‘हमारे कई मियां भाई दूल्हे भाईजान के साथ हैं. लेकिन भाईजान भी तो हमारे हैं. उनका भी ख़्याल रखना पड़ेगा.’

टोंक की बहीर बस्ती में रहने वाले अज़मल (बदला हुआ नाम) कुछ इस तरह शहर के मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक मनोदशा बयां करते हैं. यहां दूल्हे भाईजान से अज़मल का इशारा कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट की तरफ है तो भाईजान से उनका मतलब वसुंधरा सरकार में नंबर दो कहे जाने वाले मंत्री यूनुस ख़ान से है. बता दें कि सचिन पायलट की पत्नी सारा पायलट, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारुख अब्दुल्ला की बेटी हैं. इस के चलते अज़मल ही नहीं मुस्लिम रियासत रह चुके टोंक में इस समुदाय के कई लोग बीते कुछ दिनों से सचिन पायलट को इसी संबोधन से बुलाने लगे हैं.

सचिन पायलट और यूनुस ख़ान के आमने-सामने होने से टोंक, झालरापाटन के बाद राजस्थान की दूसरी प्रमुख रोमांचक सीट बन गई है. 70 हजार आबादी के साथ मुसलमान इस क्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभाते हैं. लेकिन हर बार कांग्रेस को एकतरफा समर्थन देने वाले इस समुदाय का एक हिस्सा चुनावी रुझान से जुड़े सवाल पर इस दफ़ा या तो चुप है या फिर वही बात दोहराता है जो अज़मल ने हमें बताई.

इस ऊहापोह के पीछे एक कारण यह भी है कि टोंक के पूर्व नवाब सचिन पायलट को समर्थन दे चुके हैं तो कुछ प्रमुख क़ाजियों और मौलवियों के यूनुस ख़ान के साथ होने की चर्चा है. यहां दिलचस्प बात यह भी है कि पायलट और ख़ान दोनों ही टोंक से नहीं आते. सचिन पायलट का कर्मक्षेत्र अजमेर है तो यूनुस ख़ान का नागौर में पड़ने वाला डीडवाना.

जब सचिन पायलट का टोंक से चुनाव लड़ना निश्चित हुआ तो उनकी जीत लगभग तय मानी जा रही थी. इसका कारण क्षेत्र के जातिगत समीकरणों में छिपा है. मुसलमानों के अलावा टोंक में करीब 35 हजार मतदाता कांग्रेस के पारपंरिक समर्थक कहे जाने वाले दलित समुदाय से हैं. लगभग 45 हजार वोट गुर्जरों के भी हैं. सचिन पायलट ‘लड़ाका’ कहे जाने वाले गुर्जर समुदाय से ही ताल्लुक रखते हैं. जानकारों का कहना है कि बड़ी सतर्कता से क्षेत्र का जातिगत हिसाब संभालने के बाद ही सचिन पायलट ने अपने पहले विधानसभा चुनाव के लिए टोंक को चुना. उनके नामांकन जुलूस में उमड़े हजारों के हुजूम ने भी उनके फैसले को सही बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी. लेकिन भाजपा की तरफ से अपने प्रत्याशी अजीत मेहता की जगह यूनुस ख़ान को आगे कर देने के बाद से यहां की राजनैतिक बयार बदलने लगी है.

जानकारों की मानें तो टोंक के मुसलमानों के बीच भ्रम की स्थिति के लिए यूनुस ख़ान ही नहीं बल्कि कांग्रेस के अंदरूनी हालात भी जिम्मेदार हैं. 1972 से लेकर 2013 में हुए प्रदेश के आख़िरी विधानसभा चुनाव तक कांग्रेस ने टोंक में मुस्लिम प्रत्याशियों पर ही भरोसा जताया है. नतीजन स्थानीय मुस्लिम नेता कांग्रेस के टिकट पर अपना स्वभाविक हक़ मानते रहे हैं. लेकिन उन्हें आशंका है कि यदि सचिन पायलट जीतने के बाद टोंक में ही टिक गए तो पार्टी के टिकट से विधायक बनने की उनकी आस अगले कई चुनावों के लिए खटाई में पड़ जाएगी. जिला कांग्रेस से जुड़े एक विश्वसनीय सूत्र इस बात की पुष्टि करते हैं. दूसरी तरफ टिकट मिलने के बाद से ही यूनुस ख़ान बार-बार जताते रहे हैं कि टोंक में उन्हें पार्टी ने भेजा है. लेकिन उनकी मंशा वहां रुकने की कतई नहीं है. जबकि सचिन पायलट ने गहन सोच-विचार के बाद टोंक को अपने लिए चुना है, जो बताता है कि वे वहां लंबा टिकने का मन बनाकर आए हैं.

यहां कांग्रेस कार्यकर्ताओं के एक धड़े में इस बात को लेकर भी निराशा महसूस की जा सकती है कि क्षेत्र में सचिन पायलट की चुनावी कमान सउद सैयदी के हाथ में है. 2013 के विधानसभा चुनाव में क्षेत्र से कांग्रेस की प्रत्याशी ज़किया की हार के पीछे, सैयदी की निर्दलीय दावेदारी को बड़ा जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है. विश्लेषकों की मानें तो उस चुनाव में यदि सैयदी मैदान में नहीं आते तो मोदी लहर के बावजूद ज़किया मजबूत स्थिति में थीं. इसके अलावा क्षेत्र में सचिन पायलट और कांग्रेस की अल्पसंख्यक इकाई के नेताओं के बीच की तनातनी की ख़बरें भी चर्चाओं में है. बीते दिनों जयपुर से टिकट न मिलने की वजह से कांग्रेस अल्पसंख्यक इकाई के अध्यक्ष निज़ाम क़ुरैशी के साथ इकाई के 35 जिला अध्यक्षों ने इस्तीफा दे दिया था.

सचिन पायलट के लिए दूसरी चुनौतियों की बात करें तो कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष होने की वजह से उन्हें पूरे राज्य में चुनावी कमान संभालनी पड़ रही है. जबकि यूनुस ख़ान अपना ध्यान टोंक में ही लगाए हुए हैं. वहीं, सचिन जब पायलट टोंक में होते हैं तो मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार होने की वजह से वे उनके पास उपस्थिति दर्ज़ करवाने पहुंच रहे प्रदेशभर के पार्टी कार्यकर्ताओं से घिरे रहते हैं. नाम न छापने की शर्त पर कांग्रेस के एक स्थानीय कार्यकर्ता शिकायत भरे लहज़े में हमें बताते हैं, ‘अध्यक्ष जी को क्षेत्र से जुड़ी चर्चा की फुर्सत ही नहीं है.’

वहीं, डीडवाना से यूनुस ख़ान के साथ आए युवा नेता सादिक हुसैन (बदला हुआ नाम) की मानें तो ख़ान ने दिन के समय स्थानीय कार्यकर्ताओं के अलावा किसी से न मिलने की सख़्त हिदायत दे रखी है. हालांकि हुसैन क्षेत्र में अपनी पकड़ के कमतर होने की बात को भी स्वीकारते हैं. वे कहते हैं, ‘भाजपा से होने की वजह से पहले-पहल हमारी कौम का वोटर हाथ नहीं रखने देता. लेकिन बाद में मान भी रहा है. यदि टिकट कुछ दिन पहले हो जाती तो स्थिति कुछ और ही होती.’

कई विश्लेषक सचिन पायलट के लिए सबसे बड़ी बाधा के तौर पर उनका खुद का नाम गिनवाते हैं. उनकी मानें तो पायलट की दावेदारी के बाद क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में गुर्जर समुदाय ने अपना दबदबा अचानक से बढ़ाने की कोशिश शुरु कर दी है. तंज कसते हुए एक दलित राजनीतिकार कहते हैं, ‘ऐसा जान पड़ता है कि अब गुर्जरों की भैंस भी मुख्यमंत्री है. उसे भी मुख्य सड़क पर चलने के लिए पूरी जगह चाहिए.’ शराब की दुकानों पर काम करने वाले कुछ कर्मचारी भी नाम न छापने की शर्त पर पिछले एक सप्ताह में गुर्जर युवाओं द्वारा धमकाने की बात स्वीकारते हैं. इन शिकायतकर्ताओं में भी सबसे ज्यादा दलित ही शामिल हैं. टोंक विधानसभा क्षेत्र के अंदरूनी इलाकों के कुछ अन्य प्रभावी समुदायों के बीच भी सचिन पायलट के जीतने की स्थिती में गुर्जरों को लेकर एक आशंका का भाव महसूस किया जा सकता है.

जानकारों का कहना है कि गुर्जर होने की वजह से इलाके का मीणा वोटर सचिन पायलट के साथ कभी नहीं जाएगा. हालांकि वे यह भी मानते हैं कि हरीश मीणा के कांग्रेस में शामिल होने की वजह से सचिन पायलट को थोड़ी राहत जरूर मिलेगी. क्षेत्र में करीब 15 हजार आबादी वाले माली समुदाय के जितने भी लोग हमसे मिले उन्होंने अपना वोट भारतीय जनता पार्टी को देने की बात कही. इसके पीछे कुछ ने बाप-दादाओं की परंपरा को वजह के तौर पर बताया तो कुछ ने पायलट की उनके समुदाय के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से तनातनी को.

इसी साल अप्रैल में टोंक में हुए हिंदू-मुस्लिम तनाव को भी सचिन पायलट के लिए दोहरे नुकसान वाला बताया जा रहा है. क्षेत्र के मुस्लिम इलाकों में दबी आवाज़ में यह बात सुनी जा सकती है कि बाहर से आए जिन लोगों ने मस्ज़िद पर पत्थर फेंकने की शुरुआत की, उनमें से कई गुर्जर समुदाय से थे. वहीं इस पूरे घटनाक्रम के लिए दोषी ठहराए गए भाजपा के तत्कालीन विधायक अजीत मेहता को यूनुस ख़ान शुरुआती नाराज़गी के बाद अपने साथ जोड़ पाने में सफल रहे हैं. मेहता की वजह से इलाके के कट्टरवादी हिंदू मतदाताओं के भी ख़ान के पक्ष में आने की संभावना जताई जा रही है. इसके अलावा अलग-अलग कारणों और रुझान की वजह से इलाके के (कथित) सवर्ण वोटर दोनों दलों के बीच आधे-आधे बंटे दिखते हैं.

हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि अभी तक टोंक में पायलट 21 ही नज़र आते हैं. लेकिन उनकी राह इतनी आसान भी नहीं दिखती. सूबे में पायलट विरोधी धड़ा कांग्रेस प्रदेशाध्यक्षों के विधानसभा चुनावों में हारने की घटनाओं को बार-बार गिनवाता रहा है. 2008 के चुनाव में एक वोट से हारे मुख्यमंत्री पद के दावेदार सीपी जोशी इस बात के बड़े उदहारण हैं. हालांकि सचिन पायलट के हाथ में भाजपा के प्रति जबरदस्त सत्ता विरोधी लहर के अलावा आमवोटर को लुभाने के लिए मुख्यमंत्री पद की दावेदारी जैसा बड़ा हथियार है. लेकिन जमीनी पड़ताल बताती है कि टोंक के जातिगत समीकरण इन हथियारों के प्रभाव को कुंद कर सकते हैं. टोंक की हर गली, नुक्कड़, ढाबे और चाय की दुकान पर इस बारे में चली बात हर बार ले-देकर वहीं आ टिकती है कि मुसलमान किस तरफ जाएंगे!