एक अधिकारी की शहादत के बावजूद बुलंदशहर कांड ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यक्षमता और कानून व्यवस्था बनाये रखने की उसकी काबिलियत पर एक बार फिर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. बीते सोमवार को बुलदंशहर में गोहत्या की खबर के बाद उग्र हुई भीड़ ने इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह पर हमला कर दिया था. उनकी अस्पताल पहुंचाए जाने से पहले ही मौत हो गई. इसी दौरान एक अन्य युवक की भी गोली लगने से मौत हो गई थी. यह घटना सत्तापोषित भीड़तंत्र के सामने राज्य की पुलिस की असहायता को बेनकाब करती है.

लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यक्षमता और कार्यशैली पर प्रश्न खड़े करने वाली यह कोई अकेली घटना नहीं है. ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे. मसलन इसी महीने की शुरुआत में खबर आई कि उत्तर प्रदेश के डीजीपी ओम प्रकाश ने रात साढ़े तीन बजे फोन पर एक फरियादी की फरियाद सुनी और उस पर तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए. इस खबर पर राज्य के पुलिस प्रमुख ओम प्रकाश सिंह का कहना था कि अधिकारियों को लोगों का फोन उठाना ही चाहिए, पता नहीं कौन किस मुसीबत में हो.

यहां तक तो इस मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस का एक जिम्मेदार और चमकदार चेहरा दिखता है. लेकिन थोड़ा और गहरे जाएं तो यह चमक धुंधलाने लगती है. यह फरियादी थे मिर्जापुर जिले के दहमर गांव के किसान राजाराम. राजाराम की जमीन पर जब आधी रात को दबंगों द्वारा अवैध खनन और कब्जा करने की कोशिश की जा रही थी इसलिए उन्होंने स्थानीय थाने के एसओ को फोन मिलाया. कई बार की कोशिशों के बाद भी फोन नहीं उठा तो उन्होंने सीओ को फोन लगाया. यहां से भी निराश होने पर एसएसपी को फोन किया. एसएसपी ने उल्टे उन्हें डांटकर सुबह फोन करने को कहा.

अबकी बार राजाराम ने सीधे उत्तर प्रदेश के डीजीपी को ही फोन मिला दिया. यह दांव काम कर गया. डीजीपी ने तत्काल कार्रवाई करते हुए एसएसपी को फोन कर फटकार लगाई और तत्काल कार्रवाई करने के निर्देश दिए. इसके बाद पुलिस मौके पर पहुंची और तीन ट्रैक्टर और एक जेसीबी कब्जे में लिए. तीन लोग भी गिरफ्तार किए गए. इस तरह एक किसान की जमीन दबंगों के कब्जे में जाने से बच सकी.

ठीक इसी दिन इस खबर के साथ एक और घटना भी बड़ी खबर बनी. यह खबर शामली में एक फरियादी के फोन पर घटनास्थल पर पहुंची यूपी-100 की गाड़ी से खींच कर फरियादी युवक की पीट-पीट कर हत्या कर दिए जाने की थी. भीड़ युवक को पीटती रही और झगड़ा सुलझाने पहुंची पुलिस देखती रही.

उत्तर प्रदेश पुलिस के चेहरे पर कालिख की तरह लगने वाली इन घटनाओं की सूची यही नहीं थमती . मित्र पुलिस और योगी के रामराज की इस जनसेवक फोर्स का चेहरा बार-बार काला दिखता रहा है. चाहे वह मुंह से ठांय-ठांय करते हुए इनकाउंटर करने का मामला हो या पुलिस हिरासत में एक के बाद होने वाली हत्याओं का. राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति लगातार बिगड़ रही है. योगी सरकार जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश में ‘राम राज्य’ कायम करती जा रही है वैसे-वैसे अपराधियों के हौसले बुलंद होते जा रहे हैं.

योगी आदित्यनाथ ने जब शपथ ली थी तो राज्य की जनता से अपने पहले संबोधन में उन्होंने उत्तर प्रदेश को अपराध मुक्त बनाने की घोषणा की थी. उन्होंने कहा था कि अपराधियों के लिए या तो जेल में जगह होगी या फिर उन्हें राज्य से बाहर जाना होगा. लेकिन आज हकीकत यह है कि जो अपराधी जेलों में हैं वे भी सरकारी सुरक्षा में अपना कारोबार खुल कर कर रहे हैं और जो बाहर हैं उन्हें तो किसी बात का खौफ रह ही नहीं गया है.

राज्य पुलिस की कार्यकुशलता इसी बात से समझी जा सकती है कि जिस समस्या का निराकरण थाने के स्तर से हो सकता था उसके समाधान के लिए राज्य के डीजीपी को दखल देना पड़ रहा है. राज्य पुलिस की कार्यप्रणाली और कर्तव्य भ्रष्टता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है. राजधानी लखनऊ में हर दूसरे दिन कोई न कोई ऐसा मामला सामने आता ही है जहां राज्य के किसी इलाके से आकर कोई व्यक्ति या परिवार अपने प्रति हुए किसी अपराध के मामले में स्थानीय पुलिस द्वारा कोई कार्रवाई न किए जाने की शिकायत लेकर विधानसभा, मुख्यमंत्री निवास या किसी अन्य जगह पर धरना प्रदर्शन करता न दिखता हो.

राज्य सरकार ने हाल ही में 14 जिलों के पुलिस कप्तानों सहित 24 आईपीएस अधिकारियों के अचानक तबादले किए हैं. उनमें से ज्यादातर के खिलाफ इस बात की शिकायत है कि उन्होंने शासन के निर्देशों का ठीक से अनुपालन नहीं किया या इनकी अवहेलना की. जाहिर सी बात है कि जब जिलों में कानून व्यवस्था सुधारने की जिम्मेदारी रखने वाले अधिकारी ही इस तरह का गैरजिम्मेदाराना व्यवहार करें तो यह आसानी से समझा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में कानू व्यवस्था में किस तरह का सुधार हो रहा है. अब तो भाजपा नेताओं और विधायकों के पुलिस से उलझने और दबंगई दिखाने के मामले भी बढ़ते ही जा रहे हैं.

योगी सरकार लंबे इंतजार के बाद जिन ओम प्रकाश सिंह को राज्य में डीजीपी बनाकर लाई थी नागरिक पुलिस के साथ उनका कम कार्य अनुभव भी पुलिस के कामकाज में अपेक्षित सुधार न हो पाने की एक बड़ी वजह है. राज्य की पुलिस में एक जाति विशेष का दबदबा बढ़ते जाने से भी पहले से राजनीतिक संरक्षण का लाभ ले रही पुलिस मशीनरी खुद को उपेक्षित समझने लगी है. योगी सरकार के तमाम दावों के बावजूद पुलिस की अवैध वसूली, रिश्वतखोरी और अपराधियों को संरक्षण देने की कीमत वसूलने की प्रवृत्ति जरा भी बदली नहीं है.

राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक सुब्रत त्रिपाठी मानते हैं कि उत्तर प्रदेश पुलिस से अब सड़ांध आने लगी है और इसका कारण है पुलिसकर्मियों को खुला राजनीतिक संरक्षण. उनके मुताबिक उत्तर प्रदेश पुलिस को अब नागरिक पुलिस नहीं बल्कि राजनीतिक पुलिस कहना ज्यादा सही होगा. राज्य के मौजूदा पुलिस महानिदेशक ओम प्रकाश सिंह ने स्वयं मुरादाबाद में डाॅ. भीमराव अम्बेडकर पुलिस अकादमी में प्रशिक्षु आईपीएस और पीपीसएस अधिकारियों को सम्बोधित करते हुए इस बात को स्वीकार किया है. उन्होंने कहा, ‘30 साल पहले जब मुझे यूपी काडर आवंटित हुआ था तो वह मेरे लिए गर्व की बात थी क्योंकि उस समय यूपी पुलिस की छवि बहुत अच्छी थी, लेकिन बाद के दिनों में पुलिस की छवि में गिरावट आती गई है.’

योगी सरकार के लिए फिलहाल राहत की बात यह है कि विपक्षी राजनीतिक दल अपनी-अपनी उलझनों में इस तरह फंसे हुए हैं कि उन्हें कानून व्यवस्था का मुद्दा उठाने की फुरसत ही नहीं है. लेकिन अगर राज्य सरकार ने इस दिशा में कोई गंभीर पहल नहीं की और अभूतपूर्व कदम नहीं उठाए तो यह तय है कि लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार के तमाम कार्यों के बावजूद भाजपा को जनता का गुस्सा झेलना ही पड़ेगा. राज्य में पुलिस व्यवस्था को सुधारने के लिए अब ढेर सारे तबादले एक साथ कर देने से काम चलने वाला नहीं. राज्य की जनता पुलिस को वाकई ‘मित्र’ की भूमिका में देखना चाहती है और इसके लिए पहल राजनीतिक नेतृत्व को ही करनी होगी.