2003 में आई ‘ओल्डबॉय’ के साथ साउथ कोरियन फिल्मों के प्रति दुनिया का मोह जागा था. धीरे-धीरे कोरियाई फिल्में विश्व-भर में अति की हिंसा के बीच भौचक्का करने वाली कहानियां कहने के लिए जानी जाने लगीं. ‘मैमोरीज ऑफ मर्डर’ (2003), ‘अ टेल ऑफ टू सिस्टर्स’ (2003), ‘अ बिटरस्वीट लाइफ’ (2005), ‘द चेजर’ (2008), ‘द गुड द बैड द वीयर्ड’ (2008), ‘मदर’ (2009), ‘थर्स्ट’ (2009), ‘द मैन फ्रॉम नो वेयर’ (2010), ‘आई सॉ द डेविल’ (2010), ‘द येलो सी’ (2010), ‘न्यू वर्ल्ड’ (2013) से लेकर हाल के वर्षों में आई ‘द हैंडमेडन’ (2016), ‘द वेलिंग’ (2016), ‘ट्रेन टू बुसान’ (2016) और इस साल फॉरन लेंग्वेज ऑस्कर की प्रबल दावेदार मानी जा रही ‘बर्निंग’ (2018) जैसी झकझोर कर रख देने वाली कोरियाई फिल्मों ने हॉरर और हिंसा के इर्द-गिर्द अविश्वसनीय कहानियां रचकर विश्वभर में तहलका मचाया.

लेकिन इस वजह से, हर तरह की फिल्में बनाने वाली साउथ कोरियन फिल्म इंडस्ट्री हिंसा, मारधाड़, सीरियल किलर, भूत-प्रेत-वैम्पायर व हदें पार करने को तैयार इंसानों के इर्द-गिर्द बने सिनेमा से ही विश्वभर में पहचानी जाने लगीं. हॉलीवुड के पसंदीदा जॉनर्स वाली ही कहानियां कहने के बावजूद कोरियाई फिल्में उनसे एकदम दूर होकर पूर्णत: मौलिक होने के लिए सम्मानित की जाने लगीं. लेकिन, हिंसक कोरियाई फिल्मों के इस चलन के स्थापित हो जाने से पहले साउथ कोरिया में एक फिल्म ऐसी भी बनी जो कि न सिर्फ इन स्टाइलिश हिंसक कोरियाई फिल्मों का विलोम है, बल्कि प्रेम पर एकदम अनोखा नजरिया पेश कर इसने विश्वभर के सिने प्रेमियों को चौंका दिया था. प्रेम के विषय पर अहिंसक फिल्में साउथ कोरिया में हमेशा से बनती रही हैं और आज भी बनती हैं लेकिन ‘3-आयरन’ (2004) नामक इस फिल्म की बात अलग है. सरल सादगी से भरपूर इस फिल्म की छाप अमिट है.

निर्देशक किम की-दुक हिंसक फिल्में बनाने के लिए जितने जाने जाते हैं उतने ही अहिंसक व मेडिटेटिव आर्ट हाउस फिल्में बनाने के लिए भी. उनकी ‘मोबियस’ (2013) और ‘पिएता’ (2012) जैसी डिस्टर्बिंग फिल्में देखना हर किसी के बस की बात नहीं है, तो ‘स्प्रिंग, समर, फॉल, विंटर...एंड स्प्रिंग’ (2003) व ‘3-आयरन’ (2004) जैसी मेडिटेटिव फिल्में देखकर विश्वभर के सिने प्रेमी आह्लादित होते रहे हैं.

‘स्प्रिंग, समर, फॉल, विंटर...एंड स्प्रिंग’ झील पर तैरते एक बौद्ध मठ में रहने वाले जवान तथा वयोवृद्ध मॉन्क के इर्द-गिर्द घूमती है. वर्षों के जीवन को पांच मुख्तलिफ मौसमों में दर्शाया गया है और फिल्म चार साल की मेहनत के बाद तैयार हुई क्योंकि जो सीन जिस मौसम का था उसे उसी मौसम में फिल्माया जाना था. लेकिन इस फिल्म पर बात फिर कभी. आज उस ‘3-आयरन’ पर बात करते हैं जिसने प्रेम में मौन के मायने विलक्षण अंदाज में समझाए थे.

‘3-आयरन’ के नायक का कोई घर नहीं है. एक मोटरसाइकिल है जिस पर बैठकर वो दिनभर घरों के बाहर पैम्फलेट चिपकाता फिरता है और रात में उन घरों में चोरी-छिपे घुस जाता है जो सुबह से वीरान नजर आ रहे होते हैं. वहां एक-दो दिन रहता है और आराम फरमाता है. लेकिन कुछ चुराता नहीं बल्कि घर के बाशिंदों के कपड़े धो देता है, उनकी खराब हुई मशीनों को सही कर आता है और हर चीज करीने से सजाकर रख देता है. कहने का मतलब है कि नायक एक तरह का खानाबदोश है, और दूसरों के मकान ही उसके घर हैं.

एक रोज उसके जीवन में एक लड़की आती है. घरेलू हिंसा की शिकार एक शादीशुदा लड़की. अब सबकुछ बदल जाता है, और एक की जगह दो लोग भरे-पूरे शहर में खानाबदोश हो जाते हैं. सुनने में यह कहानी आम-सी बॉलीवुड फिल्मों की भी लग सकती है लेकिन जब आप इस फिल्म को देखेंगे तो समझेंगे कि कुछ निर्देशक क्यों परदे पर रची सिनेमाई कहानियों के ‘लेखक’ कहे जाते हैं. जो काम नायक अकेले किया करता था अब उदास नायिका के साथ करता है.

शुरुआत में नायिका अजनबियत के मारे पीछे-पीछे चलती है लेकिन धीरे-धीरे जिन घरों में नायक-नायिका डेरा डालते हैं वहां कामों में हिस्सेदारी बांटने लगती है. नायक के करीब आने के दौरान कपड़े धोने की लत उसे ऐसी लगती है कि जब समाज नायक से उसे अलग कर देता है तो वो अपने रईस पति के घर में भी वाशिंग मशीन होने के बावजूद पट्टे पर बैठकर रगड़-रगड़कर कपड़े धोती है.

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उदासी से लबरेज ‘3-आयरन’ की सबसे खास बात है कि नायक और नायिका के बीच कोई संवाद नहीं है. फिल्म में वैसे भी गिनती के चंद संवाद हैं जो कि बाकी दूसरे किरदार बोलते हैं. लेकिन नायक व नायिका मौन रहते हैं. तब भी जब वे अजनबी थे, तब भी जब वे करीब हो रहे होते हैं, तब भी जब करीब होकर चोरी से घुसे एक घर के सोफे पर एक शाम साथ बैठते हैं, और तब भी जब लंबे वक्त के लिए अलग कर दिए जाने के बाद एक होते हैं. डेढ घंटे तक मौजूद रहा मुख्य किरदारों के बीच का यह मौन ही इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत है, और इस बातूनी दुनिया में मौन की इस फिल्म से बेहतर सिनेमाई प्रस्तुति शायद ही आपको देखने को मिलेगी.

दोनों में से कोई गूंगा नहीं है लेकिन इस घोर बातूनी दुनिया से वार्तालाप करने की शायद इच्छा ही नहीं है. दोनों आपस में बात करते हैं तब भी ‘आंखें ही होती हैं दिल की जुबान’ नामक फिल्मी क्लीशे का सहारा नहीं लेते और एक-दूसरे से नजरें बचाने के बावजूद एक-दूसरे को समझते जाते हैं. बड़ा खूबसूरत अहसास है ऐसा होते हुए किसी फिल्म में देखना!

धीमी इस फिल्म की यह भी खासियत है कि आर्ट हाउस सेंसिबिलिटी होने के चलते वो अलग-अलग मिजाज के संगीत का प्रयोग कर, और दिलचस्प घटनाओं को केंद्र में रख कर, कभी यह महसूस नहीं होने देती कि यह कहानी बिना संवादों के आगे बढ़ रही है. तेज रफ्तार संगीत से सजी स्टाइलिश कोरियाई थ्रिलर फिल्मों को पसंद करने वाले नए-नवेले दर्शकों के लिए तो बिना कुछ कहे बहुत कुछ कहने वाली ‘3-आयरन’ देखना एक अनोखा अनुभव सिद्ध होगा!

इस फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिलने की मुख्य वजह थोड़ी मुख्तलिफ है. उसका जिक्र करना उन लोगों के लिए स्पॉइलर हो जाएगा जिन्होंने इसे अभी तक देखा नहीं है. इसलिए इस लेख को पढ़कर उसे देखने की चाह जगाने वालों के लिए फिल्म का स्वाद खराब करने का कुफ्र हम नहीं करेंगे. बस इतना कहेंगे कि फिल्म का थर्ड एक्ट – यानी कि अंतिम हिस्सा – अद्भुत है! अपनी प्रेम-कहानी में मौन का महत्व दर्शाने के अलावा फिल्म आध्यात्म (या जादुई यथार्थवाद?) और भौतिकवादी दुनिया से ऊपर उठने की चाहत को भी इस हिस्से में खुद से सुंदरता से जोड़ती है. और फिर जो क्लाइमेक्स हमारी नजर होता है वो इस फिल्म को सिनेमा इतिहास में सबसे खूबसूरत अंत रखने वाली फिल्मों में से एक बना देता है. होकर भी न होना केवल कहावत नहीं रह जाती, सच्चे प्रेम में डूबे जीवन का परम सत्य बन जाती है.

और इस सत्य को वजन नापने वाली मशीन भी नहीं माप पाती. अंतिम दृश्य में!

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