कुछ समय पहले ब्रेस्टफीडिंग प्रोमोशन नेटवर्क इन इंडिया नाम की एक संस्था की रिपोर्ट आई. एक सर्वे पर आधारित इस रिपोर्ट के अनुसार स्तनपान कराने के मामले में भारत दक्षिण एशियाई देशों में सबसे निचले स्तर पर है. रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में केवल 44 फीसदी महिलाएं ही प्रसव के एक घंटे के भीतर अपने नवजात बच्चे को स्तनपान कराती हैं और इस मामले में वह अफगानिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका आदि देशों से भी पीछे है.

1992 में बने एक कानून के तहत भारत में शिशुओं के लिए डिब्बा बंद दूध, खाद्य पदार्थों और दूध की बोतल के विज्ञापन पर पाबंदी लगाई जा चुकी है. इसके बावजूद न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया में नवजातों के लिए डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों की बिक्री बढ़ रही है. ग्लोबल डेटा नाम की एक शोध कंपनी के मुताबिक 2017 से 2021 के बीच पूरी दुनिया में डिब्बा बंद दूध की बिक्री में 35 फीसदी की बढ़ोतरी होने का अनुमान है.

भारतीय समाज में नवजात शिशु के लिए स्तनपान को ही अच्छा माना जाता है. लेकिन मांओं को स्तनपान के लिए प्रोत्साहित किए जाने के बावजूद यह घट रहा है. जानकारों के मुताबिक इसके चार बड़े कारण हैं.

कमजोर स्वास्थ्य

भारत में प्रसव से गुजरने वाली ज्यादातर महिलाओं का स्वास्थ्य बहुत ही कमजोर होता है. मांएं खासतौर से पोषक तत्वों के अभाव से जूझती हैं और खून की कमी यानी एनीमिया की शिकार होती हैं. इस कारण ऐसी महिलाओं की संख्या काफी ज्यादा है जिनके शरीर में बच्चे के लिए पर्याप्त दूध ही नहीं बनता. समाज की लिंगभेदी संरचना के कारण अक्सर ही बेटियों की मांओं को प्रसव के बाद परिवारवालों, खासतौर से ससुराल वालों की घोर उपेक्षा का सामना करना पड़ता है. इसका सीधा संबंध उनके खान-पान और शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्वों की कमी से जुड़ता है.

स्तनपान कराने वाली महिलाओं को ज्यादा दूध-दही के सेवन की जरूरत होती है. लेकिन कई परिवारों में इसका ख्याल नहीं रखा जाता. असल में मां के दूध की मात्रा और गुणवत्ता का मां द्वारा खाए जाने वाले खाने से सीधा संबंध है. लेकिन काफी मामलों में परिवार वाले ही इसके प्रति पूरी तरह लापरवाह होते हैं. उन्हें लगता है कि मां के शरीर में दूध बनना तो प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसमें उनकी कोई भी भूमिका नहीं है.

कामकाजी महिलाओं की बढ़ती संख्या

यह भी नवजात बच्चों को मां के दूध से बहुत जल्दी वंचित करने का बड़ा कारण है. हमारे देश की बड़ी आबादी आज भी गरीबी में जी रही है. इसलिए निम्न आर्थिक स्थिति वाले परिवारों में पुरुषों के साथ महिलाओं को भी कोई न कोई काम करना ही पड़ता है. ज्यादातर संगठित या असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाली मांओं को प्रसव के बाद पर्याप्त छुट्टी नहीं मिलती. इस कारण उन्हें बहुत जल्दी ही नवजात शिशु का स्तनपान छुड़वाना पड़ता है.

हाल के समय में मध्य और उच्च वर्ग वाले परिवारों की लड़कियां/महिलाएं भी नौकरी करने लगी हैं. शिक्षा के बढ़ते स्तर के कारण छोटे-बड़े शहरों और कस्बों में कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत तेजी से बढ़ रहा है. इसके चलते भी महिलाओं में स्तनपान में भारी गिरावट देखने को मिल रही है.

डिब्बा बंद दूध

जानकारों का एक वर्ग मानता है कि बच्चों के लिए डिब्बा बंद दूध और खाद्य पदार्थों के विज्ञापनों के जबर्दस्त प्रचार ने भी स्तनपान को कम करने में अहम भूमिका निभाई है. इन डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों के विज्ञापनों में उनमें पाए जाने वाले जरूरी और पोषक तत्वों का हद से ज्यादा प्रचार होता है. यह प्रचार भी कुछ इस तरह किया जाता है जैसे इन खाद्य पदार्थों को दिए बिना बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास अच्छी तरह से नहीं होगा. ऐसे में मांओं का भरोसा अपने दूध से ज्यादा इन पर बढ़ जाता है और वे स्तनपान से ज्यादा जरूरी डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों को मानने लगती हैं.

जल्दी-जल्दी बच्चे

महिलाओं के ऊपर जल्दी-जल्दी थोपी गई गर्भावस्था भी नवजात बच्चे को मां का पर्याप्त दूध न मिल सकने का एक अहम कारण है. एक बच्चे को स्तनपान कराने में ही महिला के शरीर के पोषक तत्व बड़ी मात्रा में खर्च हो जाते हैं. ऐसे में बार-बार प्रसव से गुजरने और बहुत निम्न स्तर का खान-पान होने के कारण महिलाओं के शरीर में दूध बनने लायक जरूरी तत्व बचते ही नहीं हैं.

पश्चिम की नकल

कई मानते हैं कि पश्चिमी समाज के प्रभाव में भी शहरी महिलाएं स्तनपान को जल्दी छुड़वाने की कोशिश करती हैं. वे सोचती हैं कि जब विदेशी बच्चे डिब्बा बंद दूध पीकर स्वस्थ्य रहते हैं तो फिर उन्हें ही क्यों लंबे समय तक स्तनपान कराने के चक्कर में पड़ना है. महिलाओं का अपने फिगर को लेकर पहले की अपेक्षा ज्यादा सचेत होना भी शहरी महिलाओं में स्तनपान के घटने की एक वजह देखने में आया है.

स्तनपान कम कराने के नुकसान

विशेषज्ञों के अनुसार स्तनपान न कराना मां और बच्चे दोनों के लिए नुकसानदेह है. विश्व स्वास्थ्य पत्रिका लैंसेट में छपे एक अध्ययन में पाया गया कि स्तनपान से छाती के कैंसर, मोटापे और प्रेगनेंसी के बाद होने वाले टाइप टू डायबिटीज के मामलों में काफी कमी आई. इसके अलावा यह भी पता चला कि स्तनपान से न सिर्फ हर साल लगभग 34 लाख से भी ज्यादा छोटे बच्चों में सांस संंबंधी संक्रमण रोका जा सकता है बल्कि उनको होने वाले दस्त का जोखिम भी काफी कम किया जा सकता है.

बाल चिकित्सकों के मुताबिक नियमित रूप से स्तनपान बच्चे की बुद्धिमत्ता यानी आईक्यू का समग्र विकास करता है. इसके साथ ही मां का दूध बच्चों की रोग प्रतिरोधी क्षमता भी बढ़ाता है. इसलिए स्तनपान को बढ़ावा दिए जाने की सख्त जरूरत है. जानकारों के मुताबिक इसके लिए सरकारी के साथ-साथ निजी क्षेत्र में भी सवेतन मातृत्व अवकाश के लिए सरकार के स्तर पर पहल की जानी चाहिए. साथ ही कार्यस्थलों पर बच्चों के लिए क्रेच और उन्हें दूध पिलाने की व्यवस्था आदि उपाय करना फायदेमंद हो सकता है.