चुनाव मतलब ऐसी प्रक्रिया जिसके द्वारा बहुत से लोग मिलकर अपना प्रतिनिधि चुनते हैं. पहले जहां बैलेट पेपर पर मोहर लगाकर वोट डालना ही चुनाव का तरीका होता था, वहीं अब मतदान को सुरक्षित और गोपनीय बनाये रखने के लिए बैलेट पेपर की जगह ईवीएम जैसी मशीनों ने ले ली है. ईवीएम का इस्तेमाल पहली बार नवंबर 1998 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली के कुल 16 विधानसभा क्षेत्रों में किया गया था और 2004 से इसका पूर्ण इस्तेमाल हो रहा है.

ईवीएम क्या है और यह कैसे काम करती है?

ईवीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल मतदान की प्रक्रिया को तेज और आसान बनाने के लिए किया गया. ईवीएम मशीनें बैलेट बॉक्स से ज्यादा आसान थीं और स्टोरेज, गणना आदि सब कुछ ज्यादा बेहतर होने की वजह से इनका इस्तेमाल शुरू हुआ. अब लगभग 15 सालों से ये भारतीय चुनावों का हिस्सा बनी हुई हैं.

ईवीएम में एक कंट्रोल यूनिट, एक बैलेट यूनिट और 5 मीटर की एक केबल होती है. मशीन बैटरी से चलती है. इसकी कंट्रोल यूनिट मतदान अधिकारी के पास होती है जबकि बैलेट यूनिट का प्रयोग मतदाता करते हैं. जब तक मतदान अधिकारी कंट्रोल यूनिट से बैलेट का बटन प्रेस नहीं करेगा, बैलेट यूनिट से वोट डाल पाना नामुमकिन है. बैलेट यूनिट से एक बार वोट डाले जाने के बाद लोग चाहें जितनी बार भी बटन दबाएं, कोई फर्क नहीं पड़ता. मतदाता द्वारा एक बार बटन दबाने के बाद यानी और एक वोट लेते ही मशीन लॉक हो जाती है. इसके बाद सिर्फ नए बैलेट नंबर से ही खुलती है.

क्या ईवीएम हैक हो सकती है?

एक तरफ जहां ईवीएम का इस्तेमाल बढ़ा है वहीं दूसरी ओर विपक्षी पार्टियों द्वारा इसकी गोपनीयता और सुरक्षा पर सवाल उठाए गए हैं. ईवीएम में गड़बड़ी से जुड़े कई मामले भी सामने आए हैं. कई देशों में ऐसा पाया गया है कि ईवीएम मशीनें हैक की जा सकती हैं और मशीनों के जरिए वोटर की पूरी जानकारी भी निकाली जा सकती है. नतीजों में फेरबदल किया जा सकता है. ईवीएम मशीन इंटरनली किसी इंसान द्वारा भी बदली जा सकती है.

अमेरिका के लॉस वेगास में हर साल हैकिंग से जुड़ा एक इवेंट आयोजित होता है. इसमें एक से बढ़कर एक कम्प्यूटर विशेषज्ञ, वकील, पत्रकार, सिक्योरिटी एक्सपर्ट, हैकर और छात्र शामिल होते हैं. विश्व के इस सबसे बड़े इस वार्षिक हैकिंग सम्मलेन को ‘डेफॉन वोटिंग मशीन हैकिंग विलेज’ के नाम से भी जाना जाता है. इस सम्मेलन में ही एक हैकर ने अमेरिकन ईवीएम मशीन को महज आधे घंटे में हैक कर दिखाया. बताया जाता है कि इस ईवीएम का इस्तेमाल 2014 के स्थानीय चुनावों में हुआ था.

शारदा यूनिवर्सिटी में शोध और तकनीकी विकास विभाग में प्रोफेसर अरुण मेहता एक समाचार पत्र से बातचीत में कहते हैं, ‘ईवीएम में कंप्यूटर की ही प्रोग्रामिंग है और उसे बदला भी जा सकता है. आप इसे बेहतर बनाने की कोशिश कर सकते हैं. लेकिन, ये भी देखें कि हैकर्स भी बेहतर होते जा रहे हैं.’

ईवीएम कहां-कहां बैन कर दी गई है

आयरलैंड ने 51 मिलियन पाउंड खर्च करने और तीन साल की रिसर्च के बाद सुरक्षा और पारदर्शिता का हवाला देकर ईवीएम को बैन कर दिया. नीदरलैंड और जर्मनी का भी यही हाल रहा. इटली ने इसलिए ईवोटिंग पर पाबंदी लगा दी क्योंकि इनके नतीजों को आसानी से बदला जा सकता है. अमेरिका के कैलिफोर्निया और अन्य राज्यों ने ईवीएम का बिना पेपर ट्रेल के इस्तेमाल बंद दिया. इसके अलावा वेनेजुएला, मैसिडोनिया और यूक्रेन में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में कई तरह की गड़बड़ियां सामने आने के बाद इसका इस्तेमाल बंद कर दिया गया.

लेकिन, भारत में इस्तेमाल होने वाली ईवीएम अन्य देशों से अलग है

भारत में इस्तेमाल होने वाली ईवीएम अन्य देशों की मशीनों से अलग होती हैं क्योंकि बाहर की ईवीएम जहां नेटवर्क से जुड़ी होती हैं, वहीं भारतीय मशीनें पूरी तरह से ऑफलाइन चलती हैं. ईवीएम के नेटवर्क से जुड़े होने के कारण उसमें छेड़छाड़ की संभावना खत्म हो जाती है.

भारत में ईवीएम दो सरकारी कंपनियां- ‘भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड’ और ‘इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया’ बनाती हैं. ये कंपनियां ही उस सॉफ्टवेयर को भी बनाती हैं जो मशीन में लगी माइक्रोचिप में डाला जाता है. हालांकि, इसे चिप में डालती चिप निर्माता कम्पनी है. चिप में सॉफ्टवेयर डाले जाने के बाद इसकी कई बार जांच की जाती है. मशीन बनाने के स्तर पर गड़बड़ी तभी होगी जब ईवीएम में पहले से कोई ट्रोजन हो जो किसी खास उम्मीदवार को वोट ट्रांसफर कर दे. ऐसा होना संभव नहीं है क्योंकि कौन सी मशीन किस इलाके में भेजी जाएगी और वहां किस उम्मीदवार का नाम किस क्रम में होगा, यह पहले से तय नहीं होता है. इसके अलावा अब वीवीपैट (वोटर वैरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल) मशीनें भी आने लगी हैं जिससे वोटर यह जान सकता है कि उसने अपना वोट कहां दिया. इस अनुसार ईवीएम हैक होने की संभावनाएं न के बराबर रह जाती हैं.

ईवीएम के बारे में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इसके अब तक तीन मॉडल आ चुके हैं. पहला एम1 (1989-2006 में बनाई गई) जिसका पिछला उपयोग 2014 के आम चुनाव में हुआ था. इस मशीन में वीवीपैट नहीं होती. दूसरा एम2 मॉडल (2006-2012 में बनाई गई). इन मशीनों में इनक्रिप्शन, की प्रेस के साथ टाइम स्टैंपिंग की सुविधा होती है. 2013 के बाद बनाई गई मशीनें एम3 मॉडल की हैं. ये मशीनें किसी भी तरह की छेड़छाड़ या इनमें कोई डिवाइस लगाने पर अपने आप बंद हो जाती हैं. सुरक्षा के लिहाज से एम3 मॉडल वाली ईवीएम सबसे बेहतर हैं. इस समय हो रहे चार राज्यों के चुनाव में इन मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है और अगले लोकसभा चुनाव में भी इन्हीं मशीनों का इस्तेमाल किया जाएगा.

मतदान से पहले ईवीएम

मशीनों को मतदान के लिए भेजने से पहले कई काम होते हैं. सबसे पहले मशीनों को साफ किया जाता है, रिजल्ट क्लियर किए जाते हैं. स्विच, बटन और केबल की पूरी जांच होती है. मशीनें जाने से पहले मॉक मतदान होते हैं और रिजल्ट की जांच होती है. लगभग हजार वोट देकर रिजल्ट की प्रतियां अलग-अलग पार्टियों के प्रतिनिधियों को भेजी जाती हैं. मशीन के बैलट पेपर स्क्रीन में उम्मीदवारों के नाम, चुनाव चिन्ह, पार्टी के नाम आदि डालकर बैलट यूनिट को बंद कर दिया जाता है. इसके बाद बैलट यूनिट को कंट्रोल यूनिट से जोड़ा जाता है और कंट्रोल यूनिट को खोलकर कैंडिडेट सेट बटन दबाया जाता है. उसके बाद अंतिम कैंडिडेट के बटन को दबाया जाता है, ताकि यह पता चल सके कि इस मशीन में कितने उम्मीदवारों के नाम दर्ज हैं.

इस सब के बाद भी मतदान के दिन पोलिंग एजेंट, पर्यवेक्षक और अर्धसैनिक बल के अधिकारियों के सामने मशीन की चेकिंग की जाती है. मतदान समाप्त होने के बाद कंट्रोल यूनिट पर क्लोज का बटन दबा देते हैं. कुल वोटों की गिनती नोट की जाती है और मोहर लगाने के बाद उनका नंबर नोट किया जाता है. इसके बाद मशीनों को उनके बक्से में रखकर पुलिस बल की मौजूदगी में स्ट्रॉन्ग रूम में रखवा दिया जाता है.

इन तमाम सुरक्षा नियमों और तकनीकियों के बाद देश में ईवीएम हैक होने की संभावना न के बराबर है, मगर चूंकि चुनाव एक संवेदनशील मामला है, इसलिए कदम-कदम पर सावधानी बरतनी भी जरूरी है.