कभी संस्कृत को जतन से पालने-पोसने वाले कश्मीर में आज इसकी हालत ऐसी है कि कश्मीर यूनिवर्सिटी के संस्कृत विभाग में सबकुछ होने के बावजूद बस कमी है तो एक अदद छात्र की.
जून का महीना खत्म होने जा रहा है और पूरे देश में 12वीं पास करने वाले छात्रों के बीच कॉलेजों में प्रवेश को लेकर आपाधापी मची है. यही स्थिति जम्मू-कश्मीर में भी है. लेकिन यहां कश्मीर यूनिवर्सिटी का एक विभाग ऐसा भी है जहां पिछले दो साल से एक भी छात्र ने प्रवेश नहीं लिया. सबसे बड़ी विडंबना है कि यह उसी भाषा का विभाग है जो इसी भूभाग पर विकसित हुई और जहां इस भाषा का सबसे सुंदर साहित्य रचा गया. कश्मीर यूनिवर्सिटी का संस्कृत विभाग 1983 में काफी धूमधाम से शुरू हुआ था. 1990 में यहां के हालात बिगड़ने पर इसे बंद करना पड़ा. 2001 में यह फिर शुरू तो हो गया लेकिन तभी से छात्रों की कमी से जूझ रहा है.
अशोक के समय पूरे भारत में बौद्ध धर्म की मूल बातें पाली में लिखी जा रही थीं तब कश्मीर में पहली बार इस धर्म की शिक्षाएं संस्कृत में दर्ज हुईं
कश्मीर भारत में एकमात्र राज्य है जहां अतीत में सबसे लंबे समय तक न सिर्फ पठन-पाठन बल्कि संपर्क भाषा के रूप में भी संस्कृत का इस्तेमाल हुआ. इंग्लैंड के भाषा शास्त्री जॉर्ज ग्रिअर्सन पिछली सदी के शुरुआत में एक दस्तावेज में लिखते हैं, ‘बीते दो हजार सालों के दौरान कश्मीर संस्कृत के पठन-पाठन का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र रहा है. यहां संस्कृत में दार्शनिक विमर्श से लेकर श्रंगार कथाओं तक की रचना हुई.’
आज का कश्मीर देखकर इसपर यकीन करना मुश्किल है लेकिन इतिहासकार इसकी वजह सभ्यता के विकास में बताते हैं. आर्य सभ्यता के बारे में माना जाता है कि इसका विकास पूर्वी ईरान में हुआ और बाद में इसको मानने वाले लोग अफगानिस्तान-पाकिस्तान होते हुए गंगा के मैदान तक फैल गए. पंजाब से होकर आर्य सभ्यता कश्मीर घाटी में पहुंची. इन लोगों के साथ संस्कृत भाषा भी इस क्षेत्र में आ गई और तुलनात्मक रूप से ज्यादा प्रभावशाली आर्यों के इन वंशजों ने यहां के समाज में सस्कृत को प्रधान भाषा बना दिया. कश्मीर के 11वीं सदी के एक कवि बिल्हाना के शब्दों में, ‘कश्मीर में तो महिलाएं भी धाराप्रवाह संस्कृत और प्राकृत (संस्कृत के बाद की भाषाएं) में बात कर सकती हैं.’
सम्राट अशोक (300 से 200 ईसा पूर्व) के समय कश्मीर घाटी में बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ. उस समय इस क्षेत्र में संस्कृत की महत्ता इसी बात से समझी जा सकती है कि तब जहां पूरे भारत में बौद्ध धर्म की मूल बातें पाली में लिखी गईं वहीं कश्मीर में इसकी शिक्षाएं पहली बार संस्कृत में दर्ज हुईं. माना जाता है कि मध्य एशिया तक संस्कृत का प्रसार कश्मीरी बौद्धों ने ही किया था. उस समय न सिर्फ पूरे भारत से छात्र यहां संस्कृत पढ़ने आते थे बल्कि एशिया के दूसरे देशों के विद्वानों के लिए भी यह संस्कृत अध्ययन का बड़ा केंद्र था. चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी कश्मीर में रहकर ही संस्कृत के माध्यम से बौद्ध धर्म का अध्ययन किया था.
माना जाता है कि मध्य एशिया तक संस्कृत का प्रसार कश्मीरी बौद्धों ने ही किया था. उस समय  भारत ही नहीं बल्कि एशिया के दूसरे देशों के विद्वानों के लिए यह संस्कृत अध्ययन का बड़ा केंद्र था
कश्मीर यूनिवर्सिटी का संस्कृत विभाग
कश्मीर यूनिवर्सिटी का संस्कृत विभाग
संस्कृत व्याकरण के नियम बनाने वाले पाणिनी के बारे में ज्यादातर विद्वानों की राय है कि उनका जन्म ईसा से चौथी सदी पूर्व पाकिस्तान के खैबर पख्तून्ख्वा में हुआ था. लेकिन इतिहासकारों का एक वर्ग यह भी कहता है कि वे दक्षिण कश्मीर के गोद्रा गांव के थे. ऐसा न भी हो तो भी पाणिनी की अष्टाध्यायी (संस्कृत व्याकरण का प्राचीन ग्रंथ) पर सबसे ज्यादा टीका कश्मीर के विद्वानों ने ही लिखी हैं.
कश्मीर में संस्कृत 12वीं से 13वीं शताब्दी तक काफी प्रभावी रही. कल्हण का प्रसिद्ध राजतरंगणी इसी समय की रचना है. लेकिन इसी दौर में यहां इस्लाम का प्रभाव भी बढ़ने लगा. ईराक से आए सूफी मीर सैय्यद शमसुद्दीन के प्रभाव से कश्मीर में इस्लाम मानने वालों की आबादी तेजी से बढ़ी. उसके बाद से क्षेत्र में संस्कृत का प्रभाव घटने लगा. पिछली सदी आते-आते कश्मीरी पंडितों में भी संस्कृत का ज्ञान रखने वाले नाममात्र के लोग ही रह गए थे. प्राचीन भारतीय भाषाओं के अध्येता जॉर्ज बुहेलर (1837 से 1898) का एक दस्तावेज बताता है कि उन्होंने 1875 में कश्मीर की यात्रा की थी और तब उनकी 25 से ज्यादा संस्कृत बोलने वाले पंडितों से मुलाकात हुई और ऐसे दसियों सरकारी अधिकारी भी थे जो उस वक्त संस्कृत बखूबी समझ लेते थे. पिछली सदी में राजनीतिक उथलपुथल के चलते कश्मीर में इस भाषा के विकास पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया.
कश्मीर में संस्कृत के बचे रहने की सबसे बड़ी वजह पंडित थे लेकिन 1990 में उनके यहां से विस्थापन के साथ ही राज्य में इसके बचे रहने की आखिरी उम्मीद भी खत्म हो गई. 2001 में जब कश्मीर युनिवर्सिटी ने दोबारा संस्कृत विभाग शुरू किया तब से उसे छात्रों की कमी का सामना करना पड़ रहा है. 2013 में चार विद्यार्थियों ने यहां एमए संस्कृत में प्रवेश लिया था और ये सभी जम्मू के थे. 2014 में यहां किसी छात्र ने प्रवेश नहीं लिया और अब 2015 में हालात वैसे ही हैं. एक अखबार से बात करते हुए विभागाध्यक्ष जोहरा अफजल बताती हैं, ‘हम यहां संस्कृत के बारे में जागरूकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कुछ खास नहीं हो पा रहा.’ विभाग ने 2007 से 2012 के दरम्यान संस्कृत भाषा पर कई राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार भी करवाए हैं लेकिन इससे भी कोई खास फर्क नहीं पड़ा.
कश्मीर युनिवर्सिटी में छात्रों के नदारद होने का एक तकनीकी पक्ष यह भी है कि राज्य में कोई ऐसा कॉलेज नहीं है जहां स्नातक के स्तर पर संस्कृत पढ़ाई जाती हो. इस समय घाटी में जो हालात हैं उससे देश के दूसरे हिस्सों से लोग अब यहां संस्कृत पढ़ने आएं यह भी मुमकिन नहीं दिखता. यानी संस्कृत के संदर्भ में कहें तो फिलहाल कश्मीर की स्थिति दिया तले अंधेरा वाली है.