मध्य प्रदेश में चुनाव प्रचार 26 नवंबर की शाम को ही थम चुका है. और 28 नवंबर काे जब ये ख़बर पढ़ी जा रही होगी तो मतदान भी या तो थम चुका होगा या थमने को होगा. इसके बाद सीधा इंतजार रहेगा तो 11 दिसंबर का, जब चुनाव नतीजा घोषित होगा और यह पता चलेगा कि प्रदेश में सरकार किसकी बनने वाली है.

हालांकि क़यासाें-अटक़लबाज़ियाें का सिलसिला चुनाव प्रचार की शुरूआत से ज़ारी है और नतीज़ों तक जारी रहने वाला है. अभी जो क़यास हैं उसकी कुछ प्रामाणिक सी कही-समझी जाने वाली मिसालें देखिए. एनडीटीवी में एक ख़बर है. इसमें दो तथ्य हैं. पहला- तमाम ओपिनियन पोल्स का औसत भारतीय जनता पार्टी को मामूली बढ़त दे रहा है. इसमें भाजपा को 116 और कांग्रेस को 102 के लगभग सीटें मिल सकती हैं. दूसरा- प्रदेश कांग्रेस का आंतरिक आकलन है कि उसे भाजपा पर 2.8 फ़ीसद मतों की बढ़त मिलती दिख रही है.

एेसे ही देश के जाने-माने पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने मध्य प्रदेश के सबसे दिलचस्प मुकाबले वाले इलाके मालवा में हालात का ज़मीनी जायज़ा लेने के बाद दैनिक भास्कर अख़बार में 21 नवंबर को एक आलेख लिखा. इसका शीर्षक था - ‘क्या मध्य प्रदेश, गुजरात-2017 दोहराएगा.’ यहां बस याद रखने की ज़रूरत है कि दिसंबर-2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान ऐसे ही नज़दीकी मुकाबले में बाजी भाजपा के हाथ लगी थी. राष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ प्रदेश के जानकारों की भी ऐसी ही मिली-जुली राय है.

इंडिया टुडे, दैनिक भास्कर और हिंदुस्तान टाइम्स जैसी मीडिया समूहों में शीर्ष पदों पर रह चुके भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह एक स्थानीय चैनल से बातचीत में कहते हैं, ‘प्रदेश में अंडर करंट (वर्तमान शासन के खिलाफ दबी-छिपी भावना) तो है. लेकिन यह स्थानीय विधायकों के प्रति ज़्यादा है. शिवराज और उनकी योजनाओं की लाेकप्रियता भी बनी हुई है. लिहाज़ा स्थानीय प्रत्याशियों के लिए सत्ताविरोधी रुझान इस बार नतीज़े तय करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है.’ एनके सिंह विंध्य प्रांत में ज़मीनी पड़ताल कर के आए हैं.

इसी तरह प्रदेश एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक लज्जाशंकर हरदेनिया एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘यह चुनाव बिना लहर का है. किसी मुद्दे या चेहरे की हवा नहीं है. ऐसे चुनाव में यह अंदाज़ा लगाना बेहद जोख़िम भरा होता है कि ऊंट किस करवट बैठेगा. पर भाजपा के पास शिवराज के रूप में लोकप्रिय चेहरा दिख रहा है. पार्टी का संगठन मज़बूत है. उसकी रणनीति और प्रचार में आक्रामकता दिखती है. ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पार्टी नेताओं की पहुंच भी दिख रही है. ऐसे में भाजपा का पलड़ा कांग्रेस के मुकाबले 20 कहा जा सकता है.’

स्थानीय राजनीति के अन्य जानकारों से बात करें तो भी यही साफ-साफ इशारा मिलता है कि यहां कोई कांग्रेस को एक-तरफा बढ़त मिलने की बात नहीं कह रहा. इनके मुताबिक मुकाबला कांटे का है, या फिर पलड़ा कुछ हद तक भाजपा की तरफ झुका है. लिहाज़ा यहां उन कारणों का अंदाज़ा किया जा सकता है, जो शिवराज की जीत या कहें कि ‘मध्य प्रदेश में गुजरात-2017 के दाेहराव’ का कारण बन सकती हैं. इनमें तीन प्रमुख हैं.

1. कांग्रेस की चूकें जिन्हें भाजपाई भुनाने से नहीं चूके

मध्य प्रदेश में अगर शिवराज चौथी बार मुख्यमंत्री बनते हैं ताे इसमें सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार कांग्रेस ही होगी. यह भी बड़े जानकार ही कह रहे हैं. जैसे कि एनडीटीवी के ऊपर बताई गई रिपोर्ट में बताए गए कांग्रेस के आंतरिक आकलन पर ‘द प्रिंट’ न्यूज़ पोर्टल की सह-संपादक रूही तिवारी सवाल उठाती हैं. रूही के मुताबिक, ‘तमाम ‘विपरीत परिस्थितियों और 15 साल के सत्ताविरोधी रुझान के बावज़ूद बढ़त 2.8 फ़ीसदी ही क्यों? इतना तो मार्जिन ऑफ एरर (किसी आकलन में ग़लती की गुंज़ाइश) होता है. और यह बढ़त भी तब जबकि मध्य प्रदेश में किसानों का गुस्सा साफ़ दिखता है. कर्मचारी नाराज़ हैं. कांग्रेस मतदान केंद्र स्तर पर अपनी मौज़ूदगी का दावा करती है. ताे फिर यह चुनाव कांग्रेस (की लहर) का क्यों नहीं दिखता?’ तिवारी के सवाल लाज़िमी हैं और उनके ज़वाब कांग्रेस की नीति-रणनीति में ही छिपे दिखते हैं.

उदाहरण- शिवराज सरकार के ख़िलाफ़ ज़बर्दस्त हवा बना सकने वाले भ्रष्टाचार और घोटालाें के मुद्दों पर कांग्रेस ने हद दर्ज़े की लेटलतीफ़ी कर दी. पार्टी ने भ्रष्टाचार को लेकर राज्य सरकार के ख़िलाफ़ आराेप पत्र तो जारी किया, लेकिन मतदान से एक सप्ताह पहले. इस देरी की बात को ख़ुद प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने मीडिया के सामने माना लेकिन अपने अंदाज़ में. उन्होंने कहा, ‘कमलनाथ की चक्की देर से चलती है, पर पीसती बारीक़ है.’ अलबत्ता सच ये है कि यह देरी पार्टी को भारी पड़ सकती है क्योंकि इससे पहले तक भाजपा मुद्दों अपनी मर्ज़ी का मोड़ दे चुकी थी. जैसे- कमलनाथ एक वीडियो में कहते हुए सुने गए, ‘कोई कहता है कि उसके ऊपर तो चार केस हैं. मैं कहता हूं- हाेए बड़े पांच. मुझे ताे जीतने वाला चाहिए.’ यह वीडियो नवंबर के पहले सप्ताह में ही सामने आ गया. फिर कांग्रेस के ‘वचन पत्र’ के हवाले से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध की बात आई. इसमें कांग्रेस नेताअों को बाद में सफ़ाई देनी पड़ी कि ऐसी कोई बात ‘वचन पत्र’ नहीं है.

बात आगे बढ़ी तो दो वीडियो और सामने आए. इनमें से एक में कमलनाथ आरएसएस के लिए कहते सुने गए कि ‘इनसे हम निपट लेंगे बाद में.’ दूसरे में मुस्लिम समुदाय से 90 फ़ीसदी मतदान कांग्रेस के पक्ष में करने की अपील करते दिखे. महिलाओं को कम टिकट देने के सवाल पर एक वीडियो आया. इसमें उन्होंने कहा, ‘हमने कोटा या सजावट के आधार पर टिकट नहीं बांटे हैं.’ इन मुद्दों को भाजपा ने भुनाने की कोशिश की. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने चिर-परिचित अंदाज़ में यही किया. मिसाल के तौर पर उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष राजबब्बर ने मध्य प्रदेश की एक रैली में कहा, ‘..रुपया (कीमत के संदर्भ में) तो अब प्रधानमंत्री की पूज्यनीय माताजी की उम्र से भी नीचे गिर गया है.’ ऐसे ही महाराष्ट्र कांग्रेस के नेता विलास मुत्तेमवार ने राजस्थान के सिवाना में पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिता पर टिप्पणी कर दी. उन्होंने कहा, ‘तुम्हें (नरेंद्र माेदी) कौन जानता था प्रधानमंत्री बनने से पहले. और आज भी तुम्हारे बाप का नाम कोई जानता नहीं.’ ये बयान आते ही प्रधानमंत्री मोदी ने तुरंत इनके जरिए भावनात्मक हवा बनाने की कोशिश की.

दूसरी तरफ कई जगह कांग्रेस भाजपा की नकल करती दिखी. जैसे- घोषणा पत्र को ‘वचन पत्र’ के नाम से जारी करना. इसमें गाय, गौशला, गौमूत्र के कारोबार, आध्यात्मिक विभाग की स्थापना आदि की बातें शामिल करना. भाजपा की ‘कमल दीवाली’ की तरह ‘बदलाव की बाती’ कार्यक्रम आयोजित करना. कांग्रेस नेताआें के मंदिरों में माथा टेकने की बात तो अब पुरानी हो चली है. देखने में ये सब यूं लगता है जैसे भाजपा को कांग्रेस ‘भाजपाई हथियार से ही मात’ देना चाहती है. लेकिन ये हथियार दोधार का है. इसकी एक धार कांग्रेस की तरफ़ भी है. और अगर उसे इस चुनाव में अपेक्षित नतीज़ा न मिला तो मानना चाहिए कि इसी दोधार वाले हथियार ने उसे सबसे ज़्यादा नुक़सान पहुंचाया है.

2. कांग्रेस के लिए गठबंधन न होने से सत्ताविरोधी मतों का बंटवारा और आरएसएस की रणनीति

चुनाव से पहले बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जैसे दल कांग्रेस से गठबंधन की कोशिश में थे. इनसे गठजोड़ होता तो जैसा कि राज्य की राजनीति के जानकार मानते हैं- 100 सीटों तक पर भाजपा की हार तय हो जाती. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. नतीज़ा ये कि बहुजन समाज पार्टी- 227, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी- 73 और समाजवादी पार्टी- 52 सीटों पर मतों का बंटवारा कर रही है. सिर्फ़ ये तीन ही नहीं, आंकड़े बताते हैं कि राज्य में 120 के क़रीब पंजीकृत दल चुनाव लड़ रहे हैं. इनके अलावा 1,094 निर्दलीय (कुल 2,903 प्रत्याशियों में से) प्रत्याशी भी हैं. ये सब मिलकर जितना नुकसान भाजपा का करेंगे उतना ही कांग्रेस का भी कर सकते हैं, क्योंकि स्वाभाविक तौर पर इतनी बड़ी तादाद में दल और प्रत्याशी किसी एक दल की रणनीति का परिणाम तो हो नहीं सकते. ऐसे में यह ध्यान रखना होगा कि वोट बिखरने से फ़ायदा भाजपा को ज़्यादा हो सकता है क्योंकि सत्ताविरोधी रुझान का सामना भी वही कर रही है.

एक बात और. राजदीप सरदेसाई अपने आलेख में जब ‘मध्य प्रदेश में गुजरात-2017’ दोहराए जाने अनुमान लगाते हैं तो स्थानीय पर्यवेक्षकों के हवाले से एक बात पर ख़ास ज़ोर देते हैं, ‘जो पार्टी अपने मतदाताओं को चुनाव के दिन बाहर ला पाएगी, वह चुनाव जीत जाएगी.’ अब इसी से जुड़ते कुछ तथ्यों पर फिर ग़ाैर कीजिए. पहला- मध्य प्रदेश को देश के उन चंद राज्यों में शुमार होता है जहां भाजपा और आरएसएस का संगठन सबसे ज़्यादा मज़बूत है. दूसरा- इसी महीने जैसे ही कांग्रेस की ओर से आरएसएस पर प्रतिबंध का कथित मसला सामने आया, संघ परिवार की जैसे तंद्रा टूट गई हो. द इकॉनॉमिक टाइम्स के अनुसार संघ और उसके सहयोगी संगठनों ने 15 नवंबर से इस मुद्दे का ‘रणनीतिक हथियार’ की तरह इस्तेमाल किया. उन्होंने इसे आधार बनाकर अपने उन समर्थकों को ख़ास तौर पर साधने की कोशिश की जो 15 साल के भाजपा के शासन से नाराज़ हैं. इसीलिए राज्य के एक मंत्री ने इस मसले को ‘कांग्रेस का आत्मघाती गोल’ भी करार दिया है.

3. शिवराज सिंह चौहान की समाज को छूने वाली योजनाएं

तीसरे अहम तथ्य तक नज़दीकी नज़र रखने वाले एनके सिंह और राजदीप जैसे जानकारों के मार्फ़त पहुंचा जा सकता है. अपनी एक रिपोर्ट में एनके सिंह विंध्य क्षेत्र के रीवा, सीधी आदि जिलों के ग्रामीण इलाकों में रहने वालों से हुई बातचीत का ज़िक़्र करते हैं. उसका हवाला देते हुए वे लिखते हैं, ‘गरीबाें के लिए बनाई गई शिवराज सरकार की कल्याणकारी योजनाओं ने इस वर्ग में भाजपा के लिए अनुकूल परिस्थिति पैदा की है. ये लोग अपने विधायक को जानें न जानें लेकिन पार्टी के चुनाव चिह्न को पहचानते हैं और ‘मामा’ (शिवराज का लोकप्रिय नाम) को भी.’ बिल्कुल यही निष्कर्ष राजदीप मालवा क्षेत्र की यात्रा के अनुभव से निकालते हैं, ‘मध्य प्रदेश के लोगों में शिवराज के प्रति नाराज़गी उतनी नहीं है जितनी स्थानीय विधायकों के लिए. शायद इसीलिए भाजपा ने 53 विधायकों के टिकट काटे और सात की सीटें बदली हैं.’

इस बात का अहसास भाजपा को भी अच्छी तरह है. इसीलिए उसने अपना पूरा चुनाव अभियान सिर्फ़ शिवराज के इर्द-ग़िर्द रखा. यहां तक कि प्रचार सामग्री में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शिवराज के पीछे दिखे. मतदान के पहले वाले आख़िरी दो दिनों में तमाम समाचार माध्यमों में बड़े-बड़े विज्ञापन दिए गए. इनके केंद्र में भी सिर्फ़ शिवराज और उनकी कल्याणकारी योजनाओं का ज़िक़्र था. केंद्र की योजनाओं का बख़ान तुलनात्मक रूप से बेहद कम.

वैसे जानकाराें की मानें तो शिवराज की इन ‘कल्याणकारी योजनाओं’ ने राज्य के आर्थिक ढांचे को बेज़ार कर दिया है. इसके बावज़ूद भाजपा और ख़ुद शिवराज का शायद मानना है कि ये योजनाएं इस बार उनके लिए भी ‘कल्याणकारी’ साबित हो सकती हैं. और अगर 11 दिसंबर को भाजपा के पक्ष में नतीज़े आए तो उनके ‘ऐसा मानने को मान्यता ही मिलेगी.’ चौथी बार!