बहुत, बहुत, बहुत ही अच्छा लगता है जब नसीरुद्दीन शाह छोटी, प्यारी, अंजान और दिल को छू लेने वाली कहानियों का हिस्सा बनते हैं! क्योंकि वक्त ऐसा मनहूस चल रहा है कि हिंदी सिनेमा के ज्यादातर स्थापित कलाकार व मशहूर सितारे प्लॉट-ड्रिवन सिनेमा से कन्नी काटते हैं और धन की अथाह वर्षा करने वाले कैरेक्टर-ड्रिवन सिनेमा का ही हिस्सा बनना चाहते हैं.

कैरेक्टर-ड्रिवन वह सिनेमा होता है जिसमें हमारे यहां कहानियों को किरदारों - यानी कि प्रतिष्ठित सितारों - के इर्द-गिर्द घूमने पर मजबूर किया जाता है. प्लॉट-ड्रिवन, वह सिनेमा जिसमें कितने भी शक्तिशाली सितारे हों वे कहानी के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं और प्लॉट की मांग अनुसार खुद को निर्देशक के हाथों में सौंप देते हैं. अच्छा क्वालिटी सिनेमा ज्यादातर ही प्लॉट-ड्रिवन फिल्मों से निकल कर आता है. कई कैरेक्टर-ड्रिवन फिल्में भी बेहद कमाल की होती हैं, लेकिन हमारा बॉलीवुड इस तरह के सिनेमा को केवल सुपरस्टारों के नायकत्व के शो-ऑफ में जाया करता है.

‘रोगन जोश’ मुख्यत: एक प्लॉट-ड्रिवन लघु फिल्म है. वाहवाही पाने के लिए लघु फिल्मों से जुड़ने वाले स्थापित सितारे - नसीर साहब की पीढ़ी वाले सितारे भी - ऐसी शॉर्ट फिल्मों से जुड़ना नहीं पसंद करेंगे जिसमें वे केवल एक सटल पात्र बनकर रह जाएं. लेकिन यही नसीर साहब की खूबी है कि वे प्लॉट-ड्रिवन कहानियों के प्रति फिल्मों, लघु फिल्मों व थियेटर जैसे मुख्तलिफ मीडियमों में हमेशा से आकर्षित रहे हैं. कई बार इस वजह से खराब फिल्मों में भी काम करना स्वीकार लेते हैं, लेकिन उनका यही विद्रोही नजरिया उन्हें महानायक अमिताभ बच्चन से आगे का ‘कला को समर्पित कलाकार’ बनाता है. हमें ‘अ वेडनसडे’ व ‘वेटिंग’ जैसी दुर्लभ प्लॉट-ड्रिवन फिल्में देता है तो ‘इंटीरियर कैफे नाइट’ जैसी छोटी-सी, प्यारी-सी लघु फिल्म भी.

‘रोगन जोश’ में खाने की मेज पर एक परिवार और उस परिवार के मुखिया का दोस्त साथ बैठते हैं और मटन रोगन जोश का आनंद लेते हैं. ताज होटल में शेफ रहा मुखिया (नसीरुद्दीन शाह) अपने बेटे के वक्त पर न आने से खफा है और पत्नी की मोहब्बत की वजह से ठीक से अपनी नाराजगी दिखा भी नहीं रहा है. उसका दोस्त अपनी जवान महबूबा के साथ रोगन जोश का मजा लेने आया है, वह जो कि खुद वेगन है! बातचीत का सिलसिला जल्द ही सरपट दौड़ने लगता है लेकिन थोड़ी ही देर में वहां पहुंचता है जिस जगह की आप कल्पना भी नहीं कर रहे होते. आपकी कुर्सी आपको कसमसाते हुए महसूस करती है और ‘ऑन योर फेस’ सिनेमा के दौर में आप एक संवेदनशील शॉर्ट से रूबरू होते हैं.

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जो दर्शक सिनेमा थोड़े भी ध्यान से देखने के आदी हैं, वे शुरुआती दृश्यों में रुकी हुई दीवार घड़ी देखकर समझ गए होंगे कि जो यह लघु फिल्म दिखा रही है केवल उतना ही हमें नहीं देखना है. लेकिन यह इस लघु फिल्म की खासियत कही जाएगी कि दर्शकों के दिमाग में यह बीज ‘खुद’ बोने के बावजूद वो इतनी समझदारी से लिखी गई है कि ट्विस्ट आने पर बेहद असरदार सिद्ध होती है. किसी अनगढ़ हाथों में ‘भूत’ और ‘भावुकता’ युक्त यह कहानी आसानी से असंवेदनशील या हास्यास्पद हो सकती थी, लेकिन युवा फिल्मकार संजीव विग का सधा हुआ निर्देशन इसे ऐसी किसी काई पर फिसलने नहीं देता.

खाने की मेज पर सजे रोगन जोश को भी केवल प्रतीकात्मक तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि आखिर में मामूली नजर आ रहे पात्रों के माध्यम से बेहद गहरी बात कही जाती है. खौफनाक वक्त और उसमें फना हुईं जिंदगियों को याद कराने के बावजूद ‘होप’ (उम्मीद) पर खुद को खत्म करना आसान नहीं होता है. कई बार फीचर फिल्मों में ऐसा करना गिमिक्री ज्यादा लगता है लेकिन यहां दर्शकों के बैठ चुके दिल को यह उम्मीद थोड़ी राहत देती है. नसीरुद्दीन शाह का सदैव पछतावे से भरा चेहरा जहां दर्शकों के मन में गहरी टीस पैदा करता है, वहीं अंत में प्रेशर कुकर के ढक्कन का दोबारा खुलना और अच्छे बने रोगन जोश को देखकर एक अनजान चेहरे का दमक उठना दर्शकों के चेहरे पर हल्की मुस्कान बिखेर देता है.

हर त्रासदी पर विजय पा लेने का जज्बा मुंबई की खासियत कही जाती है. निर्देशक संजीव विग ने 26/11 के मुंबई आतंकी हमलों की दसवीं बरसी के दिन 26/11 पर ही रिलीज हुई अपनी शॉर्ट फिल्म में इसी विचार को बखूबी रेखांकित किया है. और यह भी, कि आतंकी घटनाएं केवल खबरें नहीं होतीं, बल्कि खाने की मेज से लगीं कई कुर्सियों को हमेशा के लिए खाली कर जाती हैं.