खगोलशास्त्री ‘आकाशगंगा’ (मिल्की-वे) केवल उसी गैलेक्सी को कहते हैं, जिसमें हमारी पृथ्वी और हमारे सौरमंडल सहित दूसरे अनगिनत सौरमंडल भी हैं. हमारी आकाशगंगा जैसी ब्रह्मांड की बाक़ी सभी संरचनाओं को ‘गैलेक्सी’ कहा जाता है. हिंदी में उन्हें ज्योतिर्माला कहना शायद सबसे उचित होगा. जहां रातों को सारा आकाश तारों से भरा दिखता हो, वहां हमारी आकाशगंगा का कुछ हिस्सा भी एक चमकीली पट्टी जैसा दिखाई पड़ सकता है.

लेकिन, हमारी आकाशगंगा, ब्रह्मांड की सबसे बड़ी ज्योतिर्माला न होते हुए भी इतनी विशाल है कि खगोलशास्त्री स्वयं आकाश में कहीं जाकर उसे देख नहीं सकते. उसे देखने-समझने के लिए यूरोपीय अंतिरक्ष एजेंसी ‘ईएसए’ ने 19 दिसंबर, 2013 को, ‘गाइए’ (जीएआईए- ग्लोबल एस्ट्रोमेट्रिक इन्टरफ़ेरोमीटर फ़ॉर एस्ट्रोफ़िज़िक्स) नाम का एक दूरदर्शी उपग्रह यानी वेधशाला (ऑब्सर्वेटरी) अंतरिक्ष में भेजा था.

हमारी आकाशगंगा दूसरी ज्योतिर्मालाओं को भी निगल चुकी है

2,030 किलो भारी इस उपग्रह ‘गाइए’ के माध्यम से खगोलविद हमारी आकाशगंगा के अनुमानतः 100 अरब तारों में से क़रीब एक अरब तारों का इस बारीक़ी से अध्ययन कर रहे हैं कि यह पता चल सके कि हमारी आकाशगंगा की उत्पत्ति कैसे हुई और उसका वर्तमान स्वरूप कैसे बना. यह दूरदर्शी उपग्रह पृथ्वी से क़रीब ढाई लाख किलोमीटर से लेकर सात लाख किलोमीटर तक की दूरी पर से उसकी परिक्रमा करते हुए हमारी आकाशगंगा के रहस्यों की टोह ले रहा है.

‘गाइए’ से मिले आंकड़ों का विश्लेषण करने वाली टीम की ओर से नीदरलैंड के ग्रोनिंगन विश्वविद्यालय की खगोलविद अमीना हेल्मी ने हाल ही में बताया है कि क़रीब 10 अरब वर्ष पूर्व हमारी आकाशगंगा और एक दूसरी ज्योतिर्माला के बीच कुछ इस तरह की टक्कर हुई कि हमारी आकाशगंगा उसे पूरी तरह निगल गई. इस टक्कर और डकार के निशान आज भी मिलते हैं. यह निष्कर्ष आकाशगंगा में 70 लाख तारों की सही-सही त्रि-आयामी (थ्री डी) स्थितियों और उनकी गतियों के विश्लेषण द्वारा निकाला गया है.

आकाशगंगा के ‘हालो’ कहलाने वाले उस लगभग गेंदाकार प्रभामंडल में, जो विरल गैसों के बीच छितरे-बिखरे तारों के गेंदनुमा गुच्छ-जैसा होता है, 30 हज़ार ऐसे तारे हैं जो बहुसंख्यक तारों की अपेक्षा उल्टी दिशा में गतिमान हैं. वे न केवल उल्टी दिशा में चल रहे हैं, उनके रासायनिक गुणधर्म भी बहुसंख्यक तारों से भिन्न हैं. इसी कारण ‘गाइए’ से जुड़े वैज्ञानिक यह मानते हैं कि वे हमारी आकाशगंगा में समा गई किसी दूसरी ज्योतिर्माला की देन हैं.

हालांकि खगोलशास्त्री काफ़ी लंबे समय से अटकलें लगाते रहे हैं कि हमारी आकाशगंगा में कभी कोई दूसरी ज्योतिर्माला भी समाई होगी. वहीं अमीना हेल्मी एक और जानकारी देती हैं, ‘हम यह अपेक्षा तो कर रहे थे कि आकाशगंगा के प्रभामंडल (हालो) में हमें उसमें समा गई ज्योतिर्मालाओं के निशान मिल सकते हैं. लेकिन हम यह अपेक्षा नहीं कर रहे थे कि प्रभामंडल के अधिकतर तारे एक बहुत बड़े संलयन यानी मेल से बने होंगे.’ इस प्रभामंडल में क़रीब 30 हज़ार एकल तारों के अलावा लाखों-करोड़ों तारों के आपस में संलयन से बने 13 बड़े-बड़े गेंदाकार ढेर भी मिले हैं.

हमारी आकाशगंगा को अब एक नए नज़रिए से देखा जा रहा है

ज्योतिर्मालाएं किसी मोटी तश्तरी जैसी दिखाई पड़ती है. ‘गाइए’ से मिले आंकड़ों का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्हें आकाशगंगा की उत्पत्ति को अब एक नए नज़रिए से देखना पड़ रहा है. तश्तरीनुमा आकार का वह हिस्सा, जो हमारी आकाशगंगा का मध्यवर्ती भाग है, अपने आप में दो हिस्सों बंटा हुआ है : एक पतले हिस्से में, जिसके नीचे अन्य चीजों के साथ-साथ उसकी कुंडलीदार बांहें दिखती हैं, और एक दूसरे, क़रीब दस गुना मोटे हिस्से में, जिसकी उत्पत्ति का स्रोत फ़िलहाल अज्ञात है. प्राप्त आंकड़ों के आधार पर किए गए कंप्यूटर अनुकरण यानी कंप्यूटर सिम्युलेशन यही दिखाते हैं कि यह मोटा हिस्सा किसी दूसरी ज्योतिर्माला के साथ टक्कर और विलय से ही बना होना चाहिए.

हमारी आकाशगंगा का व्यास (डायमीटर) क़रीब एक लाख प्रकाशवर्ष है (एक प्रकाशवर्ष = 94 खरब 60 अरब 73 करोड़ चार लाख 72 हज़ार 580.8 किलोमीटर). वैज्ञानिक मानते हैं कि ब्रह्मांड में ज्योतिर्मालाओं की टक्कर और उनका आपस में गुंथकर एकाकार हो जाना कोई एकल घटना नहीं है. ब्रह्मांड की गहराइयों में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं.

हमारी आकाशगंगा के साथ फिर कोई ज्योतिर्माला टकरा सकती है

हो सकता है कि हमारी आकाशगंगा के साथ भी यह पहली या अंतिम बार नहीं हुआ है कि दस अरब वर्ष पूर्व कोई दूसरी ज्योतिर्माला उससे टकराई. कंप्यूटर गणनाएं बताती हैं कि तीन से चार अरब वर्ष बाद हमारी आकाशगंगा के साथ एक बार फिर ऐसा ही हो सकता है. तब हमारी आकाशगंगा से 25 लाख प्रकाशवर्ष दूर की एंड्रोमेडा ज्योतिर्माला उससे टकराएगी.

एंड्रोमेडा इस समय क़रीब 120 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से हमारी आकाशगंगा की ओर बढ़ रही है. खगोलशास्त्री उसे ‘मेसियर31’ या संक्षेप में ‘एम31’ के नाम से पुकारते हैं. वह भी एक सर्पिल ज्योतिर्माला है. उसका व्यास हमारी आकाशगंगा के ढाई गुने से भी अधिक, यानी 2,60,000 प्रकाशवर्ष है. वह भी संभवत: पांच से नौ अरब वर्ष पूर्व दो ज्योतिर्मालाओं के टकराकर एक हो जाने से बनी है. उसके केंद्र में एक महाविराट ब्लैक होल और 26 अन्य ब्लैक होल बताए जाते हैं.

हमारे सौरमंडल से इस समय ‘डार्क मैटर’ का एक तूफान गुजर रहा है

इन्हीं दिनों पता चला है कि ब्लैक होल तो नहीं, पर उन्हीं के समान रहस्यमय डार्क मैटर (अदृश्य पदार्थ) का एक तूफ़ान हमारे सौरमंडल से हो कर गुज़र रहा है. इसका सुराग भी यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ईएसए के दूरदर्शी उपग्रह गाइए से पिछले वर्ष मिला था. अमेरिका में ज़ारागोज़ा विश्वविद्यालय के खगोलविदों की एक टीम का कहना है कि इस तूफ़ान की गति 500 किलोमीटर प्रति सेकंड है. वैज्ञानिक हमारे सौरमंडल में उसके होने का लाभ उठाकर जानने की कोशिश कर रहे हैं कि रहस्यमय डार्क मैटर आख़िर है क्या?

वैज्ञानिक वास्तव में 1930 वाले दशक से ही अदृश्य डार्क मैटर को जानने-समझने का कोई तरीका ढूंढ रहे हैं, पर सफलता अब तक हाथ नहीं लग पाई है. वे इतना ही जानते हैं कि हमारे ब्रह्मांड में जितना भी पदार्थ है, उसका 80 प्रतिशत अदृश्य डार्क मैटर के रूप में और जितनी भी ऊर्जा है, उसका 27 प्रतिशत डार्क एनर्जी (अबूझ ऊर्जा) के रूप में है.

डार्क मैटर की खोज करीब आठ दशक पहले शुरू हुई थी

एक स्विस वैज्ञानिक फ़्रित्स स्विकी ने 1933 में पहली बार कहा था कि ब्रह्मांड में कोई ऐसा पदार्थ भी है, जो हमारे लिए अदृश्य है, पर ब्रह्मांडीय पिंडों को प्रभावित कर रहा है. स्विकी ने पाया कि ‘कोमा’ नाम के गैलेक्सी-जमघट में ज्योतिर्मालाएं जिस तेज़ी से गतिमान हैं, वह अकेले दृश्यमान पदार्थ के गुरुत्वाकर्षण-बल का परिणाम नहीं हो सकता. यानी ब्रह्मांड में कोई ऐसा अदृश्य पदार्थ भी है जो इन ज्योतिर्मालाओं की गति बढ़ा रहा है. इस अदृश्य पदार्थ को समय के साथ डार्क मैटर कहा जाने लगा.

ब्रह्मांड में जो कुछ भी दृश्यमान है - पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, हमारा शरीर, हमारी पृथ्वी, सौरमंडल, तारे और ज्योतिर्मालाएं - वे सब अलग-अलग संख्या में इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन और प्रोटॉन कहलाने वाले मूलकणों के मेल से बने परमाणुओं (एटम) की देन हैं. जब भी कम से कम दो परमाणु आपस में जुड़ते हैं, तब उनके मेल से एक अणु (मॉलिक्यूल) बनता है. यानी, जब हम दृश्यमान पदार्थ की बात करते हैं तो वास्तव में इन्हीं अणुओं-परमाणुओं की बात कर रहे होते हैं. उन्हें आंखों से तो नहीं पर बहुत ही शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शियों से देखा जा सकता है.

पांच प्रतिशत से भी कम ब्रह्मांड दृश्यमान है

वैज्ञानिक कहते हैं कि अणुओं-परमाणुओं का हमारा यह सामान्य (बैरियॉनिक) भौतिक जगत ब्रह्मांड की संपूर्ण द्रव्यराशि (मास) के पांच प्रतिशत से भी कम के बराबर है! यानी, ब्रह्मांड की 95 प्रतिशत द्रव्यराशि किस तरह के अणुओं-परमाणुओं और किस प्रकार की ऊर्जा की बनी है, इसे न हम देख पाते हैं और न जान पाते हैं. चूंकि वैज्ञानिक उसके बारे में ठीक से कुछ जानते ही नहीं, इसलिए उसे ‘डार्क मैटर’ और ‘डार्क एनर्जी’ जैसे काल्पनिक नाम दे दिए गए हैं.

इसके साथ-साथ यह भी कल्पना की जा रही है कि ‘डार्क मैटर’ संभवत: किसी ऐसे मूलकण का बना हो सकता है, जिसकी अभी तक खोज नहीं हो पाई है. इस अज्ञात मूलकण को भी, जो इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन और प्रोटॉन कहलाने वाले हमें ज्ञात अब तक के मूलकणों और उनसे बने परमाणुओं के साथ कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाता, दो कामचलाऊ नाम भी दे दिए गए हैं - ‘विम्प’ (डब्लूआईएमपी- वीकली इन्टरऐक्टिव मैसिव पार्टिकल्स/क्षीण पास्परिक क्रिया वाले भारी कण) और ‘गिम्प’ (जीआईएमपी- ग्रैविटेश्नली इन्टरऐक्टिव मैसिव पार्टिकल्स/गुरुत्वीय पास्परिक क्रिया वाले भारी कण).

अमेरिका में ज़ारागोज़ा विश्वविद्यालय के खगोलविदों की एक टीम को जैसे ही पता चला कि गाइए ने सौरमंडल में ‘डार्क मैटर’ जैसे किसी तूफ़ान के पहुंचने के संकेत दिए हैं, पूरी टीम यह पता लगाने में जुट गई कि ‘एस1’ नाम का यह अंतरतारकीय तूफ़ान पृथ्वी पर उनके डिटेक्टरों के साथ क्या कोई प्रतिक्रिया दिखाएगा. उनका कहना है कि इस तूफ़ान की द्रव्यराशि हमारे सूर्य वाले अणुओं-परमाणुओं की संपूर्ण द्रव्यराशि के 10 अरब गुने के बराबर है. यानी, अकेले इस तूफ़ान में निहित अदृश्य पदार्थ इतना भारी है कि उससे 10 अरब सूर्यदेव बन सकते हैं!

अकल्पनीय हल्के ‘एक्सअयन’ डार्क मैटर की गुत्थी सुलझा सकते हैं

ज़ारागोज़ा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक आशा कर रहे हैं कि डार्क मैटर वाला ‘एस1’ तूफ़ान ‘एक्सअयन’ नाम के उनके डिटेक्टर पर अपना कोई न कोई निशान छोड़ जाएगा. ‘एक्सअयन’ वास्तव में ऐसे काल्पनिक मूलकण हैं, जो सामान्य परमाणुओं के इलेक्ट्रॉन कणों से भी 50 करोड़ गुना हल्के बताये जा रहे हैं. वैज्ञानिकों का समझना है कि ‘एक्सअयन’ इतने अकल्पनीय हल्के हैं कि किसी शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र के प्रभाव में आते ही वे प्रकाश के फ़ोटॉन कणों में बदल जायेंगे, जिन्हें उनके डिक्टेटर तुरंत दर्ज कर लेंगे.

यदि ऐसा हुआ तो इसे ‘डार्क मैटर’ के होने की पहली प्रत्यक्ष पुष्टि मना जा सकता है. हालांकि अभी तक तो ऐसा हो नहीं पाया है. ज़ारागोज़ा के वैज्ञानिक तब भी आशा छोड़ नहीं रहे हैं. वे कहते हैं कि डटे रहने तथा और अधिक संवेदनशील डिटेक्टर तकनीक तैयार करने से अदृश्य ‘डार्क मैटर’ की बनावट का कुछ न कुछ रहस्य खुल ही जाएगा.

‘डार्क मैटर’ से ‘डार्क एनर्जी’ और अधिक अंधेरे में

वैज्ञानिक ‘डार्क मैटर’ को लेकर जितने अंधेरे में हैं, उससे भी अधिक ‘डार्क एनर्जी’ को लेकर अंधेरे में हैं. ‘डार्क एनर्जी’ के बारे में कोई भरोसेमंद व्य़ाख्या उपलब्ध नहीं है, हालांकि 1998 के बाद से उसके अस्तित्व को लेकर कोई संदेह भी नहीं है. एक अटकल यह है कि वह अब तक ज्ञात चार मूलभूत शक्तियों - गुरुत्वाकर्षण शक्ति, विद्युत-चुम्बकीय शक्ति, परमाणु के मूलकणों के बीच की क्षीण और प्रबल शक्ति – के अलावा शायद एक पांचवीं ऐसी मूलभूत शक्ति है, जो किसी तरल पदार्थ की तरह संपूर्ण ब्रहमांड में सर्वत्र व्याप्त है.

वैज्ञानिकों के एक दूसरे वर्ग का कहना है कि यह अबूझ शक्ति वास्तव में उस ब्रह्मांडीय स्थिरांक (कॉस्मोलॉजिकल कांस्टेन्ट) से मेल खाती है, जिसे सामान्य सापेक्षतावाद के अपने समीकरण को फिट बैठाने के लिए अल्बर्ट आइनश्टाइन ने सुझाया था. आइनश्टाइन का कहना था कि यह स्थिरांक एक ऐसी प्रतिकर्षण-शक्ति का द्योतक है, जो गुरुत्वाकर्षण के विपरीत दिशा में काम करते हुए ब्रह्मांड को अपने भीतर सिमटकर नष्ट होने से रोकती है.

ब्रह्मांड निरंतर फैल रहा है

तथ्य भी यही है कि ब्रह्मांड सिकुड़ नहीं, लगातार बढ़ती हुई गति से फैल रहा है. पिछले दो दशकों से डार्क एनर्जी को ही ब्रह्मांड को फैलाने वाली मुख्य शक्ति माना जाता है. वह डार्क मैटर के गुरुत्वाकर्षण वाले प्रभाव के उल्टी दिशा में काम कर रही है. लेकिन यह कोई नहीं जानता कि डार्क एनर्जी हमारे ब्रह्मांड को हमेशा फैलाती ही रहेगी या ब्रह्मांड का फैलना कभी रुकेगा भी. ब्रह्मांड के लगातार फैलते जाने का यह भी मतलब है कि दिक और काल (टाइम एंड स्पेस) भी बढ़ रहे हैं. आकाशीय पिंडों के बीच की दूरियां बढ़ रही हैं. यानी इस ब्रह्मांड में कुछ भी स्थिर नहीं है.