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नाजी सेना यानी जर्मन फौज, जिसके दम पर एडोल्फ हिटलर ने पूरी दुनिया फतह करने की ठानी थी, के बारे में बताया जाता है कि खुद को आर्यपुत्र मानने वाले ये सैनिक हिटलर की ही तरह पुरुषवादी थे. इनके अनुसार दुनिया में समलैंगिकता (बाईसेक्सुअल या गे) की कोई जगह ही नहीं थी. वैसे तो किसी भी पुरुष को महिलाओं के कपड़े में देखना आपको चौंकाता है लेकिन इस तरह की सोच वाले सैन्य समूह के सदस्य अगर महिलाओं के कपड़ों में दिखें तो दिमाग थोड़ी देर के लिए चकरा सकता है.

मार्टिन दम्मान नाम के एक फोटोग्राफर ने इन तस्वीरों को सैकड़ों एल्बम खंगालने के बाद ढूंढा है. दोयचे-वैले की इस वीडियो रिपोर्ट में मार्टिन बताते हैं कि ‘ये तस्वीरें नाजी सेना का एक बिल्कुल अलग रूप दिखाती हैं. आप इन लोगों में भावनात्मकता और सौम्यता साफ देख सकते हैं.’ उनका मानना है कि युद्ध के दौरान तनाव से कुछ पल के आराम के लिए ये लोग इस तरह से अपना मनोरंजन करते होंगे लेकिन इसके साथ ही मार्टिन इनमें से कुछ सैनिकों के समलैंगिक होने की संभावना भी जताते हैं. ऐसे में इतिहास के जानकारों के लिए एक नया सवाल पैदा होता है कि क्या नाजियों द्वारा समलैंगिकता का विरोध केवल ऊपरी दिखावा था? या फिर वाकई ये तस्वीरें केवल मनोरंजन और मजाक वाले कुछ पलों की गवाह हैं. इस तरह के सवालों के जवाब अब केवल वक्त के पन्नों में दर्ज हैं जिसका पता लग पाना अब मुश्किल लगता है.

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स्क्रोल की यह वीडियो रिपोर्ट आपको कानपुर के एक छोटे से गांव राजपुरवा की निवासी कलावती देवी से मिलवाती है. कलावती की कोशिशों ने आज कानपुर जिले के कई गांवों को खुले में शाैच से मुक्त कर दिया है. वे पिछले 35 वर्षों से खुले में शौच न करने के लिए लोगों को जागरुक कर रही हैं. इनके इस नेक प्रयास में ‘श्रमिक भारती’ नाम की एक गैर सरकारी संस्था ने इनका साथ दिया है. यह संस्था समाज में स्वच्छता और स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए काम करती है. कलावती देवी संस्था के सदस्यों के साथ मिलकर या अकेले भी लोगों के घर-घर जाकर उनसे शौचालय के बार में पूछती हैं और अगर किसी घर में शौचालय नहीं होता तो संस्था की या सरकारी मदद से वहां शौचालय बनवाती हैं. इस तरह कलावती देवी नारीवाद को सच्चे मायने देने वाली मिसाल कही जा सकती हैं. सालों पहले जब महिलाएं घर से निकलने तक में हिचकिचाती थीं, उस समय उन्होंने सामाजिक कल्याण का बीड़ा उठाया और उसे पूरा भी किया. आज भी वे अपने इस काम में लगी हुई हैं और साबित कर रही हैं कि फिलहाल देश को किसी भी स्वच्छता अभियान से ज्यादा ऐसी कई कलावतियों की जरूरत है.

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बांग्लादेश के कुतुपालोंग में बने दुनिया के सबसे बड़े रिफ्यूजी कैंप में रोहिंग्या शरणार्थी रहते हैं. इस कैंप में फिल्माया गया यह वीडियो सूचनाओं और खबरों की जरूरत की तरफ ध्यान खींचता है. इन बेघरबार लोगों तक जानकारी पहुंचाने का नेक काम कर रहे मोहम्मद युसुफ भी इनमें से एक हैं. उन्हें भी अगस्त, 2017 में म्यामांर में हुई जातीय हिंसा के बाद अपना देश छोड़कर इन कैंपों में आकर बसना पड़ा था. पहले पेशे से शिक्षक रहे युसुफ जानकारियों का महत्व जानते हैं और मानते हैं कि अगर लोगों को समय-समय पर जरूरी सूचनाएं मिलती रहेंगी तो बहुत सारी समस्याओं से निपटा जा सकता है.

इसके लिए मोहम्मद युसुफ काफी समय से यहां पर एक रेडियो स्टेशन खोलने की कोशिश में लगे हुए हैं. वे बताते हैं कि लोगों को भीड़ जमाए और उनके काम में दखल दिए बगैर जरूरी सूचनाएं देते रहने का काम रेडियो के जरिए आसानी से हो सकता है लेकिन सरकार से अनुमति ना मिलने और पूंजी के अभाव में वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं. फिलहाल वे अपनी जमा पूंजी और दोस्तों से कर्ज लेकर एक माइक और लाउड स्पीकर का ही इंतजाम कर पाए हैं. इसके जरिए वे लोगों तक प्रधानमंत्री के संदेश, भारी बारिश आने की संभावना और राशन के ट्रक आने जैसी सूचनाएं दो-चार सौ लोगों तक आसानी से पहुंचा पा रहे हैं.