सत्यपाल जी, आपने जम्मू-कश्मीर की विधानसभा भंग क्यों कर दी?

मैं चाहे भंग करूं, तंग करूं या फिर दंग करूं मेरी मर्जी. वैसे अतीत के उदाहरण बताते हैं कि राज्यपालों को तंग और भंग करने के लिए ही बनाया जाता है! दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी मेरी बात की पुष्टि करेंगे. दूसरी बात ये है ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ के दम पर चलने वाली विधानसभा भला किस काम की है? जब पहाड़ी एरिया में घोड़ों की सवारी नहीं होती तो फिर ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ करने देने का क्या ही फायदा. यहां सिर्फ ‘टट्टू-ट्रेडिंग’ को बढ़ावा देने का फायदा हो सकता है...क्योंकि पहाड़ों पर टट्टूओं की पकड़ अच्छी होती है! (मुस्कुराते हुए)

मेरे पूछने का मतलब है कि आपने पीडीपी, नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) और कांग्रेस के संयुक्त सरकार बनाने दावे से ठीक पहले ही विधानसभा क्यों भंग कर दी?

देखिए, लोहे पर चोट तभी की जाती है जब वो गर्म होता है! एक तरफ महबूबा जी फैक्स करने में लगी थीं, दूसरी तरफ सज्जाद लोन तो वाट्सअप पर ही चिट्ठी भेजने में लगे थे... ईद के दिन ऐसी गलाकाट प्रतियोगिता का रेफरी बनने से अच्छा, मुझे इस मैच को ही खत्म करना लगा. सो मैंने विधानसभा भंग कर दी.

महबूबा मुफ्ती का कहना है कि पीडीपी और एनसी के संयुक्त रूप से सरकार बनाने का दावा पेश वाला फैक्स राजभवन में कोई रिसीव ही नहीं कर रहा था. आखिर ऐसा क्यों हुआ?

क्या फैक्स मशीन को ईद मनाने का हक नहीं है! महबूबा मुफ्ती खुद तो ईदी पाने के चक्कर में थीं. आखिर सरकारी मशीन और मशीनरी को लेकर वे इतनी ज्यादा संवदेनहीन कैसे हो सकती हैं कि छुट्टी और खासतौर से ईद के मुबारक दिन भी वे सबको काम में ही खपाए रखना चाहती हैं. मुख्यमंत्री बनने के बाद तो कम से कम उन्हें सरकारी कामकाज, सरकारी मशीन और मशीनरी के काम करने के रवैये की जानकारी होनी चाहिए थी.

आपने यह क्यों कहा कि यदि दिल्ली की तरफ देखता तो सज्जाद लोन को मुख्यमंत्री बनाना पड़ता’?

क्योंकि देश के सारे बड़े ‘लोन’ पास और माफ आजकल दिल्ली ही कर रही है! (खीजते हुए)

सत्यपाल जी, आपको नहीं लगता कि राजनेताओं के बजाए अन्य लोगों को राज्यपाल बनाया जाना चाहिए?

अरे जब राज्यपाल को नेतागिरी ही करनी है, तो फिर नेताओं को राज्यपाल क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए? बल्कि राज्यपाल तो सबसे घाघ...अर्र...मेरा मतलब कि सबसे अनुभवी नेता को बनाया जाना चाहिए.

यह बताइए कि जम्मू-कश्मीर की जनता को एक राज्यपाल के रूप में आपसे क्या उम्मीदें हैं?

यहां की जनता बेवकूफ नहीं है जो किसी राज्यपाल से उम्मीदें पाले! जब जनता को नेताओं से ही कोई उम्मीद नहीं, तो भला सत्यपाल... मतलब कि राज्यपाल से क्या उम्मीद करेगी? ...मेरी बात का अर्थ ये है कि यहां जनता सिर्फ शांति और विकास चाहती है और मैं इसी दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा हूं.

क्या विधानसभा भंग करने के आपके फैसले से दिल्ली और जम्मू-कश्मीर के बीच की दूरी और ज्यादा नहीं बढ़ जाएगी?

देखिए, दूरियां वहां बढ़ती हैं जहां कभी नजदीकियां रही हों! मेरा मतलब है कि राजनीति में दूरियां और नजदीकियां स्थाई नहीं होतीं...सामाजिक जीवन में तीन तलाक का चाहे सारी राजनीतिक पार्टियों ने विरोध किया हो, पर राजनीतिक जीवन में सारी पार्टियां झट से दूसरी पार्टी को तीन तलाक कह देती हैं. जहां तक जम्मू-कश्मीर और दिल्ली की दूरी बढ़ने का सवाल है, तो इनके बीच जब बीते चार सालों में कभी करीबी ही नहीं रही तो भला दूरी कैसे बढ़ेगी! और वैसे भी मोदी जी के पास दूरी और नजदीकी बढ़ाने का अचूक तरीका है.

वह भला क्या है?

मोदी जी दूरी और नजदीकी घटाने-बढ़ाने के लिए किलोमीटर की नाप ही बदल देंगे! फिर जब, जिसके साथ वे चाहें पलक झपकते ही लाखों किलोमीटर की दूरी नजदीकी में और करीबी असीमित दूरी में बदल जाएगी.

अच्छा यह बताइए, आपको अपने तबादले इतनी आशंका क्यों है?

क्योंकि कलयुग में सारी बुरी आशंकाएं ही सच होती हैं! (कुढ़ते हुए)

सत्यपाल जी, 35ए के मुद्दे पर आपकी क्या राय है?

वही, जो देश की जनता की नोटबंदी के बारे में राय है.

आप सीधे-सीधे जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं?

आप भी तो इतने टेढ़े विषय पर सवाल कर रही हैं...और वैसे भी मैं नेता हूं अभिनेता नहीं, जो सीधे जवाब दूंगा!

अच्छा यह बताइए, आपने जम्मू-कश्मीर बैंक के निजी स्वरूप को बदलकर उसे सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम क्यों बना दिया?

मोदी जी ने नोटों से लेकर पूरी अर्थव्यवस्था का स्वरूप बदल दिया है, मैं क्या एक राज्य के एक बैंक का स्वरूप भी नहीं बदल सकता? यदि मैं इतना भी न कर सकूं तो फिर लानत है मेरे राज्यपाल बनने पर!

जम्मू-कश्मीर बैंक की स्वायत्ता छीनने से लेकर, विधानसभा भंग करने तक आपके सभी फैसले विवादित माने जा रहे हैं. आखिर आप इतने विवादित फैसले क्यों कर रहे हैं?

देखिए, देश की सबसे प्रसिद्ध पार्टी की तो रूल-बुक में ही लिखा है, कि ‘हम निर्विवादित रूप से विवादित पार्टी के लोग, आजीवन विवादों और विवादित चीजों में अपना बहुमूल्य योगदान देने को प्रतिबद्ध हैं.’ आप भी देख रही हैं कि इस पार्टी के खाते में स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक अभूतपूर्व विवादित फैसले, विवादित बयान और विवादित व्यक्तित्व ही हैं. यही उनकी खास पहचान है. अब उनकी सरकार तो राज्य में है नहीं; तो ऐसे में उनके एजेंट...अब्ब्ब मेरा मतलब कि मुझे ही राज्यहित के सारे फैसले करने हैं.

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अबदुल्ला ने आपको केंद्र सरकार का गुलामकहा है. इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

वे असल में मुझे नहीं फैक्स मशीन के लिए ऐसा कुछ कहना चाह रहे हैं... मैं उनके जज्बातों को समझता हूं और उससे सहमति रखता हूं. मैं बस इतना ही कहूंगा कि इस देश में केंद्र सरकार पर ईवीएम से लेकर फैक्स मशीनों तक के साथ छेड़छाड़ के आरोप लग रहे हैं और यह अच्छी स्थिति नहीं है.