दूसरा विश्व युद्ध अपने उफान पर था. जर्मन फ़ौजें यूरोप को रौंदे जा रही थीं. जर्मनी में हिटलर की लोकप्रियता चरम पर थी. 17 जून, 1940, को इंग्लैंड के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल से मिलने एक फ़्रांसीसी मेहमान आया. नाम था ब्रिगेडियर जनरल चार्ल्स डी गॉल. तब तक जर्मन फ़ौजों ने अपनी ब्लित्सक्रीग यानी धूम-धड़ाम युद्ध नीति से फ़्रांस के शीर्ष सैनिक नेतृत्व को चौंकाते हुए उसके एक बड़े भूभाग पर कब्ज़ा कर लिया था. इससे घबराकर वहां के नेतृत्व का एक बड़ा हिस्सा या तो देश के शेष इलाक़ों में चला गया या उसके उपनिवेश देशों में भाग गया. इंग्लैंड जाकर शरण लेने वाले सिर्फ़ चार्ल्स डी गॉल थे.

डी गॉल ने चर्चिल को प्रस्ताव दिया कि वे इंग्लैंड में रहकर मित्र देशों की सेनाओं को जर्मनी के ख़िलाफ़ सेवाएं दे सकते हैं. दोनों पहले मिल चुके थे, चर्चिल उनकी जांबाज़ी के कारनामे सुन चुके थे. पर, तब 50 साल के डी गॉल कुछ अलग ही क़िस्म के व्यक्ति थे. फ़्रांसीसी सेना में उनका बहुत ऊंचा ओहदा नहीं था और न ही वे युद्ध में कोई निर्णायक भूमिका निभा रहे थे. और, यहां तो वे स्वयं को फ़्रांस का रक्षक बनाकर पेश कर रहे थे.

चर्चिल की कूटनीति भी लाजवाब थी. उन्हें डी गॉल में एक मोहरा नज़र आया जिसे इस्तेमाल किया जा सकता था. सो, उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया. ध्यान रहे, डी गॉल एक मामूली अफ़सर थे पर ख़ुद को अहमियत देते थे. वे अपने आप को हमेशा एक अहम किरदार मानकर जंग या राजनीतिक झंझावातों के बीच रहना पसंद करते थे.

डी गॉल के इंग्लैंड पहुंचने के कुछ ही घंटों के बाद पिटी हुई फ़्रांसीसी सेना ने जर्मनी से रहम की गुहार लगाई. दोनों देशों के बीच समझौता हुआ कि जर्मनी द्वारा जीते के हिस्से के अलावा बचे हुए भाग पर फ़्रांस की कठपुतली सरकार बनेगी. चूंकि यह फ़्रांस के विशी इलाक़े में स्थापित हुई तो इसे विशी सरकार कहा गया. इसकी डोरी हिटलर के हाथों में थी. उसी दिन शाम को डी गॉल ने चर्चिल से बीबीसी रेडियो पर भाषण के ज़रिये फ़्रांसीसी लोगों को हिम्मत न हारने की अपील करने की इजाज़त मांगी. चर्चिल की इच्छा नहीं थी कि फ़्रांस में हाल ही में बनी हुई सरकार के ख़िलाफ़ उसकी ज़मीन से कोई ऐसी कार्यवाही की जाए जो हिटलर को नाराज़ करे. पर डी गॉल ने यकीन दिलाया कि यह राजनैतिक भाषण नहीं होगा. चर्चिल ने बात मान ली. ध्यान रहे, डी गॉल एक मामूली अफ़सर थे पर ख़ुद को अहमियत देते थे.

डी गॉल ने वादे को निभाते हुए भाषण दिया. बस अंत में इतना कह दिया कि वे अगले दिन फिर फ़्रांसीसियों से बीबीसी रेडियो पर ‘मन की बात’ करेंगे. चर्चिल के लिए यह उद्घोषणा ख़बर थी. पर क्या किया जा सकता था? हारे हुए लोगों के मनोबल को उठाने से डी गॉल को कैसे मना किया जा सकता था? ध्यान रहे, डी गॉल एक मामूली अफ़सर थे पर...

अगले भाषण में डी गॉल और उत्साही हो गए. उन्होंने ऐलान किया जिस किसी भी फ़्रांसीसी के पास हथियार हैं वह जर्मन सेना के ख़िलाफ़ खड़ा हो जाये. यही आह्वान उन्होंने फ़्रांस के सैनिक अफ़सरों से भी किया. साथ ही उन्होंने कहा कि वे इंग्लैंड में ‘फाइटिंग फ़्रांस’ नाम की सेना का गठन कर रहे हैं जो फ़्रांस की ज़मीन से जर्मनों को निकाल बाहर करेगी. इसके लिए, उन्होंने अपने वतन के लोगों से इंग्लैंड आकर उनका साथ देने की अपील की. चर्चिल ने, इस दौरान ख़ुद को युद्ध में खपा रखा था. उन्हें डी गॉल की अहमियत एक बाग़ी सैनिक अफ़सर से ज़्यादा नहीं लगी. रेडियो पर उनके ब्रॉडकास्ट जारी रहे और हर प्रोग्राम के बाद फ़्रांस में उनके समर्थक बढ़ते रहे. वे धीरे-धीरे मशहूर हो रहे थे. जर्मन पैरों द्वारा कुचली गयी फ़्रांसीसी अस्मिता पर मरहम लगा रहे थे. उनकी आवाज़ में ग़ज़ब का आत्मविश्वास था, साढ़े छ फ़ुट के डी गॉल अखबारों की तस्वीरों में अलग ही नज़र आते. उनकी अपील में असर था. एक महीने में ही फाइटिंग फ़्रांस के सैनिकों की संख्या कई हज़ार हो गयी. ध्यान रहे, डी गॉल एक मामूली अफ़सर थे पर...

बीबीसी रेडियो पर बोलते हुए

जल्द ही डी गॉल ने फ़्रांस की कठपुतली सरकार से मध्य अफ्रीका में उसकी उपनिवेश कॉलोनियों को आज़ाद कराने का बीड़ा उठा लिया. दुसरे विश्वयुद्ध के लिहाज़ से इन इलाक़ों की ज़्यादा अहमियत नहीं थी. पर हां, इनमें से कुछ तटीय देश थे जो इंग्लैंड की नौसेना के काम आ सकते थे. चर्चिल ने उन्हें समर्थन दे दिया. फाइटिंग फ़्रांस ने चाड, कैमरून, फ्रेंच कांगो (अब कांगो गणराज्य) और गेबन जैसे देश आसानी से विशी सरकार से छीन लिए. 1940 के अंत तक डी गॉल के पास कई हज़ार वर्ग मील इलाक़ा और लगभग 20,000 सैनिक हो गए थे. इससे, इंग्लैंड में उनका कद बढ़ गया. वे अब प्रभुत्व वाले सैनिक अफ़सर और राजनेता माने जाने लागे. हालात बदल रहे थे, उन्होंने भी तौर तरीक़े बदल लिए. वे अब चर्चिल से फ़्रांस के लिए सौदेबाज़ी करने लगे! चर्चिल ने अपने ही घर में अपना प्रतिद्वंदी पाल लिया था. ध्यान रहे, डी गॉल एक मामूली अफ़सर थे पर...

1941 में इंग्लैंड को एक ख़ुफ़िया और अहम जानकारी मिली कि जर्मनी के ख़िलाफ़ फ़्रांस में बढ़ते हुए विरोधी आंदोलन में बड़ी भूमिका निभा रहे डी गॉल ने कई महत्वपूर्ण संपर्क स्थापित कर लिए हैं. इनमें एक नाम ख़ास था ज़्श्यों मुलां. यह शख्स इंग्लैंड आकर वहां गुप्त समाजवादी गतिविधियों में लिप्त था. डी गॉल ने चर्चिल को समझाया कि ज़्श्यों मुलां जर्मनी के ख़िलाफ़ फ़्रांस में मित्र राष्ट्रों का मोहरा बन सकता है. चर्चिल को यह बात पसंद आई, उसे फ़्रांस भेज दिया गया.

इधर, एक-दो साल बाद लगने लगा था कि जर्मनी की युद्ध में हार कुछ ही समय की बात है. इससे डी गॉल की हिम्मत इतनी बढ़ गयी थी कि वे अमेरिकी राष्ट्रपति, फ्रेंक्लिन रूज़वेल्ट सरीखे नेताओं को नज़रंदाज़ करने लगे. चर्चिल तो पहले ही उनसे खार खाए हुए बैठे थे. सो, उनका पत्ता साफ़ करने के लिए, मित्र राष्ट्रों के मुखियाओं ने फ़्रांसीसी जनरल हेनरी जिरो को उनके सामने खड़ा किया. डी गॉल ने यह चाल भांप ली और चर्चिल की हील-हुज्जत करके हेनरी से एक मुलाकात की इजाजत मांगी. 1943 में डी गॉल अल्जीरिया की राजधानी अल्जियर्स में उनसे मिले और संधि कर ली कि जब फ़्रांस जर्मनी से आज़ाद होगा तो उन्हें सेनाध्यक्ष और सह-राष्ट्रपति बनाया जाएगा और इसके एवज़ में अभी उन्हें विशी सरकार से जर्मन शुभचिंतकों को हटाने में डी गॉल की सहायता करनी होगी.

संधि से संतुष्ट हेनरी अमेरिकी दौरे पर चले गए. पीछे से डी गॉल ने विशी सरकार में अपने शुभचिंतक भर दिए. चूंकि हेनरी की मंज़ूरी थी सो किसी ने प्रतिरोध नहीं किया. अब जर्मनी के ख़िलाफ़ विद्रोह और तेज़ हो गया. जब तक अमेरिका से हेनरी वापस आए, काफ़ी देर हो चुकी थी. विशी सरकार ने डी गॉल को फ़्रांस का राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष चुन लिया. इधर, मित्र राष्ट्रों ने हिटलर को पूरी तरह से घेर लिया था, उधर डी गॉल अपना फ़र्ज़ निभा रहे थे. अब तो बस जर्मन सैनिकों के फ़्रांस से बाहर निकलने की देर थी. और यह सब तब हुआ, जब डी गॉल फ़्रांस में न होकर इंग्लैंड में थे. ध्यान रहे, डी गॉल एक मामूली अफ़सर थे पर...

रूज़वेल्ट और चर्चिल दोनों ही चाहकर भी कुछ नहीं कर पाए. डी गॉल के रेडियो ब्रॉडकास्ट लाखों फ़्रांसीसीयों द्वारा सुने गए. ज़्श्यों मुलां के साथ मिलकर उन्होंने लगभग पूरे फ़्रांस पर कब्ज़ा कर लिया था. ऐसे में उनको हटाना हिटलर के ख़िलाफ़, मित्र राष्ट्रों के अभियान में दिक्कत खड़ी कर सकता था. और फिर, दुनिया भर की सरकारों ने डी गॉल की फ़्रांस में बनने वाली सरकार को मान्यता दे दी थी.

फिर एक रोज़ हिटलर ने खुद को गोली मार ली. जर्मनी युद्ध हार गया. उसके सैनिकों ने फ़्रांस छोड़ दिया और अगस्त 1944 को जब चार्ल्स डी गॉल पेरिस की गलियों से एक विजेता की तरह गुज़रे तो लाखों लोगों ने उनका स्वागत किया. एक मामूली अफ़सर ने ख़ुद को साधारण न मानते हुए अपने देश का भाग्य बदल दिया था.

ऐसा नहीं है कि दूसरे विश्व युद्ध में सिर्फ़ चर्चिल या अमेरिकी राष्ट्रपति रूज़वेल्ट ही नायक थे. डी गॉल भी एक ऐसे ही सूरमा हुए हैं जो राख से उठकर दुनिया पर छाए और जर्मनी के हाथों फ़्रांस का तार-तार हुआ सम्मान उन्होंने फिर हासिल किया. इतिहास उन्हें नेपोलियन से भी बड़ा नायक मानता है. युद्ध के तुरंत बाद वे दो साल के लिए राष्ट्रपति बने और फिर उन्होंने राजनीति छोड़ दी. जब 1956 में जब फ़्रांस डावांडोल हुआ तो उन्हें दोबारा लाया गया. इसी दौरान फ़्रांस चौथी परमाणु शक्ति बना. डी गॉल का प्रभाव आज भी फ़्रांस पर देखा जाता है.

विंस्टन चर्चिल, चार्ल्स डी गॉल, मलेशिया के महातिर मोहम्मद और इन जैसे ही कई अन्य नायकों को जनता बार-बार अपना सरपरस्त चुनती है और ये लोग निराश नहीं करते. महात्मा गांधी जब-जब भी कांग्रेस में हाशिये पर किये जाते, जनता उन्हें राजनीति के तूफ़ान के बीच खड़ा करके करिश्मे की उम्मीद करती. आख़िर करिश्माई लोगों में वो कौन सा गुण होता है, जो उन्हें औरों से अलग बना देता है? ख़ुद को साधारण न मानना शायद एक गुण हो सकता है.