अगर कहा जाए कि बंगाल पर यूरोपीय जीवन और विचार शैली का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा तो ग़लत नहीं होगा. दिल्ली से पहले ब्रिटिश हुकूमत बंगाल से ही हिंदुस्तान पर राज़ कर रही थी. पश्चिमी प्रभाव और पूर्वी भारतीय संस्कृति के इस संगम ने हिंदुस्तान पर ज़बरदस्त असर छोड़ा है. नीरद बाबू, जैसा उन्हें कहा जाता था, का लेखकीय जीवन इसी संगम की परिणति भी कहा जा सकता है. उन्हें पहला भारतीय लेखक भी कहा सकता है जिसने भारतीयों को अंग्रेज़ी में लिखना सिखाया. दरअसल, नीरद चंद्र चौधरी हिंदुस्तानी शरीर में अंग्रेज़ी आत्मा कहे जा सकते हैं जिन पर तथाकथित ‘इंग्लिश कल्चर’ ने बहुत असर डाला. भद्र लोक कहे जाने वाले बंगाल के किशोरगंज (अब बांग्लादेश) में जन्मे नीरद चौधरी इतिहासकार बनना चाहते थे. पर ऐसा नहीं हो पाया.

इतिहासकार डेविड लेलीवेल्ड के मुताबिक इतिहासकार बनने की ख्वाहिश अधूरी रह जाने और फ़ौज में लेखाकार की नौकरी पा लेने के बाद नीरद चौधरी ने इस अवधारणा को ख़त्म करने का बीड़ा उठा लिया था कि हिंदुस्तानी कभी भी यूरोपियन लोगों की तरह सुसंस्कृत नहीं हो पायेंगे. उन्होंने ठान लिया कि वे ऐसा करके दिखायेंगे. उनके साहित्यिक जीवन की यात्रा पर जाने से पहले यह जान लेना भी ज़रूरी है कि मशहूर वकील, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और सुभाष चंद्र बोस के भाई शरतचंद्र बोस के सचिव होने के नाते उन्होंने भारतीय राजनीति को भी नज़दीक से देखा. हालांकि, उन पर यह इल्ज़ाम भी लगता है कि उन्होंने ही मुखबिरी करके शरत बाबू को अंग्रेज़ों के हाथों पकड़वाया. भारतीय राजनीति को नज़दीक से देखने के बाद पर उन्हें भारतीय राजनीतिकारों में भी यूरोपियन मूल्य नज़र नहीं आये. सब छोड़-छाड़ के उन्होंने आल इंडिया रेडियो की नौकरी पकड़ ली और यहीं उन्हें अपनी जीवनी ‘ऑटोबायोग्राफ़ी ऑफ़ अननोन इंडियन’ लिखने का विचार आया.

एक इंटरव्यू में नीरद चौधरी ने बताया था कि एक रात उन्हें ख़याल आया कि क्या वे यूं ही मर जाने के लिए पैदा हुए हैं. क्या वे कभी अपने पसंदीदा विषय इतिहास पर नहीं लिख पाएंगे? उनके मुताबिक उनकी अंतरात्मा ने कहा कि जीवन में जो उन्होंने देखा और महसूस किया वह भी एक इतिहास ही है और उसे भी लिखा जा सकता है. इस विचार ने उन्हें ‘ऑटोबायोग्राफ़ी ऑफ़ अननोन इंडियन’ लिखने की प्रेरणा दी. आल इंडिया रेडियो की नौकरी के दौरान वे रोज़ चार या पांच पन्ने ही लिखते थे. इस धीमी रफ़्तार से लिखने की वजह से उनकी आत्मकथा 1951 में छप सकी. इस किताब को उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य को समर्पित किया जो अपने आप में काफी विवादास्पद बात हो गयी.

नीरद चौधरी को भारत के सबसे विवादास्पद लेकिन क़ाबिल लेखकों में माना जाता है. ‘द ऑटोबायोग्राफ़ी ऑफ़ एन अननोन इंडियन’ और ‘कॉन्टिनेंट ऑफ़ सर्से’, जैसी पुस्तकों के लेखक नीरद चौधरी को पश्चिम में ज़रूर सराहा गया, लेकिन भारत में उनको वे सम्मान कभी नहीं मिल पाया जिसके वे हक़दार थे. ऐसा इसलिए कि उनके लेखों में पश्चिम संस्कृति का गुणगान था. मैक्स मुलर और क्लाइव की जीवनी लिखकर उन्होंने तारीफें कम और विवाद ज़्यादा बटोरे. ईएम फ़ोस्टर की ‘पैसेज टू इंडिया’ के शीर्षक से प्रभावित होकर उन्होंने ‘पैसेज टू इंग्लैंड की रचना की. अपने बारे उनका मानना था कि आदत के बजाए वे आवेगों से प्रेरित होकर लिखने वाले लेखक हैं और दिल से सोचते हैं. उनका कहना था कि एक किताब लिखने के दौरान ही उनके ज़ेहन में दूसरी क़िताब का विचार जन्म लेता है.

नीरद चौधरी ने 1953 में इंग्लिश मैगज़ीन ‘इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया’ में एक लेख लिखा था. इसका शीर्षक था ‘आफ्टर नेहरु हू’ (नेहरु के बाद कौन). इसमें उन्होंने लिखा तथा कि देश की एकता के पीछे नेहरू का नैतिक बल सबसे बड़ी ताक़त है. नेहरु को गांधी का उत्तराधिकारी मानते हुए उन्होंने लिखा था कि नेहरू ही वह व्यक्ति हैं जो सरकारी मशीनरी और भारत के लोगों को एक साथ रख पाने में सफल हैं और उनकी वजह से ही देश में सांस्कृतिक, राजनैतिक और आर्थिक टकराव नहीं हुए हैं. वहीं भारत में हिंदू और मुस्लिम संस्कृति के टकराव के बारे में उनका मानना था कि मुसलमानों ने ही भारत में मंदिर तोड़े और धर्म परिवर्तन की लहर को आगे बढ़ाया.

हालांकि ऐसा भी कहा जाता है कि नेहरू ने उनकी जीवन पढ़ लेने के बाद कहा था कि अगर नीरद बाबू को लगता है कि भारतीय काबिल नहीं हैं तो उन्हें चले जाना चाहिए. कहा जाता है कि सरकार ने उन्हें इसके चलते ही आल इंडिया रेडियो की नौकरी से निकाल दिया. इस तथ्य पर यकीन नहीं किया सकता. नेहरू विचारों में इतने उदार थे कि ऐसी बातें उन्हें विचलित नहीं करती थीं. हो सकता है यह किसी और की हरकत रही हो.

रेडियो की नौकरी जाने के बाद नीरद चौधरी बेरोज़गार हो गए, पर टूटे नहीं. उन पर एक तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया. कुछ साल बाद सरकार ने उनसे संपर्क स्थापित करने की कोशिश की. चर्चित लेखक खुशवंत सिंह लिखते हैं कि जब उन्हें बताया गया कि सरकार ने उन पर से प्रतिबंध हटाकर उन्हें अनुबंधित करने का बन बनाया है तो उन्होंने विनम्रता के साथ इसे अस्वीकार कर दिया. उनका कहना था कि सरकार ने उन पर से प्रतिबंध हटाया है उन्होंने सरकार पर से प्रतिबंध नहीं हटाया है.

1970 में नीरद बाबू इंग्लैंड चले गए और फिर ताउम्र वहीं रहे. उन्होंने अंग्रेज़ी संस्कृति में अपने आप को इस कदर ढाल लिया कि वे अंग्रेज़ों से भी ज़्यादा अंग्रेज़ होकर रहे. वे जब भी घर से बाहर निकलते, हमेशा सूट, टाई और हैट पहनकर ही निकलते. नीरद बाबू की शख्सियत में उलझन का तत्व ज़्यादा था. इंग्लैंड के गिरते हुए मूल्यों से भी उन्हें दिक्कत थी. वे हमेशा यह मानते रहे कि ज़्यादातर भारतीय मूल निवासी नहीं हैं और भारतीय उपमहाद्वीप पर हमेशा से ही विदेशी प्रभाव रहा. ऐसे में सबसे बेहतर संस्कृति को अपनाना ही सबसे बेहतर विचार होगा, और उनकी नज़र में यूरोपीय संस्कृति सबसे बेहतर विकल्प थी. इंग्लैंड के साहित्यिक जगत में नीरद चौधरी को वह सम्मान मिला, जो उन्हें भारत प्राप्त नहीं हो पाया. ऑक्सफ़ोर्ड शहर के जिस मकान में वे रहे, उस पर उनके निधन के बाद इंग्लैंड की सरकार ने एक तख्ती लगा दी है. इस पर लिखा हुआ है कि नीरद चौधरी यहां रहते थे.

उनकी जीवनी ‘ऑटोबायोग्राफ़ी ऑफ़ एन अननोन इंडियन’ सबसे चर्चित जीवनी कही जाती है. यह कुछ मायनों में क्रांतिकारी भी थी. उनसे पहले महात्मा गांधी ‘सत्य के प्रयोग’ और जवाहर लाल नेहरू ‘टुवार्ड्स द फ़्रीडम’ लिख चुके थे. नीरद बाबू की किताब इन दोनों से अलग थी. नोबेल पुरुस्कार विजेता वीएस नायपॉल ने इस किताब के बारे में कहा था कि यह ब्रिटेन और भारत के संगम के बाद सबसे बड़ी क़िताब है. इसे किसी भी भारतीय लेखक द्वारा अंग्रेजी में लिखी गयी पांच सबसे महान कृतियों में रखा जाता है.