इस साल जून में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ट्वीट कर कहा था कि अब दुनिया को उत्तर कोरिया से कोई परमाणु खतरा नहीं है. डोनाल्ड ट्रंप ने यह बात उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग-उन के साथ सिंगापुर में हुई एक शिखर वार्ता के बाद कही थी. इस दौरान उन्होंने दावा किया था कि किम जोंग-उन अमेरिका से सुरक्षा की गारंटी मिलने और प्रतिबंधों में छूट दिए जाने पर अपना परमाणु कार्यक्रम छोड़ने पर राजी हुए हैं.

लेकिन, इस शिखर वार्ता को पांच महीने बीते जाने के बाद भी उत्तर कोरिया को लेकर परमाणु खतरा अभी भी जारी है. इस महीने की शुरुआत में अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने बताया कि किम जोंग-उन अपने परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने के बजाय लगातार उसका विस्तार कर रहे हैं. इसके कुछ रोज बाद बीते 16 नवंबर को उत्तर कोरिया ने दुनिया को बताया कि उसने एक ‘अत्याधुनिक सामरिक हथियार’ का परीक्षण किया है. खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट और उत्तर कोरिया के इस परीक्षण के बाद सबसे बड़ा सवाल यही पूछा जा रहा है कि आखिर उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच परमाणु वार्ता में कोई प्रगति क्यों नहीं हो पा रही है और आखिर इस बातचीत में पेंच कहां आकर फंस गया है.

अमेरिका और यूरोप के जानकार शिखर वार्ता के बाद बातचीत में कोई प्रगति न हो पाने के पीछे कई कारण बताते हैं. ये लोग कहते हैं कि दोनों देशों ने सिंगापुर शिखर वार्ता में जिन दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए थे उनमें लिखा था कि अब उत्तर कोरिया और अमेरिका शांति संबंध स्थापित करेंगे, साथ ही उत्तर कोरिया परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में काम शुरू करेगा.

अमेरिकी जानकारों के मुताबिक इसके बाद से लगातार डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन उत्तर कोरिया पर अपने वादे को पूरा करने का दबाव बनाया. अमेरिका ने उत्तर कोरिया से कहा कि वह प्रतिबंधों में तभी कोई रियायत देगा जब कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम खत्म करने की दिशा में काम शुरू करेगा. इसके अलावा अमेरिका ने उत्तर कोरिया से उसके सभी परमाणु हथियार केंद्रों की सूची मांगी. उसने उन परमाणु केंद्रों की जांच पड़ताल करने की अनुमति भी मांगी जिन्हें उसने बंद या खत्म करने का दावा किया था.

अमेरिकी मीडिया के मुताबिक अमेरिका की इन मांगों पर उत्तर कोरिया का कहना था कि पहले अमेरिका उसे प्रतिबंधों में रियायत दे, उसके बाद ही वह अपने परमाणु हथियार और मिसाइलें नष्ट करने पर काम शुरू करेगा. बताते हैं कि उत्तर कोरिया के इस रुख से नाराज होकर ही बीते अगस्त में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो को उत्तर कोरिया जाने से रोक दिया था. तब ट्रंप ने कहा भी था कि बातचीत में कोई प्रगति न होने के चलते ही उन्होंने यह निर्णय लिया है.

ट्रंप-किम बैठक के बाद से अब तक क्या प्रगति हुई?

इस घटनाक्रम के बाद अमेरिका की ओर से बने दबाव के चलते उत्तर कोरिया ने अपने कुछ और परमाणु केंद्रों को बंद करने और कुछ को नष्ट करने की बात कही. उसने कुछ विदेशी पत्रकारों के सामने अपने सोहाइ मिसाइल परीक्षण केंद्र को नष्ट भी किया. ऐसा करने के बाद उसने कहा कि अब ट्रंप प्रशासन को दरियादिली दिखाने की जरूरत है.

लेकिन, इसके बाद भी जब डोनाल्ड ट्रंप ने प्रतिबंधों में कोई रियायत नहीं दी तो उत्तर कोरिया की बौखलाहट सामने आई. बीते दो नवंबर को उसने साफ़ शब्दों में कह ही दिया, ‘हमने अमेरिका के लिए वह सब कुछ कर दिया है जो संभव हो सकता था. हमने वह भी किया जो हो पाना काफी मुश्किल था. अब अमेरिका को इसी तरह हमारे लिए कुछ करना होगा. अब जब तक अमेरिका की तरफ से कोई सहूलियत नहीं मिलती उत्तर कोरिया एक मिलीमीटर भी आगे नहीं बढ़ेगा चाहे यह फिर कितना भी महंगा क्यों न पड़े.’ बताते हैं कि इसी बौखलाहट में पहले उसने आठ नवंबर को विदेश मंत्री स्तर की वार्ता रद्द कर दी और फिर ‘अत्याधुनिक सामरिक हथियार’ का परीक्षण किया.

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो (दाएं) बीते पांच महीनों में चार बार उत्तर कोरिया की यात्रा कर चुके हैं, फिर भी दोनों देशों की बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है
अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो (दाएं) बीते पांच महीनों में चार बार उत्तर कोरिया की यात्रा कर चुके हैं, फिर भी दोनों देशों की बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है

उधर, उत्तर कोरिया के इन दावों को लेकर अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अधिकारी और जानकार कुछ और ही कहानी बताते हैं. ट्रंप प्रशासन से जुड़े कुछ सूत्र समाचार वेबसाइट सीएनएन से कहते हैं, ‘उत्तरी कोरिया का दावा है कि उसने परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में कुछ कदम उठाए हैं. लेकिन, उसके ये दावे केवल दिखावटी हैं. किम जोंग-उन ने अब तक जो फैसले लिए हैं, वे अस्थाई हैं और उन्हें कुछ समय में ही बदला जा सकता है.’

जानकारों के मुताबिक उत्तर कोरिया ने सिंगापुर वार्ता के बाद मिसाइल परीक्षण करना बंद कर दिया था. उसने सोहाइ मिसाइल परीक्षण केंद्र और पुंगेरी परमाणु परीक्षण स्थल खत्म करने की बात कही. जबकि हकीकत यह है कि सोहाइ मिसाइल परीक्षण स्थल का केवल प्रवेश द्वार ही नष्ट किया गया है. जिस पुंगेरी परमाणु परीक्षण स्थल को नष्ट करने का दावा किया गया है, उसके लिए सभी जानते हैं कि उसकी मियाद पूरी होने वाली थी. ट्रंप प्रशासन से जुड़े कुछ सूत्र कहते हैं कि उत्तर कोरिया जो दावे कर रहा है उन्हें परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में उठाया गया ठोस कदम नहीं माना जा सकता है. और यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन उसके इन दावों के बदले में प्रतिबंधों में रियायत देने को तैयार नहीं हो रहा है.

आधिकारिक सूत्र यह भी बताते हैं कि उत्तर कोरिया अमेरिका के कई बार कहने के बाद भी अपने नष्ट किए गए परीक्षण स्थलों की जांच पड़ताल करने की अनुमति नहीं दे रहा है. इससे भी उसके फैसलों पर संदेह होता है.

ट्रंप-किम वार्ता के बाद से अगर अमेरिका की ओर से हुई प्रगति की बात करें तो उसने अपना रुख नरम करते हुए अगस्त में उत्तर कोरिया की सीमा पर होने वाला एक सैन्याभ्यास रद्द कर दिया. पिछले दिनों उसने दिसंबर में दक्षिण कोरिया और अमेरिका की वायु सेनाओं का एक और सैन्याभ्यास भी रद्द करने की घोषणा की. इसके अलावा बीते हफ्ते ही उसने अगले साल होने वाले वार्षिक सैन्याभ्यास में भी बड़ी कटौती करने की घोषणा की है.

परमाणु निरस्त्रीकरण का कोई रोडमैप नहीं

उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच बातचीत में कोई प्रगति न हो पाने का एक कारण परमाणु निरस्त्रीकरण को लेकर कोई रोडमैप न होना भी है. सीआईए में उत्तर कोरिया मामले के डिप्टी डिवीजन चीफ रह चुके ब्रूस क्लिंगन सीएनएन से कहते हैं, ‘दोनों देश पिछले पांच महीनों से केवल इसी लाइन पर अटके हुए हैं कि पहले सामने वाला कदम उठाए. यह दिक्कत इसलिए भी है क्योंकि सिंगापुर शिखर वार्ता में ट्रंप प्रशासन ने इस बात को लेकर कोई दस्तावेज तैयार नहीं करवाए कि उत्तर कोरिया किस तरह से अपने परमाणु हथियार और उनके केंद्रों को खत्म करेगा. परमाणु निरस्त्रीकरण लिए रोडमैप क्या होगा.’

ब्रूस क्लिंगन सहित कई जानकार मानते हैं कि उत्तर कोरिया मामले पर ट्रंप प्रशासन को सबसे पहले इसी पर काम करना चाहिए था क्योंकि यह सबसे अहम था. इन लोगों के मुताबिक अगर परमाणु निरस्त्रीकरण से जुड़े सटीक दस्तावेज तैयार करवाए गए होते तो आज उत्तर कोरिया इस मसले पर टालमटोल करने की स्थिति में नहीं होता.

आखिर क्यों दोनों पहले कदम नहीं उठाना चाहते?

अमेरिकी जानकारों की मानें तो किम जोंग-उन बिना बड़ी गारंटी के परमाणु हथियारों को खत्म करने की दिशा में कोई भी काम नहीं करना चाहते. उनका मानना है कि अगर उन्होंने इन हथियारों को खत्म कर दिया तो अमेरिका उनका वही हश्र करेगा, जो उसने सद्दाम हुसैन और मोअम्मर गद्दाफी जैसे तानाशाहों का किया था. जॉन हॉपकिन्स स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज में प्रोफेसर जेई कू एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘किम जोंग-उन के लिए परमाणु हथियार ही उनकी सुरक्षा की गारंटी हैं. उनके अलावा कोरियाई जनता भी मानती है कि ये हथियार ही हैं जो उन्हें पश्चिमी देशों की क्रूरता से बचा सकते हैं.’ प्रोफेसर कू के मुताबिक यही कारण है कि उत्तर कोरिया पहले परमाणु हथियार नहीं छोड़ना चाहता.

उधर, अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा उत्तर कोरिया को पहले प्रतिबंधों में रियायत न देने के पीछे भी कई वजह हैं. ट्रंप प्रशासन का मानना है कि उत्तर कोरिया को इसलिए पहले रियायत नहीं दी जा सकती क्योंकि वह अमेरिका को कई बार धोखा दे चुका है और अपनी बात से पलटने का उसका लंबा इतिहास है. ऐसे में अगर डोनाल्ड ट्रंप भी उसे रियायत दे देते हैं और उसके बाद वह अपनी बात से पलट जाता है तो राष्ट्रपति की किरकिरी होना तय है.

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के एक अधिकारी सीएनएन को यह भी बताते हैं कि उत्तर कोरिया से बातचीत का जो भी हश्र हो, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप का साफ़ कहना है कि प्रतिबंधों में कोई ढील नहीं दी जाएगी. दरअसल, ट्रंप का मानना है कि ये प्रतिबंध ही हैं जिनके चलते उत्तर कोरिया आज उनके सामने बातचीत के लिए तैयार हुआ है और आगे भी वह इन प्रतिबंधों के दबाव में ही झुकेगा.