आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू बेहद व्यस्त दिख रहे हैं. कुछ साल पहले तक हैदराबाद से कभी-कभार ही दिल्ली आने वाले नायडू ने ‘दिल्ली दूर नहीं’ का रोडमैप बनाया है. अगर नरेंद्र मोदी या राहुल गांधी नहीं तो तीसरा कौन, इस सवाल का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है. लेकिन लगता है कि नायडू ने तीसरा विकल्प बनने की कोशिश खुद शुरू कर दी है. टीडीपी के एक नेता ने हैदराबाद में कुछ पत्रकारों को बताया कि चंद्रबाबू नायडू के बदले तेवर और लगातार दूसरी पार्टी के नेताओं से मिलने के पीछे एक सॉलिड वजह है. 2019 में नायडू आंध्र प्रदेश की जिम्मेदारी अपने बेटे नारा लोकेश को सौंपना चाहते हैं और खुद दिल्ली की सियासत करने में दिलचस्पी रखते हैं.

1996 जैसा प्रयोग 2019 में?

1996 के आम चुनाव के बाद अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा को सबसे ज्यादा 161 सीटें मिली थी. शिवसेना, उस वक्त की समता पार्टी और बंसीलाल की हरियाणा विकास पार्टी तब भाजपा के साथ थीं. लेकिन इन्हें कुल मिलाकर 26 सीटें ही नसीब हुई थीं. इस तरह भाजपा गठबंधन के पास सिर्फ 187 लोकसभा सांसद ही थे और पहली अटल सरकार 13 दिनों में गिर गई.

कांग्रेस को उस समय केवल 140 सीटें ही मिली थी, इसलिए एचडी देवगौड़ा की किस्मत खुल गई और कर्नाटक से सिर्फ 16 सीटें जीतकर आए देवगौड़ा देश के ग्यारहवें प्रधानमंत्री बन गए. चंद्रबाबू नायडू के दावे को कमजोर न मानने वालों का मानना है कि 1996 में वे संयुक्त मोर्चा सरकार के संयोजक बने थे, इस बार चेहरा बन सकते हैं.

1996 में देवगौड़ा का प्रधानमंत्री बन जाना किसी भी चुनावी पंडित की भविष्यवाणी नहीं थी. उत्तर भारत के नेताओं का आपस में लड़ना और लेफ्ट पार्टी का ज्योति बसु को प्रधानमंत्री न बनने देना इसकी मुख्य वजह बनी. भाजपा की 161 सीटें और कांग्रेस की 140 सीटों के बाद जनता दल की सबसे ज्यादा 46 सीटें थीं. उस वक्त जनता दल के सबसे बड़े नेता माने जाते थे बिहार के मुख्यमंत्री लालू यादव. लेकिन उनका विरोध उत्तर प्रदेश के मुलायम सिंह यादव ने कर दिया. इसके बाद वाम मोर्चा की 52 सीटें थीं जिसमें से खुद सीपीएम की 32 सीटें थीं, ज्योति बसु प्रधानमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन उनकी पार्टी के पोलित ब्यूरो ने इसकी इजाजत नहीं दी. इसके बाद उत्तर भारत के नेताओं ने ही दक्षिण का एक ऐसा चेहरा चुना जिससे जातीय आधार पर उभरे इन नेताओं को कोई खतरा ना महसूस हो. लालू यादव से लेकर शरद यादव और मुलायम सिंह यादव तीनों देवगौड़ा के नाम पर तैयार हो गए.

2019 में चंद्रबाबू नायडू के करीबी भी कुछ ऐसे ही नतीजे की भविष्यवाणी कर रहे हैं, इसलिए उन्होंने अभी से ममता बनर्जी से लेकर अरविंद केजरीवाल तक से मिलना-जुलना शुरू कर दिया है. नायडू को अगर दिल्ली में प्रधानमंत्री बनने का सपना देखना है तो उन्हें देवगौड़ा की तरह कांग्रेस के समर्थन की भी जरूरत होगी. इसलिए चंद्रबाबू नायडू ने नरेंद्र मोदी से गठबंधन तोड़ा और सीधे दिल्ली आकर राहुल गांधी से मिले. राहुल के साथ खड़े होकर उन्होंने बकायदा प्रेस कॉन्फ्ररेंस की और आगे भी साथ रहने का ऐलान कर दिया. बैंगलुरू में वे देवगौड़ा के बेटे और कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी से मिले और एचडी देवगौड़ा का आशीर्वाद भी लिया. इस बातचीत के दौरान मौजूद रहने वाले एक सूत्र की मानें तो चंद्रबाबू नायडू कुछ वैसी ही सरकार दिल्ली में चलाना चाहते हैं जैसी इस वक्त कर्नाटक में चल रही है. छोटी पार्टी का मुखिया प्रधानमंत्री बने और बड़ी पार्टी के नेता मंत्री बनकर संतोष करें.

2019 में नायडू का चांस कितना है?

2014 में प्रधानमंत्री के एक उम्मीदवार माने जाने वाले नीतीश कुमार एनडीए में शामिल होकर अब इस रेस से बाहर हैं. 2019 के लिए ममता बनर्जी का नाम उनकी पार्टी के कुछ नेता बढ़ा रहे हैं. लेकिन वामदल उन्हें अपना नेता मानने के लिए तैयार नहीं होगा. कांग्रेस चाहती थी कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, वाम मोर्चा और कांग्रेस का एक महागठबंधन बने. लेकिन इस प्रस्ताव को वाम मोर्चे के नेताओं ने कबूल नहीं किया. वे ममता बनर्जी को नेता मानकर पश्चिम बंगाल में हमेशा के लिए तीसरे नंबर की पार्टी बनने के लिए तैयार नहीं हैं.

उत्तर प्रदेश से मायावती को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने की पैरवी उनकी पार्टी के लोग कर रहे हैं. लेकिन फिलहाल उनके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है. क्योंकि न तो उनकी कांग्रेस से बन रही है और न ही अखिलेश यादव से.

दक्षिण में दो ही बड़ी पार्टी इस वक्त उभर रही है, तमिलनाडु में करुणानिधि के निधन के बाद स्टालिन डीएमके के सर्वेसर्वा हैं. लेकिन वे देश का प्रधानमंत्री नहीं तमिलनाडु का मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं. 1996 में डीएमके गठबंधन को 37 सीटें मिली थी. लेकिन जीके मूपनार और करुणानिधि ने दिल्ली की सियासत की तरफ रुख न करने का फैसला किया था. इस वजह से मूपनार की पार्टी तमिल मनीला कांग्रेस से पी चिदंबरम देश के वित्त मंत्री बने थे. कर्नाटक से एचडी कुमारस्वामी अभी मुख्यमंत्री के तौर पर पांच साल पूरा करना चाहते हैं और दिल्ली की तरफ बढ़ने की जल्दबाजी नहीं करेंगे.

चंद्रबाबू नायडू को जो जानते हैं वे कहते हैं कि जिस तरह उत्तर में राम विलास पासवान को मौसम वैज्ञानिक कहा जाता है उसी तरह दक्षिण में नायडू का दिमाग बाकी नेताओं से तेज़ चलता है. 2014 में उन्होंने अचानक नरेंद्र मोदी की भाजपा से गठबंधन कर लिया और मुख्यमंत्री बन गए. 2019 के चुनाव से पहले उन्होंने एकाएक भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया और राहुल गांधी से मिल आए. नायडू के पास अनुभव भी है और उत्तराधिकारी भी. उन्होंने पिछले कुछ बरसों में अपने बेटे को आंध्र की सरकार चलाना सिखाया है और अब वे नारा लोकेश को मुख्यमंत्री और खुद को प्रधानमंत्री बनने की जुगाड़ में जुट गए हैं.