राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद मामला एक बार फिर देश की राजनीति का केंद्र बनता दिख रहा है. वैसे तो हर साल छह दिसम्बर के आसपास इस मुद्दे को उछाला जाता है, लेकिन चुनावों के चलते इस बार की गहमागहमी कुछ ज़्यादा है. इतनी कि केंद्र की सत्ता में आने से पहले और अपने कार्यकाल के दौरान बार-बार ‘विकास और केवल विकास’ की बात कहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी आख़िरकार इस पर बात करने से नहीं चूके. तमाम मीडिया व राजनीतिक विशेषज्ञों के अलावा भाजपा के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी भी दावा कर रहे हैं कि अगले लोकसभा चुनाव में ‘विकास’ नहीं हिंदुत्व का नारा चलेगा. यानी जहां 2014 में भाजपा के घोषणापत्र में राम मंदिर बनाने का वादा काफ़ी नीचे था, वहीं इस बार के आम चुनाव में पार्टी इसे अपने शीर्ष चुनावी वादों में शामिल कर सकती है.

इस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया की हलचल भी इस ओर ही इशारा करती है कि भाजपा और उसके वैचारिक सहयोगी (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद व साधु-संत समाज) अगले आम चुनाव में एड़ी-चोटी के ज़ोर के साथ ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ का नारा लगाने वाले हैं. वहीं, राजनीतिक व धार्मिक संगठनों के नेताओं के बयानों के अलावा ‘निठल्ला चिंतन’ भी जमकर किया जा रहा है. इसका मक़सद अगले लोकसभा चुनाव में जनभावना को भाजपा की तरफ़ झुकाना लगता है. इसके तहत अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर बनाए जाने के पक्ष में कई पोस्ट फ़ेसबुक, ट्विटर व अन्य सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों पर शेयर किए जा रहे हैं. जैसे :

1- एक निठल्ले चिंतन में भाजपा विरोधी दलों पर निशाना साधा गया है. इसमें सवाल किया गया है कि हिंदू होते हुए भी इन दलों के नेता राम मंदिर के मुद्दे पर भाजपा पर तंज़ क्यों कसते हैं. यह निठल्ला चिंतन इस तर्क के साथ भाजपा के पक्ष में हवा बनाने की कोशिश करता है कि भले ही भाजपा अभी तक मंदिर नहीं बना पाई लेकिन, उसने और विश्व हिंदू परिषद ने कम से कम हिंदू अस्मिता पर ‘कलंक’ की तरह खड़ी बाबरी मस्जिद तो तोड़ दी.

दरअसल निठल्ले चिंतकों ने प्रयास किया है कि न सिर्फ़ राम मंदिर को लेकर भाजपाई प्रतिबद्धता के प्रति लोगों का विश्वास बनाए रखा जाए, बल्कि यह भी जताया है कि अगर भाजपा सत्ता से गई तो मंदिर आज क्या, कभी नहीं बनेगा. लेकिन इस चक्कर में कुछ गड़बड़ भी हो गई है. इस निठल्ले चिंतन में जिन राजनीतिक दलों को निशाना बनाया गया है उनमें शिव सेना भी शामिल है. वह राम मंदिर बनाए जाने का समर्थन तो कर रही है, लेकिन इस मुद्दे पर भाजपा को घेरने से भी नहीं चूक रही. यही वजह है कि इस निठल्ले चिंतन में उसके लिए भी ‘धूर्त हिंदू’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है. इससे साबित होता है कि यह भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने के लिए वायरल किया गया है.

वहीं, वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल को राम मंदिर के ख़िलाफ़ पैरवी करने वाला वकील बताया गया है. हालांकि सिब्बल ने इस बारे में साफ़ किया है कि वे इस मामले में पिछले कई महीनों से सुप्रीम कोर्ट में पेश ही नहीं हुए हैं.

2- एक और निठल्ले चिंतन में राम मंदिर से देश को होने वाले फ़ायदे गिनाए गए हैं. इसके मुताबिक़ राम मंदिर बनने के बाद उत्तर प्रदेश का पर्यटन कारोबार बढ़ेगा जिससे हज़ारों नहीं, लाखों भी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों को रोज़गार मिलेगा. बिलकुल वैसे, जैसे अमरनाथ या वैष्णो देवी (निठल्ले चिंतन के मुताबिक़) में लोगों को रोज़गार मिला हुआ है. यह निठल्ला चिंतन ये दावा भी करता है कि राम मंदिर बनने के बाद सैकड़ों अस्पताल बन जाएंगे जहां मुफ़्त इलाज होगा. लाखों लोगों को हर दिन मुफ़्त का खाना भी मिलेगा. उत्तर प्रदेश समेत पूरे भारत की अर्थव्यवस्था मज़बूत हो जाएगी, बिलकुल सऊदी अरब की तरह. और ‘और भी बहुत कुछ मिलेगा’ जिसका ज़िक्र करना इस निठल्ले चिंतन के चिंतक को याद नहीं रहा.

वैसे इसमें यह नहीं बताया गया कि मंदिर की वजह से होने वाली कमाई का हिसाब-किताब कौन रखेगा. भारत में मंदिरों व अन्य धार्मिक स्थलों को टैक्स का ब्यौरा देने से छूट मिली हुई है. मोदी सरकार ने घोषणा की थी कि वह मंदिरों में दान के रूप में आने वाली रक़म का ब्यौरा नहीं मांगेगी. यानी मंदिर आसानी से दान की रक़म बदलवा सकेंगे और आयकर विभाग उनसे जानकारी नहीं मांगेगा. भारत में इनकम टैक्स देने वालों की संख्या दस प्रतिशत भी नहीं है. भगवान में आस्था रखने वाले और रोज़ मंदिर जाने वाले करोड़ों लोग टैक्स नहीं भरते, जबकि सरकारें जनकल्याण के कार्यक्रम चलाने के लिए काफ़ी हद तक इसी पैसे पर निर्भर रहती हैं.

लेकिन जब मंदिरों को टैक्स से छूट मिली हुई है तो राम मंदिर का पैसा लोगों के रोज़गार, इलाज, भोजन के लिए कैसे लगेगा. वैसे भी मंदिर में दान के रूप में आने वाली रक़म का बड़ा हिस्सा मंदिर के ही रखरखाव के नाम पर चला जाता है. तिरुपति, वैष्णो देवी, शिरडी आदि लगभग सभी जगह यही हाल है. ये सभी प्रसिद्ध मंदिर हैं और भक्तों की इनमें अटूट आस्था है. करोड़ों-अरबों रुपयों का दान आता है. लेकिन कोई सवाल करे कि इनकी वजह से जनकल्याण के लिए क्या काम हुए हैं तो यही बात दोहरा दी जाती है कि आस्था पर सवाल नहीं होते.

वैसे इस निठल्ले चिंतन के हिसाब से लोगों को खच्चरों का इस्तेमाल करना या देवी-देवताओं के लॉकेट बनाने और बेचने जैसे काम सीख लेने चाहिए. चूंकि (निठल्ले चिंतन के हिसाब से) इनकी संख्या करोड़ों में होगी, इसलिए तीर्थयात्रियों की संख्या भी करोड़ों में होनी चाहिए. यानी देश में और कोई काम नहीं होगा. केवल तीर्थयात्राएं होंगी. उनसे रोज़गार, चिकित्सा, अर्थव्यवस्था आदि से जुड़ी तमाम समस्याएं हल हो जाएंगी.

3- राम मंदिर के मुद्दे पर बेतुके तर्क देने का यह सिलसिला काफ़ी समय से यूं ही जारी है. वहीं, जब कोई तर्क नहीं बचता तो मंदिर निर्माण के समर्थक सऊदी अरब को बीच में ले आते हैं. इसकी वजह कई लोगों का यह मानना है कि विवादित स्थल पर न तो मंदिर बनना चाहिए और न ही वहां मस्जिद (जो अब नहीं है) रहनी चाहिए. वे कहते हैं कि इस जगह पर बच्चों के लिए स्कूल, खेल का मैदान या अस्पताल बनाया जा सकता है. इस पर निठल्ले चिंतक कहते हैं कि उन्हें विवादित स्थल पर राम मंदिर के अलावा और कुछ भी मंज़ूर नहीं है, और जिन्हें वहां अस्पताल बनवाना है वे पहले सऊदी अरब के मक्का-मदीना में अस्पताल बनवाएं. फ़ेसबुक-ट्विटर पर ऐसे अनेकों स्टेटस देखे जा सकते हैं.

यह निठल्ला चिंतन और ज़्यादा अंधाधुंध तरीक़े से तैयार किया गया है. ऐसा न होता तो इसमें मक्का-मदीना नहीं बल्कि काबा और मस्जिद अल-हरम का ज़िक्र किया जाता. दरअसल निठल्ले चिंतक जिन जगहों का ज़िक्र करना चाह रहे हैं वे मक्का-मदीना नहीं बल्कि काबा और मस्जिद अल-हरम हैं. मक्का और मदीना सऊदी अरब के दो शहर हैं और वहां कई अस्पताल हैं जहां विश्वस्तरीय चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं. यहां यह भी ध्यान रखना चाहिए कि काबा और मस्जिद अल-हरम को लेकर दुनियाभर के मुसलमानों के बीच शायद ही कोई मतभेद हों, जबकि राम जन्मभूमि व बाबरी मस्जिद मामले में मंदिर का समर्थन नहीं करने वालों में कई हिंदू भी शामिल हैं. इनमें भाजपा सांसद सावित्री बाई फुले भी शामिल हैं जो विवादित स्थल पर राम मंदिर नहीं बुद्ध का मंदिर बनाने की मांग कर रही हैं.