जिस एपीसोड में यह सीन आता है वो इस सीरीज का सबसे समझदार एपीसोड सिर्फ इसलिए बनता है क्योंकि हिंसा के मनोविज्ञान को पकड़ने की अलहदा कोशिश करता है.

एक दूसरे एपीसोड में इन नायकों में से एक नायक जब थियेटर में उसकी बात न मानने वाले थियेटर कर्मचारी को पीटता नहीं है (‘कोल्डड्रिंक ठंडी नहीं है’) तो उसकी अच्छे स्वभाव की प्रेमिका निराश हो जाती है और तकरीबन उकसाते हुए धीमे स्वर में कहती है कि ‘मुझे तो लगा था कि अब आप उठोगे’. ‘मिर्जापुर’ बेहद अद्भुत अंदाज में बिना किसी बौद्धिक शो-ऑफ के दिखा जाती है कि हिंसा किस तरह न सिर्फ हिंसक होते नायकों को बदलती है, बल्कि उनके आसपास के लोगों को भी अपने नशे की चपेट में ले लेती है.

इसीलिए, उन आलोचनाओं में दम नहीं लगता जो कह रही हैं कि ‘मिर्जापुर’ हिंसा के अतिरेक को सिर्फ शॉक वेल्यू और अनुराग कश्यप जैसा सिनेमा रचने के लिए उपयोग करती है.

अली फजल ज्यादातर अर्बन किरदारों को करने के लिए जाने जाते हैं और अब तक लगता रहा था कि सीमित रेंज के अभिनेता हैं. लेकिन ‘मिर्जापुर’ का गुड्डू पंडित उनके अब तक के करियर का सर्वश्रेष्ठ अभिनय है और जिस तरह उन्होंने एक ‘देसी मोटीबुद्धि’ किरदार के मानस को आत्मसात किया है वो कई सारे ‘मा’ वाला कमाल अभिनय है. हिंसक दृश्यों में थोड़ा-सा कूबड़ निकाल कर जिस अंदाज में वे चलते हैं वो गजब का गुरुत्वाकर्षण दृश्यों को देता है और उनका चेहरा विविध एक्सप्रेशन्स को बेहद कुशलता से प्रगट करता है. उनकी अलहदा चाल जाहिर तौर पर ‘ब्रॉनसन’, ‘वॉरियर’ और ‘पीकी ब्लाइंडर्स’ वाले टॉम हार्डी से प्रभावित है लेकिन इतना प्रभाव उधार ले लेना चलता है!

विक्रांत मैसी दुर्लभ अभिनेता हैं जिन्हें सामान्य और सहज ‘दिखकर’ भी अपने किरदारों को अथाह प्रभावशाली बनाना आता है. गुड्डू के ‘बल’ के साथ बबलू नामक उनके किरदार की ‘बुद्धि’ जय-वीरू की जोड़ी वाली सिनेमाई विशेषताएं लिए हैं और उनके अभिनय का सिग्नेचर धीर-गंभीर अंदाज इस तरह के रोल के लिए उन्हें पहली पसंद बनाता ही है जिसमें बल और बुद्धि का कॉन्ट्रास्ट दो किरदारों के माध्यम से दिखाया जाना जरूरी हो. इस सीरीज को खत्म करने के बाद आप उन्हें कई दिनों तक याद करेंगे, यह अभी से याद रख लीजिए.

अली फजल की ही तरह दिव्येंदु शर्मा (मुन्ना) भी अर्बन किरदारों के लिए ही ज्यादा मुफीद एक चेहरा हैं. इसलिए ‘मिर्जापुर’ जैसी देसी व भदेस कहानी में उन्हें बाहुबली के क्रूर-मगरूर बेटे के रोल में स्वीकार करने में शुरुआती दिक्कतें आती हैं. लेकिन ये उनकी विलक्षण प्रतिभा ही है कि ‘अगेंस्ट टाइप’ प्ले करने के बावजूद वे इतनी शिद्दत से इस किरदार को आत्मसात करते हैं कि आप उनके बनाए व्यक्तित्व पर विश्वास करने लगते हैं. उनका किरदार सनक और पागलपन की कई सीमाएं आगे के एपीसोड में तोड़ता चलता है और इन एपीसोड तक आते-आते आप उनकी शहरी युवा वाली छवि को भूल चुके होते हैं.

‘मिर्जापुर’ मर्दों द्वारा संचालित अपराध की दुनिया में महिलाओं को भी बहुत कुछ करने के मौके देती है. एक शूट-आउट दृश्य खासतौर पर सराहना बटोरेगा क्योंकि वो साड़ी और पल्लू धारी महिलाओं के सहारे खुद को संचालित करता है. रसिका दुग्गल त्रिपाठी परिवार की ‘भूखी’ बहू के रोल में बेबाक काम करती हैं और भले ही ‘सेक्रेड गेम्स’ की राजश्री देशपांडे के स्तर की हिम्मत अपने किरदार में नहीं दिखातीं लेकिन अपने पुराने सीधे-सादे किरदारों से बनी छवि (‘मंटो’, ‘पीओडब्लू : बंदी युद्ध के’) को बखूबी तोड़ती हैं. उनका ट्रैक एक अपराध-गाथा में छोटा भले लगे लेकिन इतना अहम है कि व्हीलचेयर चलाते हुए कुलभूषण खरबंदा को उसमें आना पड़ता है और हिंसक गैंगवॉर के बीच अंधेरे कमरे में गाजर का हलवा खाना पड़ता है!

‘मिर्जापुर’ में छोटे-बड़े सभी कलाकारों के उम्दा अभिनय के बीच अखंडानंद त्रिपाठी के रोल में पंकज त्रिपाठी, वो क्या कहते हैं ठेठ हिंदी में – बवाल काट देते हैं. ‘गॉडफादर’ प्रभावित एक प्रौढ़ डॉन की भूमिका में अब तक की उनकी विभिन्न भूमिकाओं की झलक मिलती है. यह कहना भी दुरुस्त होगा कि वे अब तक की अपनी मशहूर गंभीर भूमिकाओं का कोलाज ‘मिर्जापुर’ में बनाते हैं. ‘पाउडर’ के नावेद अंसारी के दर्जे का यह दुर्लभ काम तो नहीं है, लेकिन एक विशेषता है जो उनके इस बॉलीवुड फार्मूलों से बंधे किरदार को यूनीक व बेहद दर्शनीय बनाती है.

कुछ महीनों पहले एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने हमसे कहा था, ‘मैं हर किरदार के अंदर पहले ‘ह्यूमन’ खोजता हूं. उसकी ब्रूटेलिटी, उसकी कड़कनेस तो स्क्रिप्ट में लिखी मिल जाएगी, लेकिन ह्यूमेनिटी नहीं लिख पाते कई लोग.’ सही बात है! ठीक यही ‘ह्यूमेनिटी’ उन्होंने कालीन भैया के बेहद क्रूर किरदार को बख्शी है और सिर्फ इसी वजह से वन-नोट हो जाने की जोखिम रखने वाला किरदार खुल कर महीन कढ़ाई वाले खूबसूरत कालीन की तरह स्क्रीन पर बिछ जाता है!

‘मिर्जापुर’ जरूर देखिए, क्योंकि भले ही ये हिंदी की गालियों को मुंबईया अंदाज में बोलकर उन्हें अपमानित करती है, लेकिन कायदे का मनोरंजक सिनेमा रचकर दर्शकों का भरपूर सम्मान भी करती है.