मराठी के विख्यात कवि लेखक चंद्रकांत पाटिल हिंदी साहित्य में भी सुपरिचित हैं क्योंकि उन्होने अकेले हिंदी से मराठी और मराठी से हिंदी जितने अनुवाद किए हैं, उतने शायद अन्य लेखक अनुवादकों ने मिलकर भी नहीं किए होंगे. पाटिल ने समकालीन मराठी कविता, ख़ासकर दलित कविता, आदिवासी कविता से हिंदी पाठकों को परिचित करवाने का बड़ा काम किया है.

चंद्रकांत पाटिल से मेरी 35 वर्षों से भी ज्यादा समय से मित्रता है. ज़ाहिर है हमने कभी एक दूसरे की जाति पूछने जैसी हरकत कभी नहीं की. मेरा अनुमान था कि जैसे ज़्यादातर पाटिल मराठा होते हैं वैसे ही चंद्रकांत पाटिल भी मराठा ही होंगे. आठ दस साल पहले हम जातियों से संबंधित कुछ चर्चा कर रहे थे उसी क्रम में पाटिल ने कहा - ‘मैं ब्राह्मण हूं’ और साथ ही आगे जोड़ा - ‘लेकिन ब्राह्मणवादी नहीं हूं’

बीते दिनों ट्विटर के सीईओ जैक डॉर्सी के हाथ में ब्राह्मणवादी पुरुषसत्ता के ख़िलाफ़ एक पोस्टर दिखने पर बवाल उठ खड़ा हुआ. इस पोस्टर पर लिखा था कि ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का नाश हो. ब्राह्मण हितैषी होने का दावा करने वाले लोगों ने सोशल मीडिया पर उनके ख़िलाफ़ ज़ोरदार आक्रोश व्यक्त किया. मामला अदालत तक पहुंच गया और केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने कड़ी कार्रवाई की बात भी कह डाली. इसी संदर्भ में चंद्रकांत पाटिल की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण बात कहती है कि ब्राह्मण होने और ब्राह्मणवादी होने में फ़र्क़ है.

ब्राह्मण होना जन्म का एक संयोग है कि आप ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए हैं. इसमें न गर्व करने की बात है न शर्म करने की क्योंकि यह आपका चुनाव नहीं है. जैसे ‘रागदरबारी’ में जब छोटे पहलवान को यह याद दिलाया जाता है कि कुहसर प्रसाद उनके पिता हैं, उन्होंने छोटे पहलवान को पैदा किया है इसलिए छोटे पहलवान को उनकी इज्जत करनी चाहिए तो छोटे पहलवान ग़ुस्से में कहते हैं, ‘हमने कोई इश्टांप पेपर पर लिखकर अर्ज़ी दी थी कि हमें पैदा करो. बड़े आए पैदा करने वाले.’ इसी तरह कोई भी अपने माता-पिता या भगवान को अर्ज़ी देकर पैदा नहीं होता कि हमें ब्राह्मण कुल में जन्म लेना है. इसीलिए ‘गर्व से कहो कि हम हिंदू हैं’ क़िस्म की बात भी बेमानी लगती है. एक तो गर्व करना ही अच्छी बात नहीं है और जिस बात के होने में अपना कोई पुरुषार्थ नहीं है उस पर गर्व करने का क्या मतलब है.

ब्राह्मण होने के कुछ फ़ायदे हैं जो अपने आप मिल जाते हैं. सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि अवर्ण जातियों को अक्सर जो भेदभाव, अन्याय और अपमान झेलना पड़ता है, उससे आप बच जाते हैं. इसके अलावा ब्राह्मणों में बहुत अमीर लोग न भी हों तो मध्यमवर्ग काफी बडा है. अगर आप ठीक ठाक मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुए हों तो पढ़ाई लिखाई की सुविधाएं और माहौल मिल जाता है. वैसे दिल्ली और उसके उपनगरों में सिक्योरिटी गार्ड का काम करने वाले लोगों में आपको मिश्रा जी, दुबे जी और पांडे जी बहुतायत से मिल जाएंगे. यह एक अलग समाजशास्त्रीय विषय है जिस पर अलग से चर्चा हो सकती है.

ब्राह्मण होने से आपको जातिगत भेदभाव और अन्याय से मुक्ति मिल जाती है, इस कथन का स्वाभाविक दूसरा पहलू यह है कि कई जातियां हैं जिनके लोगों को जातिगत भेदभाव और अन्याय झेलना पड़ता है. अगर आप इस अन्याय के प्रति संवेदनशील नहीं हैं, आपको इससे दुख नहीं पहुंचता या आप इसके समर्थक हैं तो यह ब्राह्मणवाद है और यह क़तई समर्थन के योग्य नहीं है. इसका अर्थ यह हुआ कि ब्राह्मण होने और ब्राह्मणवादी होने में फ़र्क़ है. जो ब्राह्मण है वह ज़रूरी नहीं कि ब्राह्मणवादी भी हो. इसी तरह यह भी ज़रूरी नहीं कि कोई ब्राह्मणवादी, जाति से ब्राह्मण ही हो. जो संस्थाएं ब्राह्मणवाद की पोषक हैं उनमें आपको तमाम ग़ैर ब्राह्मण लोग मिल जाएंगे. विश्व हिंदू परिषद जैसी संस्थाओं से जुड़े कुछ ज्यादा उग्र और मुखर साधु-साध्वियां जन्मना ब्राह्मण नहीं हैं.

यही बात पुरूषवादी या पितृसत्तात्मक होने के बारे में है. पुरुष या स्त्री होना हमारी इच्छा के परे है. एक्स और वाई क्रोमोजोम्स के मेल का विज्ञान या समाजविज्ञान कुछ भी हो, एक बात तय है कि उसमें भ्रूण की इच्छा का कोई स्थान नहीं होता. पुरुष होने के कई फ़ायदे हैं. भारत जैसे परम्परावादी समाजों में तो कुछ ज्यादा ही फ़ायदे हैं. पुरुष को कुछ सहूलियतें परिवार और समाज में ज्यादा मिलती हैं. बचपन से ही उन्हें अक्सर ज्यादा लाड़ प्यार मिलता है. उन्हें ज्यादा आज़ादी और सुरक्षा मिलती है. उसके मुक़ाबले लड़कियों या महिलाओं पर ज्यादा पाबंदियां होती हैं, उनके यौन हिंसा का शिकार होने की आशंका ज्यादा होती है. उनके साथ भेदभाव ज्यादा होता है. ऐसे में अगर कोई पुरुष महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और अन्याय के प्रति संवेदनशील है, अगर वह महिलाओं की सचमुच बराबरी का समर्थक है और अपने स्तर पर इन आदर्शों को अमल में लाने की कोशिश करता है तो वह पुरुषवादी या पितृसत्तावादी नहीं कहलाएगा. इसलिए सारे पुरुष पुरुषवादी नहीं होते और हमारा यह अनुभव भी है कि पुरुषवाद की या पितृसत्ता की समर्थक महिलाएं भी काफी तादाद में होती हैं.

यह जो ब्राह्मणों का आक्रोश है उसे ऊंची जातियों के उस आक्रोश से जोड़ कर देखा जाना चाहिए जो पिछले कुछ दिनों से दिख रहा है. भारत में आज़ादी के बाद से कुछ मूल्यों को मुख्यधारा के मूल्य मान लिया गया था , जैसे जातिगत या लैंगिक भेदभाव को गलत माना गया था और सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़े समूहों को बराबरी के स्तर पर लाने को आज़ाद भारत के समाज का एक मुख्य उद्देश्य माना गया था. इन आदर्शों की दिशा में धीरे धीरे झटके खाते ही सही, लेकिन तरक़्क़ी हो रही थी. फिर भी ऐसा नहीं था कि इन आदर्शों के सब समर्थक थे. परंपरा के नाम पर जातिभेद और महिलाओं के साथ गैरबराबरी के समर्थक काफी लोग थे लेकिन उनकी आवाज़ हाशिये पर थी. चूंकि संघपरिवार धर्म और परंपरा की दुहाई देने वाले संगठनों का परिवार है इसलिए ऐसे प्रतिगामी तत्व उसके साथ ज्यादा थे. जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तो इन्हें लगा कि यह तो अपनी सरकार है , इसलिए उनमें ऊंची आवाज़ में अपनी बात कहने का आत्मविश्वास पैदा हो गया.

हालांकि राजनैतिक गणित ऐसा है कि किसी भी सरकार को पिछड़े समूहों का पैरोकार होना ही पड़ेगा. इसीलिए आरक्षण और दलित उत्पीड़न क़ानून को लेकर इस सरकार भी को बार बार एक प्रगतिशील रुझान दिखाना पड़ता है, और इसे लेकर ऊंची जातियों में कुछ नाराज़गी भी दिख रही है. लेकिन इतिहास की धारा कुछ अटक ज़रूर सकती है लेकिन उसकी दिशा बदल नहीं सकती. गंगा गंगोत्री से समुद्र की ओर ही बहेगी, समुद्र से गंगोत्री की ओर उसका प्रवाह नहीं हो सकता.