यह बात दूसरे विश्वयुद्ध की है. जर्मनी द्वारा पोलैंड पर हमला बोले जाने के दूसरे दिन बाद ही ब्रिटेन में ज़बर्दस्त उठापटक मच गयी. प्रधानमंत्री नेविल चैम्बेरलिन को दवाब के आगे झुकते हुए विंस्टन चर्चिल को फ़र्स्ट लार्ड ऑफ़ एडमिरैलिटी नियुक्त करना पड़ा. आज के संदर्भ में यह नियुक्ति रक्षा सचिव जैसी कही जा सकती है. चर्चिल को वही पद दिया गया जो पहले विश्वयुद्ध में उनके पास था. तब एक सैन्य कार्रवाई की विफलता के चलते वे इस पद से हटाये गए थे.

‘विनी इस बैक’

चर्चिल ने बहुत पहले ही कह दिया था कि हिटलर से यूरोप ही नहीं, पूरे विश्व को ख़तरा है. और एक सितंबर 1939 को पोलैंड पर हमला होते ही उनका दावा सच साबित हो गया. युद्ध जब ब्रिटेन के तटों तक आ गया तो पहले विश्व-युद्ध की बातों को भुला दिया गया और 64 साल के चर्चिल को युद्ध की कमान सौंप दी गयी.

हालांकि, लार्ड माउंटबेटन इसकी पुष्टि करते हैं पर इतिहासकार जॉन पेरी को इस दावे पर शक है कि चर्चिल की नियुक्ति होते ही दुनियाभर में फैले ब्रिटेन के जहाज़ी बेड़ों को ‘विनी इस बैक’ का संदेश भेजा गया था. जो भी है. उस वक़्त ब्रिटिश संसद में ऐसा कोई भी नहीं था जो जर्मनी के मसलों पर इतनी जानकारी रखता हो जितनी चर्चिल को थी. उन्होंने अपने जीवन के कई शानदार साल जर्मनी को समझने में खपाए थे.

चर्चिल ने भी ब्रिटेन को, यूरोप को, दुनिया को, इतिहास को और सबसे बड़ी बात समय को निराश नहीं किया. चर्चिल न होते तो संभव है इंग्लैंड युद्ध हार जाता. उन्हें वॉरटाइम प्राइम मिनिस्टर का दर्ज़ा दिया जाता है. गुमनानी से लेकर फ़र्स्ट लार्ड ऑफ़ एडमिरैलिटी और फिर वॉरटाइम प्राइम मिनिस्टर बनने की उनकी यह दास्तान बेहद रोमांचकारी है.

चर्चिल की बेबाकी

हमले के दो दिन बाद, यानी तीन सितंबर, को चर्चिल ने हाउस ऑफ़ कॉमन्स में इंग्लैंड के युद्ध में कूदने का औचित्य समझाते हुए एक भाषण दिया. उन्होंने कहा, ‘युद्ध का रास्ता बेहद लंबा और कठिन होगा पर जीत अंततः इंग्लैंड की होगी क्योंकि इंग्लैंड के साथ सच है. यह सर्वोच्च नैतिकता का मसला है. नैतिकता ही नहीं, व्यावहारिकता की भी बात है.’ उनका आगे कहना था, ‘हम विश्व को नाज़ियों से बचाने के लिए लड़ेंगे. साथ मिलकर लड़ेंगे और इसलिए जीतेंगे.’

चर्चिल इमानदारी और बेबाकी के साथ इंग्लैंड के लोगों से रूबरू हुए. उन्होंने माना कि सैन्य शक्ति में ब्रिटेन जर्मनी के मुक़ाबले कमतर है, लोगों की ज़िंदगियां मुश्किल होने वाली हैं, बलिदान की ज़रूरत है और वह व्यर्थ नहीं जाएगा. अपने भाषणों में उन्होंने कहा कि यूरोप के महान शहर जिन्हें हिटलर की सेनाएं लील रही हैं, एक दिन अवश्य आज़ाद कर लिए जाएंगे. लोग उन की बातों पर यकीन कर रहे थे. हालांकि, चैम्बरलिन तब इंग्लैंड के प्रधानमंत्री थे, लेकिन चर्चिल लोगों की उम्मीद और आवाज़ बन गए.

चर्चिल का ‘लाक्षागृह’

युद्ध मैदान, हवा और समुद्र यानी हर मोर्च पर लड़ा जा रहा था. ब्रिटेन की नाविक शक्ति जर्मनी को रोक रही थी. ज़मीन पर नाज़ी फ़ौजें भारी पड़ रही थीं. यूरोप के देश नॉर्वे को जर्मनी से बचाने के लिए इंग्लैंड की सेना को ज़बरदस्त टक्कर लेनी पड़ रही थी. नॉर्वे पर जीत और हार का असर इंग्लैंड पर पड़ता. बात बनती न देख, लोगों को चैम्बरलिन की क़ाबिलियत पर शक होने लगा. उनके खिलाफ आवाज़ें उठने लगीं. संसद में उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित हुआ और उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा. चैम्बरलिन ने इंग्लैंड के राजा से विदेश सचिव लार्ड हैलीफ़ैक्स को अगला प्रधानमंत्री बनाने की पेशकश की. राजा ने इसे ठुकराते हुए, 10 मई, 1940 को चर्चिल को इंग्लैड का ‘वॉरटाइम प्राइम मिनिस्टर’ नियुक्त किया. उनसे बेहतर विकल्प इंग्लैंड के पास नहीं था.

कमान अब चर्चिल के हाथों में थी. वह क्षण जिसके लिए उन्होंने इतना लंबा इंतज़ार किया, वह आया भी तो किस मुश्किल हालात में? रामधारी सिंह दिनकर ने ‘रश्मिरथी’ में लिखा है, ‘जो लाक्षागृह में जलते हैं, वही सूरमा निकलते हैं’. चर्चिल को सूरमा बनना था. कई लोगों का मानना था कि चर्चिल इस कार्य के लिए सही विकल्प नहीं हैं. पर दो हफ़्ते ही में माजरा बदल गया.

चर्चिल के तीन यादगार भाषण

यह बात कम ही लोगों को पता होगी कि चर्चिल को बोलने में कुछ दिक्कत आती थी. बावजूद इसके, वे बेहद प्रेरक वक्ता थे. अच्छा बोलने से ज़्यादा वे बेहतरीन काम भी करते थे. प्रधानमंत्री बनने पर उनका पहला भाषण था:

‘मेरे पास मेहनत, पसीना, आंसू और ख़ून देने के अलावा कुछ और नहीं है. हमारे समक्ष इस युग का सबसे कठिन कार्य है. कई महीनों का संघर्ष और यातना हमारे सम्मुख है. आप पूछेंगे कि हमारी नीति क्या है? मैं यही कहूंगा कि हम लड़ेंगे - ज़मीन, हवा और पानी में. जितनी ताक़त ईश्वर ने हमें दी है, उतनी ताक़त से लड़ेंगे. आप पूछेंगे हमारा लक्ष्य क्या है? मैं कहूंगा, विजय. हर कीमत पर विजय. चाहे कितना भी भय हो, मुश्किल आये, कितना भी लंबा रास्ता तय करना पड़े. बिना जीते नहीं बचेंगे. मैं हर्ष के साथ यह काम हाथ में लेते हुए सबका सहयोग मांगता हूं. आइए, पूरी शक्ति के साथ आगे बढ़ें.’

यूं तो ‘डनकिर्क ऑपरेशन’ में ब्रिटेन की हार हुई थी पर उसके कई लाख सैनिक बचाकर सरकार ने सैनिक और लोगों का मनोबल ऊंचा रखा था. यह हार स्वीकार करते हुए भी चर्चिल ने अपने भाषण में कहा, ‘हम अंत तक लड़ेंगे. हम समुद्र में लड़ेंगे. महासागर में लड़ेंगे. हम हौसले से लड़ेंगे. चाहे जो भी करना पड़े, हम अपने देश के लिए लड़ेंगे. हम हवा में लड़ेंगे. हम तटों पर लड़ेंगे. हम ज़मीं पर पड़ेंगे. हम खेतों में लड़ेंगे. हम गलियों में लड़ेंगे. हम पहाड़ों में लड़ेंगे पर कभी आत्मसमर्पण नहीं करेंगे.’

जब फ़्रांस को जर्मनी ने जीत लिया और उसके शीर्ष नेतृत्व ने हिटलर से रहम की गुहार लगाई तो यूरोप में मानो अंधेरा छा गया. चर्चिल समझ गए कि युद्ध अब अवश्यंभावी हो गया. 18 जून 1940 को उन्होंने वह भाषण दिया जिसे दुनिया के सबसे महान भाषणों में से एक कहा जा सकता है. उन्होंने कहा:

‘फ़्रांस का युद्ध ख़त्म होने के बाद अब (जर्मनी) इंग्लैंड से युद्ध करेगा. इस लड़ाई (के फ़ैसले) पर ईसाई सभ्यता का दारोमदार टिका हुआ है. ब्रिटेन (ब्रिटिश लोगों), उसके संस्थानों और साम्राज्य की अपनी ज़िंदगी निर्भर है. दुश्मन का ज़ोर और गुस्सा अब हमारी ओर होगा. हिटलर जानता है कि उसे जीतने के लिए हमें हराना होगा. अगर हम जीत गए तो यूरोप आज़ाद होगा, पूरी दुनिया में जिंदगी उन्नति की ओर आगे बढ़ेगी. हम हार गए तो अमेरिका समेत पूरी दुनिया अंधेरों में खो जायेगी. सो, हम अपने कर्तव्य की ओर अग्रसर हों और सोचें, अगर हमारा साम्राज्य और ये राष्ट्र्मंडल हज़ारों साल के लिए जिंदा रहा गया तो आज के दिन को याद करते हुए लोग कहेंगे-वह उनके जीवन का सबसे बेहतरीन क्षण था!’

चर्चिल के कठोर निर्णय और कूटनीति

हिटलर ने जर्मनी की सत्ता हासिल करते ही अपनी सैन्य क्षमताओं में ज़बरदस्त विस्तार किया था. प्रधानमंत्री बनते ही चर्चिल ने लोगों से अपने ख़र्चे कम करने की अपील करते हुए सैन्य तैयारियों के लिए धन बचाने बात कही. उधर, फ़्रांस ने अल्जीरिया के बंदरगाह में खड़े अपने जहाज़ों को इंग्लैंड के हवाले करने से मना कर दिया था. चर्चिल को अंदेशा था कि हार के बाद हिटलर के इशारों पर फ़्रांस की सत्ता जहाज़ों को जर्मनी के हवाले कर देगी.चर्चिल ने बिना समय गंवाये ये जंगी जहाज़ नष्ट कर दिए.

वहीं, जब रूस से हाथ मिलाने की बात आई तो चर्चिल ने कहा, ‘राक्षस और साम्यवादी में से किसी एक को चुनने का सवाल हो तो मैं साम्यवादी को चुनूंगा.’ युद्ध जीतने के बाद, उन्होंने स्टालिन के साम्यवादी शासन की अपारदर्शिता को लोहे के परदे के समान कहा.

इंग्लैंड की सामरिक ताक़त को बढ़ाने के लिए चर्चिल ने अमेरिका से सहायता की गुहार लगाई. उन्होंने अमेरिकी लोगों से कहा, ‘हमें अपना आशीर्वाद और सहयोग दीजिये. न हम हारेंगे, न गिरेंगे. न हमें युद्ध की विभीषिका से डर लगता है, न हम थकेंगे. हमें हथियार दीजिये, हम आपको निराश नहीं करेंगे.’

युद्ध जीते, चुनाव हारे

युद्ध अभी ख़त्म नहीं हुआ था, पर उसका परिणाम ज़ाहिर हो चुका था. तभी इंग्लैंड में चुनाव आ गए. विश्वयुद्ध में इंग्लैंड की निश्चित हार को जीत में बदलने वाले चर्चिल की लोकप्रियता अपने चरम पर दिख रही थी. पर सबको हैरत को डालते में हुए इंग्लैंड के नागरिकों ने चर्चिल को सत्ता से बाहर कर दिया. मानो इंग्लैंड के लोगों की नज़र में उनकी अहमियत सिर्फ युद्ध तक ही थी. लोगों को अब ‘वॉर प्राइम मिनिस्टर’ नहीं चाहिए था. चर्चिल ने संयत रहते हुए कहा कि ‘लोकतंत्र की जीत यही है’ 1951 में वे फिर चुनाव जीते और दोबारा प्रधानमंत्री बने.

चर्चिल की शख्सियत के कुछ दिलचस्प पहलू

चर्चिल की मां अमेरिकी थीं. चर्चिल समय से पहले पैदा (प्रीमैच्योर) हो गए थे. वे कभी कॉलेज नहीं गए. उनकी पत्नी का नाम क्लेमेंटाइन चर्चिल था जो क्लेमेंट एटली, जिनसे वे चुनाव हांरे थे, से काफ़ी मिलता जुलता था. कहा जाता था कि उनके पास जितने हैट हैं, उनकी पत्नी के पास भी नहीं. उनके अच्छे वक्ता होने के पीछे यह भी तथ्य है कि उन्हें बोलने में दिक्कत आती थी सो वे बहुत सोचकर बोलते थे. साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले वे एकलौते प्रधानमंत्री हैं. वे इंग्लैंड के अकेले प्रधानमंत्री हुए हैं जिनके निवास, 10 डाउनिंग स्ट्रीट, पर ब्रिटेन का राज परिवार भोजन पर आया. जब उनकी मृत्यु हुई तो राजपरिवार उनके जनाज़े में शामिल हुआ था. यह भी पहली बार ही हुआ था.

हां, भारत को लेकर चर्चिल का नज़रिया काफ़ी निराशात्मक था. उनकी नजर में भारतीय बेहूदे और गंवार थे. वे नहीं चाहते थे कि भारत को आज़ादी प्रदान की जाए. वे शायद दुनिया में अकेले राष्ट्राध्यक्ष होंगे जिसने महात्मा गांधी के मरने की ख़वाहिश की थी.