दिल्ली की आम आदमी पार्टी (आप) सरकार और चुनाव आयोग के बीच टकराव की ख़बरें पहले भी आती रही हैं. अब एक फिर वैसी ही ख़बर आई है. बल्कि इस बार ताे एक अहम और संवेदनशील समझे जाने वाले मसले पर यह टकराव शुरू हुआ है. द इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से यह ख़बर दी है.

अख़बार के मुताबिक दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय ने 11 सितंबर काे एक आदेश जारी किया. इसमें दिल्ली के सभी सरकारी और निज़ी स्कूलों को निर्देश दिया गया कि वे अपने छात्र-छात्राओं के बारे में विभिन्न बिंदुओं पर जानकारी इकट्‌ठी कर प्रेषित करें. सिर्फ़ छात्र-छात्राओं ही नहीं उनके भाई-बहनों, माता-पिता, संरक्षक आदि के बारे में भी जानकारी मांगी गई है. इस आदेश को आठ अक्टूबर को संशोधित किया गया. इसमें बताया गया कि जो जानकारी मांगी गई है वह छात्र-छात्राओं का डाटा बैंक तैयार करने के लिए है. इसके कई फ़ायदे होने वाले हैं. जैसे- पते का पुष्टिकरण और अल्प व दीर्घ अवधि की योजनाओं का सीधा लाभ पहुंचाना आदि.

सूत्र बताते हैं कि जिन बिंदुओं पर जानकारियां इकट्‌ठी की जा रही हैं उनमें घर का पता, मोबाइल नंबर, शैक्षणिक योग्यता के साथ मतदाता पहचान संख्या भी शामिल है. इसी पर टकराव शुरू हुआ है. बताया जाता है कि मतदान पहचान संख्या मांगे जाने पर कई संगठनों ने आपत्ति जताते हुए चुनाव आयोग से इसकी शिकायत की. इसके बाद आयोग ने तुरंत दिल्ली सरकार को पत्र लिखा. इसमें निर्देश दिया कि यह जानकारी जुटाने की प्रक्रिया तुरंत रोक दी जाए. लेकिन दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया ने पिछले सप्ताह ही मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओपी रावत को पत्र लिखा. इसमें उन्होंने चुनाव आयोग का आदेश मानने से साफ़ इंकार कर दिया है.

यही नहीं. सूत्रों की मानें तो सिसौदिया ने अपने पत्र में यह तक लिखा है कि सरकार को ‘इस तरह की जानकारी इकट्‌ठा करने से रोकना चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं’ है. इसके बाद बताया जाता है कि चुनाव आयोग की अगले सप्ताह होने वाली बैठक में इस मसले पर चर्चा हो सकती है. चुनाव आयोग कोई सख़्त क़दम भी उठा सकता है. अख़बार ने इस बाबत मनीष सिसौदिया से प्रतिक्रिया लेनी चाही लेकिन उन्होंने काेई ज़वाब नहीं दिया. वहीं आयोग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, ‘मतदाता पहचान पत्र में दर्ज़ जानकारियाें की सुरक्षा और संरक्षा चुनाव आयोग करता है. इसे कोई किसी को देने के लिए मज़बूर नहीं कर सकता.’