नोटबंदी के दो साल पूरे हो जाने के बाद भारत के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) अरविंद सुब्रमण्यम ने इसे ‘अर्थव्यवस्था के लिए झटका’ बताया है. इस खबर को आज के कई अखबारों ने पहले पन्ने पर जगह दी है. उन्होंने कहा, ‘नोटबंदी एक सख्त मौद्रिक झटका था. इससे सात तिमाहियों में विकास दर नीचे खिसक कर 6.8 फीसदी पर आ गई, जो नोटबंदी से पहले आठ फीसदी थी.’ अरविंद सुब्रमण्यम ने अपनी किताब ‘ऑफ काउंसिल: द चैलेंज ऑफ द मोदी-जेटली इकॉनॉमी’ में लिखा है कि नोटबंदी के जरिए बाजार से 86 फीसदी मुद्रा हटा ली गई. इससे जीडीपी प्रभावित हुई थी.

मीटू अभियान के बाद 80 फीसदी पुरुष कार्यस्थल पर महिला सहकर्मियों के साथ अधिक सतर्क

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को लेकर शुरू किए गए मी टू अभियान का जमीन पर असर दिख रहा है. हिंदुस्तान ने मार्केट रिसर्च और एनालिसिस कंपनी वेलोसिटी एमआर की रिपोर्ट के हवाले से कहा है कि इस अभियान के बाद करीब 80 फीसदी पुरुष कार्यस्थल पर अपनी महिला सहकर्मियों के साथ अधिक सतर्कता बरत रहे हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक मी टू का महिला और पुरुष सहकर्मियों के बीच औपचारिक संवाद पर सबसे अधिक असर पड़ा है. वहीं, 83 फीसदी लोगों का मानना है कि कई गलत आरोप भी लगाए गए हैं. हालांकि, पांच में से चार का मानना है कि इस अभियान से सकारात्मक बदलाव होगा. इसके अलावा इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मी टू के अधिकतर मामले फिल्म जगत और मीडिया से सामने आए हैं. लेकिन, 77 फीसदी लोग अन्य क्षेत्र को भी सुरक्षित नहीं मानते हैं.

आप अपना काम पूरा नहीं करते और कोर्ट पर सवाल उठाते हैं : सुप्रीम कोर्ट

न्यायपालिका की आलोचना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाई है. नवभारत टाइम्स की खबर के मुताबिक शीर्ष अदालत ने जेलों में बंद कैदियों से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा, ‘आप (केंद्र) अपना काम पूरा नहीं करते. दूसरी तरफ अदालती कार्रवाई में समय लगने और इंसाफ में देरी की बात कर कोर्ट पर सवाल उठाते हैं.’ न्यायाधीश एमबी लोकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, ‘आप (सरकार) अपने लोगों से कहें कि अदालत की आलोचना बंद करें.’

अपराधी में सुधार की गुंजाइशन होने पर मौत की सजा नहीं : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा पर अहम टिप्पणी की है. राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित खबर के मुताबिक शीर्ष अदालत ने कहा है कि यदि किसी अपराधी में सुधार की गुंजाइश है तो उसे मौत की सजा नहीं दी जा सकती. न्यायाधीश कुरियन जोसेफ की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ का मानना है कि अदालत को अधिकतम सजा सुनाने से पहले मनोवैज्ञानिक जांच से सुधार की संभावनाएं तलाशनी होंगी.

उधर, दिल्ली हाई कोर्ट ने दंगों के दौरान प्रेस रिपोर्ट, फोटो और वीडियो को सबूत मानने का सुझाव दिया है. 1984 के सिख दंगों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान अदालत ने इसके लिए विशेष कानून की भी जरूरत बताई है. साथ ही, उम्मीद जताई है कि संसद इसके लिए जल्द ही कानूनी प्रावधान करेगी.