भारतीय विमानन सेक्टर इन दिनों चर्चा में है और इसकी सबसे बड़ी वजह है जेट एयरवेज. लगातार घाटे और धन के संकट से जूझ रही इस एयरलाइन से काफी दिनों से अच्छी खबर नहीं आई है. स्टाफ में कटौती से लेकर पायलटों को वेतन देने में देर होने जैसी दिक्कतों को लेकर सुर्खियों में रहने वाली जेट एयरवेज इस समय अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है. कंपनी की खस्ताहाल वित्तीय हालत के बीच इसकी बिक्री की चर्चायें तैर ही रही थीं कि एक खबर और यह आई कि नरेंद्र मोदी सरकार ने टाटा समूह से कहा है कि वह तंगहाली से जूझ रही जेट एयरवेज को खरीद ले.

सरकार की तरफ से इन खबरों का कोई खंडन भी नहीं आया है. टाटा प्रबंधन का भी कहना है कि इस दिशा में बातचीत हो रही है, लेकिन वह अभी बहुत प्रारंभिक स्थिति में है. विमानन या किसी भी सेक्टर में कंपनियों की खरीद-बिक्री या अधिग्रहण होते रहते हैं. सरकार उनके नियमन पर नज़र जरूर रखती है, लेकिन आमतौर पर वह ऐसी डील में मध्यस्थ जैसी भूमिका में नहीं आती है. बिजनेस जगत पर नज़र रखने वाले इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि क्या सरकार को इस तरह के समझौतों के बीच में आना चाहिए? यह भी पूछा जा रहा है कि जब कई विदेशी एयरलाइन इस समझौते मेें दिलचस्पी ले रही हैं, तो सरकार की पसंद टाटा ही क्यों है?

जानकार मानते हैं कि जेट का अधिग्रहण कौन करे इससे पहले सरकार के सामने यह सवाल था कि इस बीमार एयरलाइन को बचाया कैसे जाए. कंपनी जल्द से जल्द इस मुश्किल से निकल जाए सरकार की इस इच्छा के पीछे राजनीतिक मजबूरियां भी हैं जो चुनावी साल से जुड़ी उसकी दिक़्क़तों से जुड़ी हैं. सरकार की पहली चिंता है, इस धारणा को बरकरार रखना कि अर्थव्यवस्था बेहतर हालात में है. मोदी सरकार 2019 के आम चुनाव से पहले देश में अर्थव्यवस्था के हर सूचकांक के बेहतर होने का संदेश देना चाहती है. घरेलू और अंतरराष्ट्रीय वजहों से सरकार को इसमें पहले ही मुश्किल आ रही है. ऐसे में अगर जेट एयरवेज जैसी विमानन सेक्टर की बड़ी कंपनी डूब गई तो मोदी सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं.

जेट एयरवेज के ठप होने की स्थिति में पूरा विमानन सेक्टर लड़खड़ाएगा और मीडिया में बनने वाली सुर्खियां इस बात को मजबूत करेंगी कि अर्थव्यवस्था की हालत पतली है. जाहिर है चुनाव से ऐन पहले मोदी सरकार यह कतई नहीं चाहेगी. जानकार मानते हैं कि मोदी सरकार के जेट एयरवेज के मामले में दिलचस्पी लेने की यह प्रमुख वजह है.

इसके अलावा विमानन सेक्टर और एयर कनेक्टिविटी को लेकर मोदी सरकार लगातार अपनी उपलब्धियों का गुणगान करती रही है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में कह चुके हैं कि हवाई चप्पल पहनने वाला आदमी भी अब हवाई यात्रा कर सकता है. कई राज्यों में नए एयरपोर्ट और उड़ान सेवाओं को मोदी सरकार में विकास के रूप में प्रचारित किया गया है. ऐसे में जेट एयरवेज का लड़खड़ाना इस सारे प्रचार के खिलाफ जा सकता है.

सरकार नहीं चाहेगी कि ऐसा कुछ हो. लेकिन जेट एयरवेज को बचाने का अनुरोध टाटा से ही क्यों किया गया? यह पेंचीदा सवाल है. विमानन सेक्टर पर नज़र रखने वाले इस सवाल का हल भी राजनीतिक वजहों में ही खोजते हैं. जानकार मानते हैं कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं सरकार यह संदेश भी देना चाहती है कि उसकी नीतियां स्वदेशी कंपनियों को तरजीह देने वाली हैं. जेट का सौदा अगर किसी विदेशी एयरलाइन से हो जाता है तो यह धारणा टूट सकती है और आर्थिक नीतियों में स्वदेशी की पैरोकार लॉबी सरकार पर हमलावर हो जाएगी.

आर्थिक जानकार मानते हैं कि धीरे-धीरे स्वदेशी लॉबी व्यवस्था में अपनी ठीकठाक जगह बना चुकी है और आरएसएस से शह प्राप्त इस गुट पर भाजपा और मोदी सरकार का बहुत पुख्ता नियंत्रण भी नहीं है. एफडीआई में विदेशी निवेश से लेकर फ्लिपकार्ट-वॉलमार्ट जैसी डील का मुखर विरोध करती रही ये लॉबी अगर इस मामले में आलोचक हुई तो चुनावी साल में सरकार को काफी असहज होना पड़ सकता है. ऐसे में उद्योग जगत में टाटा संस से बेहतर ‘राष्ट्रीयता’ का प्रतिनिधि कौन हो सकता था! जानकारों के मुताबिक सरकार किसी दूसरे औद्योगिक घराने से भी इस तरह का अनुरोध कर सकती थी, लेकिन विपक्ष ऐसी किसी कोशिश को फिर अंबानी-अदानी जैसे जुमले से न जोड़ दे, इसलिए ऐसा करने से परहेज किया गया.

देशी-स्वदेशी से इतर विमानन सेक्टर में टाटा के अगुआ बनने की चाहत भी इस ‘सरकारी इच्छा’ की वजह मानी जा रही है. अगर जेट एयरवेज के साथ टाटा की डील हो जाती है तो एम्स्टरडम से लेकर बैंकाक तक के हवाई अड्डों पर उसके पार्किंग और लैंडिंग स्लॉट बढ़ जाएंगे और विस्तार की कंपनी की कोशिश रंग लाएगी. शायद इसी को भांपकर टाटा से जेट के भारी-भरकम कर्ज और एयरपोर्ट प्राधिकरण के बकाये में छूट की पेशकश भी की गई है.

जानकार मानते हैं कि सरकार की इस तेजी के पीछे यह डर भी है कि अगर कहीं जेट एयरवेज डूबी और वह अपनी बैंक देनदारियां न दे पाई तो यह मामला भी किंगफिशर के डूबने जैसा हो जाएगा. विजय माल्या के डिफाल्टर हो जाने के बाद लंदन भागने का मामला आज भी सरकार का पीछा करता है. जेट एयरवेज के मामले में ऐसा हुआ तो सरकार से सवाल-जवाबों का नया सिलसिला शुरू हो जाएगा. वैसे भी जेट एयरवेज के चेयरमैन नरेश गोयल दुबई में ही रहते हैं.

बात बनतेे-बनते न बिगड़ जाए

टाटा समूह ने माना है कि जेट एयरवेज को लेकर वह प्रारंभिक बातचीत कर रहा है. लेकिन ‘सरकारी इच्छा’ के बाद भी इसमें खासी अड़चनें आ रही हैं. यह दिक्कत टाटा और जेट एयरवेज दोनों तरफ से हैं. पहली दिक्कत है जेट की बैलेंसशीट. पिछले 11 सालों में जेट एयरवेज नौ साल घाटे में रही है. इसके अलावा जेट एयरवेज के चेयरमैन नरेश गोयल कंपनी पर अपना पूरा नियंत्रण छोड़ने को राजी नहीं हैं. कुछ जानकार टाटा समूह और नरेश गोयल के अहं के टकराव को भी डील में अड़चन मानते हैं. कहा जाता है कि यह 90 के दशक में तब से चला आ रहा है जब टाटा समूह लाख कोशिशों के बाद अपनी एयरलाइंस शुरू नहीं कर पाया था. फिलहाल ताज़ा खबर यह है कि नरेश गोयल टाटा के प्रस्ताव से खुश नहीं हैं और मदद के लिए यूएई की एयरलाइन एतिहाद एयरवेज की ओर देख रहे हैं.

इससे पहले भी एतिहाद ने जेट एयरवेज में 24 फीसद हिस्सेदारी खरीदकर उसकी आर्थिक मुश्किल दूर की थी. सूत्रों के मुताबिक एतिहाद एयरवेज के बड़े अधिकारियों के साथ नरेश गोयल की बैठक हुई है और इस प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है कि नरेश गोयल कंपनी में अपनी हिस्सेदारी 15 फीसद तक ला सकते हैं लेकिन वे कंपनी के चेयरमैन बने रहेंगे. एक चर्चा यह भी है कि गोयल अपनी हिस्सेदारी पांच फीसद तक घटा सकते हैं और बदले में कंपनी के बोर्ड मेें स्थायी निदेेशक बन सकते हैं. इसके बदले एतिहाद जेट एयरवेज के 49 फीसद का हिस्सेदार हो जाएगी और कंपनी का प्रबंधन उसके हाथ में अा जाएगा. बदले में वह जेट एयरवेज की आर्थिक मुसीबत दूर करेगी. जेट एयरवेज ने बांबे स्टाक एक्सचेंज को भी यह सूचना दी है कि वह फंड जुटाने के लिए निवेशकों से लगातार बात कर रही है. जेट एयरवेज को खरीदने की दौड़ में एतिहाद के अलावा एयर फ्रांस-केएलएम और डेल्टा एयरलाइंस भी हैं. ऐसे में देखना यह है कि विमानन सेक्टर की इस घमासान में सरकार की इच्छा चलती है या शुद्ध व्यावसायिक हित. जो भी हो यह सब खासा रोचक होने वाला है.