मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए मतदान संपन्न हो चुका है. 230 विधानसभा सीटों वाले इस सूबे में चुनाव प्रचार का आखिरी चरण आते-आते एक नई बात दिखी. ऐसा लगा मानो सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने इस चुनाव को लेकर अपनी उम्मीदें छोड़ दी हैं. अब मतदान में पिछली बार के मुकाबले तीन फीसदी बढ़ोतरी के बाद एक वर्ग द्वारा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की वापसी की राह मुश्किल बताई जा रही है. यही स्थिति 200 सीटों वाले राजस्थान में भी दिख रही है. यहां भी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के लिए एक और कार्यकाल हासिल करना बेहद मुश्किल दिखने लगा है.

दरअसल, मध्य प्रदेश और राजस्थान को लेकर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की उदासीनता का सबसे बड़ा प्रतीक यह है कि इन दोनों राज्यों में प्रधानमंत्री की काफी कम रैलियां हुईं. मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य में प्रधानमंत्री की 10 रैलियां प्रस्तावित थीं. राजस्थान में भी नरेंद्र मोदी की कुल 10 रैलियां होनी हैं. लेकिन इन दोनों राज्यों की जमीनी राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए ये रैलियां नाकाफी बताई जा रही हैं.

पारंपरिक तौर पर तो विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री की इतनी रैलियों को भी काफी अधिक कहा जाता लेकिन, नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद से इस पारंपरिक शैली को बदल दिया है. भारत में कई प्रधानमंत्री ऐसे हुए हैं जो विधानसभा चुनावों में प्रचार के लिए नहीं जाते थे. भाजपा के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी विधानसभा चुनावों में खासा जोर नहीं लगाते थे.

लेकिन इस मामले में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैली बिल्कुल अलग है. 2014 में वे प्रधानमंत्री बने. उसी साल महाराष्ट्र, हरियाणा, जम्मू कश्मीर और झारखंड में चुनाव हुए. इन चारों राज्यों में नरेंद्र मोदी ने कई रैलियों को संबोधित किया. इसका फायदा इन चारों राज्यों में भाजपा को मिला और वह सत्ता पर काबिज हुई. लेकिन बड़े पैमाने पर नरेंद्र मोदी की सभाओं का सिलसिला शुरू हुआ 2015 की शुरुआत में हुए दिल्ली विधानसभा से. अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी की चुनौतियों से निपटने के लिए भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कई सभाएं आयोजित कराईं. हालांकि, इसके बावजूद भाजपा को बहुत दिल्ली में बहुत बुरी हार का सामना करना पड़ा.

इसके तकरीबन दस महीने बाद हुए 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों में तो प्रधानमंत्री मोदी ने तकरीबन तीन दर्जन रैलियां की थीं. उत्तर प्रदेश के चुनावों में भी वे ऐसे ही सक्रिय थे. अपने गृह राज्य गुजरात के विधानसभा चुनावों में भी उन्होंने तकरीबन तीन दर्जन रैलियां कीं. गुजरात मे सरकार बचाने में भाजपा के कामयाब होने की असली वजह के तौर पर प्रधानमंत्री की रैलियों को देखा गया. खुद गुजरात भाजपा के नेता अनौपचारिक बातचीत में स्वीकार करते हैं कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आखिरी दौर में गुजरात में ताबड़तोड़ सभाएं नहीं की होतीं तो भाजपा चुनाव हार जाती और लंबे समय बाद गुजरात की सत्ता में कांग्रेस की वापसी हो जाती.

लेकिन पहले के इन चुनावों के मुकाबले अभी हो रहे मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनावों में प्रधानमंत्री की उतनी सक्रियता नहीं दिख रही. जबकि 2019 के लोकसभा चुनावों के तकरीबन छह महीने पहले हो रहे पांच राज्यों के ये विधानसभा चुनाव राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी बेहद अहम माने जा रहे हैं. इनमें भी हिंदी पट्टी के तीन राज्यों, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा सत्ता में है और उसे अपनी सरकार बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. इन तीनों राज्यों में कोई मजबूत क्षेत्रीय पार्टी नहीं है और एक तरह से भाजपा का मुकाबला सीधे कांग्रेस से ही है. ऐसे में माना जा रहा है कि अगर इन राज्यों में कांग्रेस को सफलता मिलती है तो 2019 लोकसभा चुनावों के लिहाज से विपक्ष को नरेंद्र मोदी और भाजपा के खिलाफ गोलबंद करने में कांग्रेस की स्थिति थोड़ी और मजबूत होगी.

इन चुनौतियों के बावजूद मध्य प्रदेश और राजस्थान में प्रधानमंत्री मोदी की इतनी कम रैलियों का मतलब यही निकाला जा रहा है कि उन्हें भी इस बात का अहसास है कि इन दोनों राज्यों में भाजपा के लिए सत्ता में वापसी आसान नहीं है. राजस्थान के बारे में तकरीबन हर चुनावी सर्वेक्षण यही कह रहा है कि यहां कांग्रेस की जीत की काफी अधिक संभावना है. वहीं मध्य प्रदेश के बारे में भी जमीनी स्थिति यही बताई जा रही है कि भाजपा को कांग्रेस से कड़ी चुनौती मिल रही है और चुनावी नतीजे किसी भी ओर जा सकते हैं.

मध्य प्रदेश और राजस्थान में प्रधानमंत्री की कम रैलियों को इन राज्यों में जीत को लेकर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के कम आत्मविश्वास से इसलिए भी जोड़ा जा रहा है कि अपेक्षाकृत कम सीटें होने के बावजूद छत्तीसगढ़ में प्रधानमंत्री ने अच्छा-खासा समय दिया. कई चुनावी सर्वेक्षण ऐसे आए हैं जिनमें छत्तीसगढ़ में भाजपा की जीत के अनुमान लगाए गए हैं. मध्य प्रदेश और राजस्थान के मुकाबले छोटा राज्य होने और काफी कम लोकसभा सीटें होने के बावजूद छत्तीसगढ़ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच चुनावी रैलियां कीं. चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले भी उन्होंने छत्तीसगढ़ में कुछ सभाएं की थीं. कुछ लोग यह कह रहे हैं कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भी छत्तीसगढ़ की सत्ता में वापसी की उम्मीद है. लेकिन मध्य प्रदेश और राजस्थान में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने चुनाव प्रचार को लेकर जो रुख अपनाया उसके आधार पर यह कहा जा रहा है कि खुद भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी इन दोनों राज्यों में जीत को लेकर आश्वस्त नहीं है.