इस उपन्यास का एक अंश -

‘क्योंकि हमने चींटियों को अपने घर का दुश्मन मान रखा था, उन्हें मारने में हमें कोई हिचक नहीं थी...जैसे-जैसे उनका प्रकोप और हमारी हताशा बढ़ती गयी, वैसे-वैसे हमने उनके विनाश के लिए अधिकाधिक हिंसात्मक तरीकों का इस्तेमाल किया. दिखते ही हाथ या पैर से मसल देने या हाथ पड़ गयी किसी किताब से ही मार देने की आदत-सी पड़ गयी. अगर हम देखते कि उन्होंने खाने की किसी वस्तु का घेरा डाल लिया है तो हम उनके इर्द-गिर्द पानी की लकीरें बनाकर उन्हें बन्दी बना देते. वे पानी की लकीर को पार न कर पातीं और दिग्भ्रमित हो पागलों की तरह चक्कर काटतीं. इसे देखते हुए हम पानी की लकीरें उनके और पास बनाते और उन्हें पोंछ डालते. उनको मारने का एक और तरीका था. जलते हुए कोयलों को उनके ऊपर डालना. वे जलकर सिकुड़ जातीं और एक छोटा काला बिन्दु बन जातीं. धोने के लिए रखे बतनों में वे चढ़ जातीं. हम उन बर्तनों में पानी भरकर उन्हें डुबो डालते. ये विविध हिंसात्मक युक्तियां हमारे दैनिक जीवन का सहज अंग बन गयी थीं...हम चींटियों के साथ ऐसा बर्ताव करते मानों वे हमारे घर को निगल जाने वाले राक्षस हों.’


उपन्यास : घाचर-घोचर

लेखक : विवेक शानभाग

अनुवादक : अजय कुमार सिंह

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन

कीमत : 125 रुपए


भारतीय समाज में विवाह और परिवार जैसी सबसे पुरानी सामाजिक संस्थाओं के स्वरूप में आज लगभग 180 डिग्री का बदलाव आ चुका है. पहले जहां लव-मैरिज को हेय दृष्टि से देखा जाता था, वहीं महानगरीय समाज में अब अरेंज-मैरिज के प्रति कुछ-कुछ वैसा सा भाव पसरता जा रहा है. पहले जहां एकल परिवार की कल्पना से लोग अचरज से भरते होंगे, वहीं अब संयुक्त परिवार की कल्पना चौंकाती है. व्यक्तिगत सोच से लेकर पारिवारिक ढांचे तक में बदलाव का यह सफर बहुत से चाहे-अनचाहे रास्तों और मोड़ों से होकर गुजरा है. विवेक शानभाग का यह उपन्यास आपको उन्हीं रास्तों और मोड़ों से गुजारते हुए, बेंगलुरु के एक मध्यवर्गीय परिवार की बदलती भीतरी संरचना से हमारा खूबसूरत साक्षात्कार कराता है.

इस उपन्यास को पढ़ते हुए पाठक एक तरफ जहां सास-बहू के बीच की रस्साकशी का मजा लेंगे, वहीं दूसरी तरफ यह कुछ लोगों के मन में संयुक्त परिवार की सुखद स्मृतियां भी पैदा कर सकता है. परिवार चाहे एकल या संयुक्त, इनमें हमारे जीवन को सुखी और संपन्न करने में पैसे की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है. लेकिन यही संपन्नता कभी-कभी चुपचाप संबंधों के बीच दरार पैदा करने का जरिया भी बन जाती है. घाचर-घोचर के लेखक ने बड़ी ईमानदारी से बहन का विवाह न चलने का अहम कारण अपने परिवार की आर्थिक संपन्नता को माना है. विवेक लिखते हैं –

‘मालती की शादी में हुए ख़र्च का शादी के टूटने से कोई सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिए. पर पता नहीं अगर पिताजी सेल्समैन ही बने रहते तो भी क्या वह इस तरह छह महीने भी ठीक से अपनी गृहस्थी न चला कर यूं घर से भाग आती? शायद पैसे के प्रभाव ने कुछ अनिवार्यताओं को सहने की उसकी क्षमता को कम कर दिया था. मालती का पति विक्रम कोई खराब आदमी नहीं था...मालती के आदर्श गृहस्थी के चित्र में सदा काम में व्यस्त रहने वाला पति नहीं था. लेकिन अगर विक्रम दुकान पर न बैठता तो उसके पास और कोई आमदनी नहीं थी.’

आज के समय में ज्ञान की बातें करने वाले बहुत से गुरु, बाबा, संन्यासिनी आदि चारों तरफ देखने को मिल जाते हैं. अक्सर ही ऐसे लोगों की कही साधारण बातें भी हमें महावाक्य लगती हैं. लेकिन विवेक ठीक इसके उलट एक साधारण से वेटर की सामान्य सी बातों को महावाक्य की तरह लेते हैं...और अपनी इस सोच के पक्ष में वे बहुत ठोस तर्क देते हुए कहते हैं –

‘अगर विंसेण्ट इस तरह एक रेस्टोरेंट में वेटर न होता, अगर उसका कोई और आकर्षक नाम होता, उसके चमकती हुई लम्बी दाढ़ी होती, वह किसी आलीशान बंगले में रहता और यही बातें कहता तो लाखों लोग उसके सामने हाथ बांधे खड़े रहते. उस तरह के उच्च महावाक्यों में और विंसेण्ट की बातों में आखि़र क्या फ़र्क था? बातें तो सन्दर्भ और सुनने वालों की मनःस्थिति के अनुसार रूप धारण कर लेती हैं. उस दृष्टि से देखा जाए तो अवतार लेकर आये हुए व्यक्तियों ने ऐसी कोई महान बड़ी-बड़ी बातें नहीं कीं. उनकी सामान्य बातों को ही लोगों ने बड़े-बड़े अर्थो से भरा हुआ नहीं देखा क्या? आख़िर शब्दों की शक्ति का स्फोट होता है ग्रहण करने वाले के मन में ही तो. है कि नहीं? फिर क्या कोई दावे के साथ कह सकता है कि भगवान किस रूप में अवतरित होंगे?’

ज्यादातर परिवारों में ऐसी कोई न कोई कशमकश जरूर होती है जो जीवन का रस सोख लेती है. जो साथ का अहसास छीन लेती है. जो निकटता को भी अजनबीपन में बदल देती है...और ऐसी या इससे मिलती-जुलती तमाम स्थितियों से भारतीय परिवारों के हर एक इंसान को जब-तब सामना करना पड़ता है फिर चाहे वह इसका सामना करना चाहे या नहीं. उपन्यास का नायक भी कुछ ऐसी ही स्थिति से रूबरू होता है. अपनी पत्नी की अनुपस्थिति में उसकी चीजों के माध्यम से पत्नी के करीब जाने का जो वर्णन लेखक ने किया है, वह बेहद भीतर तक कंपकपी पैदा करता है. एक झलक –

‘मैं एक क़दम और आगे बढ़ा. अपने चेहरे को अलमारी में रखे उसके कपड़ों में गड़ा दिया. महसूस किया कि वह सुगन्ध मुझे और चाहिए थी. एक साड़ी को सूंघा. लेकिन लगा कि सुगन्ध बढ़ने के बजाय कम हो गयी थी. किसी भी वस्त्र को सूंघने पर ऐसा ही लगा. पूरी अलमारी में जो सुगन्ध व्याप्त थी, वही वस्त्रों को अलग-अलग सूंघने पर नहीं महसूस होती थीं. जितना मैं उसके पास जाने की कोशिश करता, उतना ही वह मुझसे दूर होती जाती. मैं समझ में न आने वाली- प्रेम, भय, अधिकार, इच्छा, हताशा से मिश्रित-एक भाव-विह्वलता से फट जाने की हद तक भर गया.’

मूल रूप से कन्नड भाषा में लिखे गए इस उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद भारत, अमेरिका और यूके में प्रकाशित हो चुका है. इसके साथ ही दुनियाभर की 18 अन्य भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है. ‘घाचर-घोचर’ को ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ के साथ-साथ ‘द गर्डियन’ द्वारा 2017 की ‘सर्वश्रेष्ठ दस पुस्तकों’ में से एक भी चुना जा चुका है.

पेशे से इंजीनियर विवेक शानभाग इस उपन्यास में भारतीय परिवार के ढांचे का बड़ा सटीक चित्रण करते हैं. उनकी अभिव्यक्ति की यह खासियत आकर्षित करती है कि विकट स्थिति और आपदा में भी उनकी भाषा हास्य का सा पुट लिए रहती है. अजय कुमार सिंह ‘घाचर-घोचर’ को हिंदी की अनुदित कृति के तौर पर पढ़ने के अहसास से पाठकों को बचाने के लिए बधाई के पात्र हैं. इस उपन्यास में आपको अपने पुराने घर की सी महक मिलेगी.

और अंत में बस इतना ही, कि ‘घाचर-घोचर’ किसी भी भाषा का शब्द नहीं है! यह कुछ वैसा ही शब्द है जैसे छोटे बच्चे अपने हिसाब से नए-नए शब्द गढ़ लेते हैं. ‘घाचर-घोचर’ को किसने और क्यों गढ़ा ये पढ़ना दिलचस्प होगा.